तुम भी रखना पाँव मेरे गाँव –
सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’
क्वीन्स, न्यूयार्क के पुस्तकालय में
वह मुस्कराते पढ़ रही थी
और मैं पूछता कि पत्रिका
मेरी धरोगे शेल्फ में।
वह भले ही छप रही है
उत्तरध्रुवीय रेखा पर
बसे एक शहर में।
ग्लोमा है जिसके ह्रदय में।
हिमालय की गोद से बहकर
जैसे गंगा भारत में बह रही है
इस पार से उस पार तक
संस्कृतियों जोड़ते आगे बढ़ रही है।
मेरी पत्रिका स्पाइल-दर्पण या वैश्विका
कर रही जादुई प्रयास
तीन महाद्वीपों को
जोड़ती है एक साथ।
रचनाओं की लहरियों में
संस्कृतियों को ढो रही ये पत्रिका।
जैसे नाव में स्वप्न-पंछी नाविक बने हों
तैरना जानता नहीं,
वह खे रहा नैया हमारी,
पार होता देख कर रचनाओं को
इस पर से उस पार।
ए मनुज जानता हूँ
जिसे प्राप्त कर सकता नहीं,
लहरियों सा कर रहा हूँ प्यार।
कितने अभिवादनों,
प्रतीकों से सुसज्जित हार।
लेखकों की रचनाओं को पढ़ रहा
समझ कर उपहार।
रचनाओं को माले में फूल सा गूँधता,
सूखे , मुरझाई पत्तियों को अलग करता
बन जाता एक माला रचनाओं का
जिसे पढ़कर खुश हो या दो उलाहना।
यह पाठकों का है अधिकार।
रचनाओं से रंगबिरंगे नीड़ का निर्माण कर,
दो संस्कृतियों को जोड़ता हूँ।
जिसके पास नहीं हो स्वयं छत,
वह भी दूसरों को दे रहा है छाँव।
पुरानी पीली बस्ती लखनऊ को छोड़कर
सागर किनारे ओस्लो में बसा लिया गाँव।
व्यस्त हो या फुर्सत में
तुम भी आना वाइकिंग के नगर में
एक दिन तुम भी रखना पाँव मेरे गाँव।
(आज की कविता Speil स्पाइल-दर्पण पत्रिका के 37 साल पूरे होने पर)
Oslo, 07.09.25