जन्मदिन की शुभकामनाएं
स्वामी ओमा द अक के हजारों प्रसंशकों में से मैं भी उनका एक प्रसंशक हूँ। स्वामी जी से व्हाट्सएप्प पर संवाद होता रहता है।
स्वामी जी ने मुझे आशीर्वाद स्वरूप क्लब स्पिरुचुअल की गोल्डन मेम्बरशिप दी है। स्वामी जी की उदारता के क्या कहने। वह किसी को जोड़ते नहीं लोग स्वतः उनसे जुड़ते हैं। उन्होंने मेरी कुछ कविताएँ अपनी स्टोरी पर 24 घण्टे के लिए अपनी फ्रेंड फॉलोइंग में,पब्लिक वाल पर जोड़ी हैं। ऐसे में मुझे ऐसे विकृत चेहरे भी याद आ रहे हैं जो अपनी ईर्ष्यालु प्रवृति के चलते निजी- वार्ता, स्क्रीन-शॉटस इत्यादि को ढाल बनाकर, समर्थन जुटाने और अगले को नीचा दिखाने, पब्लिक करने से बाज नहीं आते हैं। इन कुत्सित मानसिकता के लोगों को स्वामी जी से सीखना चाहिए कि हमें क्या साझा करना चाहिए और क्या नहीं।
मुझे स्वामी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर यदि कुछ लिखना होता तो मैं भी इन्हीं विचारों को गूँथकर एक हार बनाता जिन्हें चर्चित कवि ओम निश्चल ने लिखा है। सार-संक्षेप में कुछ कहूँ तो बस इतना ही कि वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो।
प्रस्तुति
मनोज जैन
#स्वामी_ओमा_द_अक
शुभकामनाएं जन्मदिन की।
•
स्वामी Oma Akk को मैं उनकी कविताओं से जानता हूं, उनके प्रवचन से जानता हूं, विचार विमर्श और सह चिंतन से जानता हूं । महंगी कविता के प्रकाशन के समय विश्व पुस्तक मेले में उनसे एक रोचक वार्ता मेरी हुई थी। जिस निर्भयता से वे अपनी बातें कहते हैं ऐसा नहीं लगता कि वह किसी विचार विशेष से या विचारधारा से बंधे हुए हैं । हालांकि प्रथम दृष्टि में वे आपको समाजवादी लग सकते हैं लेकिन दूसरी तरफ वे आस्थावान धार्मिक भी लग सकते हैं । वे सनातन में भी आस्था रखते पाए जा सकते हैं और ग़ालिब मीर और तमाम कवियों पर एक अच्छे व्याख्याता भी लगते हैं। वह कभी-कभी धनिकों के स्वामी भी लग सकते हैं जैसे बहुतेरे होते हैं। लेकिन उनका चिंतन मानववादी है, वे मनुष्यता का उपहास नहीं करते। संस्कृति के सनातन प्रवाह के हामी हैं। चित्त जेथा भय शून्य में उनकी प्रबल आस्था है। स्त्रीजन्य गालियों के उद्भावक समाज के वे परम विरोधी हैं और ऐसा एक अभियान वे कई दशकों से चला रहे हैं। उनकी अध्ययनशीलता का पाट चौड़ा है। उनके शौक अद्भुत हैं । इसी जन्म में जैसे वह सब कुछ पा लेना चाहते हैं। सांसारिक ऊभ चूभ में पड़े जीवो के सम्मुख वे मुक्त चिंतक, उन्मुक्त हवा बयार की तरह घूमते, विचरते, बोलते, बतियाते, ठहाका लगाते पाए जा सकते हैं । फिल्मी दुनिया की अनेक सेलिब्रिटीज के साथ आप उनको देख सकते हैं। लेकिन उनके भीतर एक ऐसा गहरा एकांत है जहां उन्हें देख पाना संभव नहीं। वह शायद उनकी रचनाशीलता का डार्क रूम है जो उनके उज्जवल हास में प्रतिबिंबित होता है। उनकी कविताएं प्रतिरोध और असहमति का विवेकपूर्ण आस्फालन हैं।
मैं उन्हें उनके जन्मदिन पर बहुत बधाई
और शुभकामनाएं देता हूं।
इस अवसर पर उनकी पुस्तक महंगी कविता से दो-तीन कविताएं।
••
भय
भय! तू विश्व मे सबसे पुराना व्यापार है!
भय! तू सत्ता का प्रबलतम हथियार है!
भय! तू संगठनों का बल है!
भय! तू आधा सच आधा छल है!
भय! तू विनाश की पहली आहट है!
भय! तू अन्तिम छटपटाहट है!
भय! तू भोगी का भोग है!
भय! तू जोगी का जोग है!
भय! तू महात्माओं का पाप है!
भय! तू एकमात्र अभिशाप है!
•
नदी का बहाव
“नदी में कितना ही पानी बह जाये
पर नदी कभी नहीं बहती
और अगर कभी कोई नदी बह जाये
तो साथ-साथ बह जाती हैं
लाखों कहानियाँ
सैकड़ों शास्त्र
दसियों सभ्यताएँ
कोई अद्भुत संस्कृति
कोई महान राष्ट्र…!!”
(ऋषिकेश में सुन्दर गंगा को देख
देश से विलुप्त होती गंगा के नाम)
•
नदी-2
“नदी प्रदूषित हो रही है
हास्यास्पद है न
जो बह रहा हो
वह प्रदूषित नहीं हो सकता
प्रदूषण के लिए ठहरना आवश्यक है
पर ठहरी हुई धार नदी तो नहीं होती…!!”
•
नदी-3
“नदी देख रही है असभ्यता का विस्तार
सभ्यता के आवरण में!
कुसंस्कृति का प्रवाह
संस्कृति का ध्वज उठाए!
धूर्तता की बाढ़
सूचना का कोलाहल करते!
किन्तु नदी
फिर भी चुपचाप बह रही है
क्यों कि सब बह जो जायेगा कभी न कभी…!!”
प्रस्तुति
।।वागर्थ।।