सोच रही हूँ
मर्द भी मासूम होते हैं
चेहरा सख़्त, दिल कोमल।
हँसी झूठी, आँखें गीली।
बोझ भारी, कंधे थके।
रातें लंबी, सपने छोटे।
बातें अनकही, ख्वाहिशें अधूरी।
चुप्पी गहरी, रूह अकेली।
कोई समझे नहीं, कोई देखे नहीं।
समाज कठोर, दिल मासूम।
मर्द भी रोते, मर्द भी डरते।
मर्द भी चाहते, सिर्फ प्यार थोड़ा।
मर्द भी टूटते, मर्द भी संभलते।
मर्द भी मासूम होते हैं, बहुत मासूम।
हाथ चाहिए सर पर प्यार का।
कान चाहिए सुनने वाला।
कभी हँसना चाहते बेफिक्र
कभी बनना चाहते बच्चे फिर।
भारी जिम्मेदारी, थकी उम्मीदें।
छुपा दर्द, अनकहा सफ़र।
मुस्कान सजाकर कहते
“मैं ठीक हूँ,” पर दिल कहे कुछ और।
योद्धा कहा दुनिया ने,
पर भूल गई
योद्धा भी कभी-कभी
घायल और डरते हैं।
मर्द भी सपने देखते हैं
मर्द भी डरते हैं
मर्द भी मासूम होते हैं
बहुत, बहुत मासूम।
अंकिता पटेल