लोकपर्व लोककला … “ दीवारों पर खिलते स्वप्न और प्रार्थनाएँ”
साँझी लोकपर्व मुख्यतः उत्तर भारत, हरियाणा, पंजाब राजस्थान ,दिल्ली के कुछ हिस्सों में और विशेषकर ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक, पितृपक्ष में साँझी को आकार दिया आता है। यह वह समय होता है जब वर्षा लौट जाती है, बादल छँट जाते हैं और प्रकृति नए रूप में खिल उठती है। तब यही वातावरण सृजन की नवीन पहल को आमंत्रित करता है। स्वच्छ जल, निर्मल गगन और खिले हुए वृक्ष-लताएँ लोकजीवन में नई आभा भरने लगते हैं।
इन दिनों पितृपक्ष की भोर, खीर और नैवेद्य की सुवास से भर जाती है, तो संध्या फूल-पत्ती और गोबर की आकृतियों से चित्रित हो उठती है।साँझी के अनेक रूप देखने को मिलते हैं गोबर- साँझी,पुष्प-साँझी,रंग-साँझी और गुलाल-साँझी । हर रूप लोक की कल्पनाशक्ति का प्रमाण है। यह जीवन का संतुलन है। प्रातः पितरों को स्मरण, संध्या को प्रकृति की पूजा।कन्या की कला, कन्या का सूर्य, कन्या की सांझ और उसके साथ गूँजते लोकगीत सब कुछ मिलकर साँझी आकार लेती है ।श्राद्ध, श्रद्धा और सृजन का अनुपम अवसर होते है। गाँव में विश्वास है कि जो परिवार श्रद्धा से कनागतों में साँझी रचते हैं उनके घर में सुख-समृद्धि और संतति का आगमन होता है।
संझा सांझण ऐ कनागत करले पार,
देखन चालो री महारी संझा का लनिहार,
कै देखयोगी ऐ यो खोङो राम जङाम,
बैठो टिबङिये चलावै तिरकबान
कनागत के दिनों में गाँव की दीवारें जीवंत चित्रपटल बन जाती हैं। आँगन की दीवारों पर मिट्टी /गोबर से साँझी माता का चित्र गढ़ना शुरू कर दिया जाता है। उनकी बहन फूहड़ ,खोड़िया काना बामन और उल्टा चोर की प्रतिमाएँ भी साँझी में विशेष रूप से गढ़ी जाती हैं। कनागत के 15 दिनों में साँझी में प्रयुक्त होने वाली समस्त आकृतियाँ तैयार कर ली जाती हैं। हर दिन साँझी में कुछ न कुछ नया गढ़ दिया जाता है। अधिकतर आकृतियाँ प्रकृति से सम्बन्धित होती हैं। फूलों के वृक्ष, पशु-पक्षी, सूरज – चाँद – सितारे और मंगल चिह्न आदि । सर्वपितृ-विदाई, पूजन-अर्चन के पश्चात अमावस्या की गोधूलि बेला में, साँझी को अंतिम रूप देते हुए महल और कोट बनाकर भर दिया जाता है। फिर फूलों, पत्तियों, रंगों, चमकीली पन्नियों, आभूषणों आदि से सजाया जाता है।
नवरात्रि की प्रत्येक संध्या काल में गाँव की स्त्रियाँ और कन्याएँ एकत्र होकर साँझी के आगे दीपक जलाती हैं, पूजा करती हैं और भोग अर्पित करते हुए गाती हैं…
सँझा माई जीमले
ना धापी तो ओर ले
धाप गी तो छोड़ दे
भोग लगाकर घर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए
पारंपरिक गीत गाती हैं…
संझा के ओरे – धोरे फूल रही चौलाई,
मै तन्नै बूझू री संझा कै तेरे भाई,
फेर संझा बतावैगी,
पांच-पच्चीस भतीजा, नौ दस भाई,
भाईयारो ब्याह करो भतीजा री सगाई ।
साँझी माई की पूजा प्रतिदिन अलग-अलग घर में की जाती है ।विभिन्न प्रकार के मीठे भोग-प्रसाद का वितरण किया जाता है। देसी घी में बने मीठे व्यंजनों की सुवास पूरे गाँव में बिखर जाती है। घर-घर की स्त्रियाँ , किशोरियाँ और नन्हे बालक-बालिकाएँ उमंग और उल्लास से भर उठते हैं।
कहीं नवमी की सन्ध्या बेला में, तो कहीं दशहरा की सन्ध्या बेला में, साँझी को दीवार अथवा आँगन से ससम्मान उतारकर/समेटकर मिट्टी के एक मटके में प्रतिष्ठित किया जाता है। तत्पश्चात शुद्ध देसी घी का दीपक जलाकर, स्त्रियाँ और बालिकाएँ मधुर लोकगीत गुनगुनाती हुई, सामूहिक भाव से सर्वमंगल की कामना करते हुए साँझी माई को बिलकुल वैसे ही विदा करती हैं जैसे किसी अपने आत्मीय अतिथि को स्नेहिल विदाई दे रही हों । पोखर /तालाब या नदी – नहर में मटकी को विसर्जित कर मंगल गीत गाते हुए सब अपने अपने घर लौट आते हैं।
इन दिनों पूरे गाँव में गीत-संगीत और हँसी-ठिठोली का उल्लासपूर्ण वातावरण बना रहता ।शक्ति, उर्वरता, करुणा और समृद्धि की प्रतीक साँझी पूजा ,लोक-स्मृति की ज्योति है।जो अपनी जगमगाहट से पीढ़ी दर पीढ़ी उजास भरती रहती है ।माँ कहती थीं कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही हमारे जीवन की सबसे सच्ची और बड़ी पूँजी है।इस सांस्कृतिक परंपरा का असली सौंदर्य उसकी सहजता ,सादगी और मिलनभाव में निहित है।
इस लोकपर्व की लोककथा फिर कभी…
… पारुल तोमर