March 6, 2026

सुरजीत नवदीप का निधन; साहित्य जगत और कवि सम्मेलनों के सुनहरे दौर का अंत

0
WhatsApp Image 2025-09-16 at 2.22.21 PM

( स्वराज करुण )
हास्य -व्यंग्य के अपने शब्दों की जादूगरी से ‘काले धन’ को ‘सफ़ेद’ करने वाले छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि ,धमतरी निवासी सुरजीत नवदीप अब हमारे बीच नहीं हैं । प्रादेशिक और राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों के वे बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय मंच संचालक थे ।
बीती रात 15 सितम्बर को अपने गृह नगर धमतरी के एक प्राइवेट अस्पताल में उनका निधन हो गया । उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि ।
धमतरी जिला हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष डुमन लाल ध्रुव ने उनके देहावसान की सूचना सोशल मीडिया(वाट्सएप) पर साझा करते हुए हुए गहरा दुःख व्यक्त किया है और अपनी ओर से तथा समिति की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है।
नवदीप जी के निधन से साहित्य जगत और मंचीय कवि सम्मेलनों के एक सुनहरे दौर का अंत हो गया ।उनका जन्म एक जुलाई 1937 को अविभाजित भारत के मंडी भवलदीन नामक स्थान में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है ।श्री नवदीप अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ आ गए और यहाँ के जन -जीवन में रच -बस गए । उन्होंने हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया और बी. एड. तथा सी. पी. एड. की भी उपाधियाँ भी हासिल की ।
उन्होंने कई दशकों तक धमतरी के विभिन्न सरकारी स्कूलों में अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएँ दी। नवदीप जी की पहचान मुख्य रूप से हास्य-व्यंग्य के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि के रूप में थी, लेकिन उन्होंने अनेक गंभीर रचनाओं का भी सृजन किया ।
उनकी लिखी प्रमुख पुस्तकों में भारत विभाजन की विभीषिका पर केंद्रित उपन्यास ‘लाजवंती का पौधा’ बहुत महत्वपूर्ण है । इसके अलावा उनके कविता संग्रहों में – (1) हवाओं में भटकते हाथ (2) कुर्सी के चक्कर में (3) शब्दों का अलाव (3) आँसू हँसते हैं और (4) रावण कब मरेगा शामिल है ।
कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य के वे बेताज बादशाह थे।सामजिक -राजनीतिक विसंगतियों पर अपनी कविताओं से तीव्र प्रहार करते थे ।कवि सम्मेलन चाहे अखिल भारतीय हो या आंचलिक , नवदीप जी सभी तरह के कवि सम्मेलनों के मंचों पर शालीन हास्य -व्यंग्य के बेताज बादशाह की तरह हमेशा छा जाते थे ।
आम जन -जीवन में भी उनका हँसता-मुस्कुराता चेहरा आजीवन छाया रहा ।नवदीप जी शब्दों के जादूगर थे । उनकी तरकश में हास्य -व्यंग्य के तीर बरसने को
हमेशा तैयार रहते थे ।
जब कभी कोई उनसे पूछता कि अपनी जीवन यात्रा के इस पड़ाव पर बीते हुए कल और आज में वे क्या फ़र्क देखते हैं ,तो अपनी जवानी के दिनों के घने काले बालों को याद करते हुए और वर्तमान में अपने सफ़ेद हो चुके बालों की ओर इशारा करते हुए नवदीप जी तपाक से कहते थे —

” एक नया रूप धर लिया मैंने
काला धन था ,सफ़ेद कर लिया मैंने ।”

उनकी इन दो पंक्तियों से कवि सम्मेलनों में भी ठहाके गूँजने लगते लगते थे । पत्र -पत्रिकाओं में उनकी व्यंग्य कविताएँ वर्षों से छपती रहीं । काव्य मंचों पर उनकी उपस्थिति विगत छह दशकों से लगातार बनी हुई थी । समय -समय पर उन्हें विभिन्न सरकारी और अशासकीय संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का सदस्य भी मनोनीत किया था ।
सौम्य चेहरे पर युवाओं जैसी मुस्कान बिखेरते 88 साल के हो चुके थे । उनके गृहनगर धमतरी को अगर हम छत्तीसगढ़ की साहित्यिक राजधानी कहें तो शायद गलत नहीं होगा ,क्योंकि इस कस्बाई शहर में ही आज से 135 साल पहले वर्ष 1885 में हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रथम व्याकरण की रचना की थी । राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि और कहानीकार स्वर्गीय नारायणलाल परमार की यह कर्मभूमि रही । वर्ष 1974 के आसपास अपने प्रथम व्यंग्य उपन्यास ‘, भगवान विष्णु की भारत यात्रा’ से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए व्यंग्यकार श्री त्रिभुवन पाण्डेय इसी धमतरी शहर के थे । देश के ख्याति प्राप्त शायर स्वर्गीय मुकीम भारती भी धमतरी के निवासी थे । धमतरी छत्तीसगढ़ी भाषा के लोकप्रिय कवि स्वर्गीय भगवती लाल सेन का भी गृहनगर रहा। इन साहित्यिक विभूतियों की पंक्ति में सुरजीत नवदीप भी थे ।
नवदीप जी के ‘कालेधन’ वाली तस्वीर 45 वर्ष पुरानी है ,जो उनके 80 वें जन्म दिन पर धमतरी के प्रतिष्ठित दैनिक ‘प्रखर समाचार ‘ में छपी थी ।लेकिन उनके ‘सफ़ेद धन’ के साथ यह दूसरी तस्वीर मैंने इंटरनेट से साभार ली है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *