ग़ज़ल
तनहाई की गहराई में , डूब रहा हूँ
शोर के इस जहाँ में ,अब उब रहा हूँ।
हर तरफ मची है , कर्कश चिल्ल पों,
सुकून की तलाश, महज़ ढूंढ रहा हूं।
लफ्ज़ों की भीड़ में, खो गया था कभी,
ख़ामोशी से धीरे-धीरे अब जाग रहा हूं ।
हर धड़कन में बह रहा ,तूफानी सैलाब,
तंग गली में ,कलेजा धुएं से फूंक रहा हूं।
न बोल, न सुन, बस महसूस कर “रंजन”
समंदर में , लहरों का सीना चीर रहा हूं।
– राजेंद्र रंजन गायकवाड़