बहुत शुक्रिया अरुण कमल जी
हिन्दी की प्रख्यात कवि ज्योति शर्मा का यह दूसरा कविता संग्रह समकालीन कविता की नयी समृद्धि का संकेतक है।नितांत नये अनुभव,अछूते बिम्ब और बोलचाल के मुहावरे इन कविताओं को विशिष्टता प्रदान करते हैं और ज्योति शर्मा को अग्रणी कवि के तौर पर स्थापित करते हैं।”चाँदी का गहना है सुख,दिनोंदिन काला पड़ता जाता ” —यह एक पंक्ति कवि की सूक्ष्म अनुभूति और उसे नये रूपाकार दे पाने की क्षमता का द्योतक है।“पहाड़ों में सितंबर” जैसी कविताएँ प्रकृति और मानव संबंध को नयी दृष्टि से देखती-परखती हैं—
पहाड़ों में सितंबर जैसे तामचीन की केतली
जिसका ढक्कन खो गया था पिछली बरसातों में
खुली खिली गर्म सर्द जैसे तुम हो वह
शरद के पहाड़,तामचीन की बिना ढक्कन वाली केतली और तुम—इतने संबंधों का संयोजन और निर्वाह करने वाली अनेक कविताएँ इस संग्रह में हैं।”अल्मोड़ा का लाल बाज़ार” भी ऐसी ही कविता है— । ‘अल्मोड़ा के लाल बाज़ार में खानी थीं मुझे जलेबियाँ/तुमने रोकी ही नहीं गाड़ी’ एक सादी,आकस्मिक सी पंक्ति है,लेकिन अनेक भावों को संप्रेषित करती हुई।यहाँ मध्य वर्ग की निश्छल उपस्थिति ने मेरा ध्यान खींच लिया—अभी भी हमारी कविता में मध्य वर्ग के अनुभव और प्रसंग बहुत कम मिलते हैं।ज्योति जी की कविता इन सभी परहेज़ों से मुक्त है और इसीलिए यहाँ अनेक ऐसी कविताएँ मिलती हैं जो हिन्दी कविता के भाव-क्षितिज और अनुभव-परिधि को विस्तार देती हैं।’…आओ और मुझे ऐसे बर्बाद करो जैसे सट्टा सेठ को…’।या “महुआ पीकर नाच रही थी पृथिवी और चाँद अपनी जगह से हट गया था जैसे आधी रात के बाद ब्रा का खुला हुआ हुक…”।“ब्रेक अप पार्टी” भी इसी कोटि की साहसी कविता है,जैसे “सलूनवाली खुशी दी” ।एक कविता मालिशवाली दीदी को संबोधित है ,बहुत मार्मिक और मांसल।एक और विरल कविता का ज़िक्र ज़रूरी है ,”अश्लील बातें करनेवाले आदमी”।ज्योति शर्मा ने बहुत साहस और संयम के साथ इसे रचा है ।जैसे कि “बन्ने गाने वाली औरतें” नामक कविता, या फिर “औरतों की भी इच्छाएँ होती हैं” सरीखी कविता।
ज्योति शर्मा का यह संग्रह समकालीन कविता का नया सोपान है,भाषा की सहज चपलता और सौष्ठव से संपन्न ;पहाड़,सर्दियाँ और स्त्री जीवन के अप्रतिम अनुभव-कणों और बिम्बों से समृद्ध; एक नवीन ,शक्तिशाली काव्य-प्रक्षेप।
—अरुण कमल