जनकवि कोदूराम “दलित” जी की हिन्दी कविता –
“गरीबी, तू न यहाँ से जा”
गरीबी ! तू न यहाँ से जा
एक बात मेरी सुन पगली,
बैठ यहाँ पर आ,
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
चली जायेगी तू यदि तो दीनों के दिन फिर जायेंगे
मजदूर-किसान सुखी बनकर गुलछर्रे खूब उड़ायेंगे
फिर कौन करेगा पूँजीपतियों ,की इतनी परवाह
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
बेमौत मरेंगे बेचारे ये सेठ,महाजन , जमींदार
धुल जायेगी यह चमक दमक,ठंडा होगा सब कारोबार
रक्षक बनकर, भक्षक मत बन, तू इन पर जुलुम न ढा
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
सारे गरीब नंगे रहकर दु:ख पाते हों तो पाने दे
दाने-दाने के लिये तरस मर जाते हों,मर जाने दे
यदि मरे –जिये कोई तो इसमें तेरी गलती क्या
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
यदि सुबह शाम कुछ लोग व्यर्थ चिल्लाते हों,चिल्लाने दे
“हो पूँजीवाद विनाश” आदि के नारे इन्हें लगाने दे
है अपना ही अब राज-काज –तू गीत खुशी के गा
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
यह अन्य देश नहीं, भारत है,समझाता हूँ मैं बार-बार
कर मौज यहीं रह करके तू, हिम्मत न हार, हिम्मत न हार
मैं नेक सलाह दे रहा हूँ, तू बिल्कुल मत घबरा
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
केवल धनिकों को छोड़ यहाँ पर सभी पुजारी तेरे हैं
तू भी तो कहते आई है – “ये मेरे हैं, ये मेरे हैं“
सदियों से जिनको अपनाया है, उन्हें न अब ठुकरा
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
लाखों कुटियों के बीच खड़े आबाद रहें ये रंगमहल
आबाद रहें ये रंगरलियाँ , आबाद रहे यह चहल-पहल
तू जा के पूंजीपतियों पर, आफत नयी न ला
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
ये धनिक और निर्धन तेरे जाने से सम हो जायेंगे
तब तो परमेश्वर भी केवल समदर्शी ही कहलायेंगे
फिर कौन कहेगा “दीनबंधु”, उनको तू बतला
गरीबी तू न यहाँ से जा…..
रचनाकार – जनकवि कोदूराम “दलित”