March 6, 2026

व्यंग्य के तीर चलाने में सुदक्ष और कुशल : व्यंग्यरत्न हँसमुख वीरेन्द्र सरल

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कृष्ण कुमार अजनबी

14 जून 1971 को तत्कालीन मध्यप्रदेश और वर्तमान में छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के अंतर्गत बोडरा ग्राम में एक बालक का जन्म होता है। पिता द्विजराम एवं माता भानबाई की कोख से उत्पन्न सरल व हँसमुख स्वभाव के धनी बालक वीरेन्द्र कुमार तीसरे पुत्र के रूप में धरा पर अवतरित होते हैं। वे कुल तीन भाई और चार बहनें हुआ करते हैं; जिनका क्रम कुछ इस प्रकार है:-रामकुमार, विजय लक्ष्मी, दिलीप कुमार, वीरेन्द्र कुमार, महालक्ष्मी, कृष्णा लक्ष्मी और वीणा लक्ष्मी।
अभावों के बीच जन्मे और पले बढ़े प्रतिभा सम्पन्न वीरेन्द्र की प्राथमिक पढ़ाई बोडरा गाँव में, फिर मिडिल और उच्चतर शिक्षा क्रमशः भोथीडीह एवं मगरलोड में सम्पन्न होती है। तदुपरांत स्नातक की पढ़ाई स्वाध्यायी छात्र के रूप में ही हो पाती है। दिल लगाकर पढ़ने में बेहद माहिर वीरेन्द्र निस्संदेह एक मेधावी छात्र रहे हैं और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने में विशेष रुचि रखते हुए नए – नए प्रयोग करना चाहते थे। इसी दरम्यान लोकप्रिय व चर्चित किस्सा “रायपुर के धोखा” की तर्ज पर उन्होंने “मगरलोड के धोखा” हास्य व्यंग्य कथा गीत लिखकर स्वयं ही एकल अभिनय की प्रस्तुति करने की ठान लेते हैं । शुरुआत में कड़े विरोध के बावजूद भी इस एकल अभिनय की प्रस्तुति होती है और काफी सराही जाती है। जिन्होंने विरोध किया था वही बाद में उनकी पीठ थपथपाने को बाध्य हुए थे। प्रारंभिक सफलता के बाद उनके अंदर का व्यंग्यकार अब दृढ़ मनोबल के साथ मुखर होने लगा। बचपन से ही शरद जोशी और हरिशंकर परसाई जी की रचना पढ़ – पढ़कर बड़े हुए वीरेन्द्र में व्यंग्य का पुट आना स्वाभाविक ही है। जानकारी और सुविधा के अभावों के बीच भी जिसे आगे बढ़ना होता है वह अपनी राह खुद चुन लेता है। समय उसका पथ प्रशस्त कर ही देता है।

किताबों में गहरी दिलचस्पी रखने वाले वीरेन्द्र अब आहिस्ता से व्यंग्य लेखन में प्रवेश करते हैं और चमत्कारी ढंग से सबको चकित करते हुए तहलका-सा मचा देते हैं। हँसमुख स्वभाव के वीरेन्द्र गहरी समझ एवं अंर्तदृष्टि रखते हैं। वे हर चीज को बारीकी से मन ही मन अध्ययन व जाँच – पड़ताल करने में सिद्धहस्त होते हुए सिर्फ और सिर्फ अपनी कलम के सहारे आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं। वे पहले – पहल दैनिक समाचार पत्र नवभारत, प्रखर समाचार जैसे पत्रों में छपकर अपनी जगह बनाते चले जाते हैं और आज पूरे देश भर में एक स्थापित व्यंग्यकार के रूप में जाने व पहचाने जाते हैं। इसके साथ ही वे न केवल अपने अपितु अपने माता – पिता, गाँव तथा जिला समेत सम्पूर्ण राज्य छत्तीसगढ़ प्रदेश को गौरवान्वित कर रहे हैं । उनके जैसे होनहार हुनरमंद उम्दा व्यंग्यकार को पाकर हम धन्य होते हैं।

मुझे भी लगता है कि पिछले जनम में मैंने भी कोई पुण्य कर्म किया होगा तभी उनसे मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। विभिन्न कार्यक्रमों में अक्सर हम आते-जाते मिलते-जुलते रहे हैं और आज हमारा सम्बन्ध इतना प्रगाढ़, गहरा, मधुर एवं मजबूत बन पड़ा है कि उनके व्यक्तित्व पर लेखनी चलाते हुए मुझे आश्चर्य मिश्रित हर्ष के साथ फक्र होता है। हम दोनों समकालीन कहे जा सकते हैं। दो-चार साल के अंतर में जन्मे हम दोनों के बीच अंतरंग भातृभाव एवं मित्रवत व्यवहार वर्षों से रहा है और आजीवन रहेगा। ऐसा मित्र पाकर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूँ।

प्रारंभिक दिनों में वीरेन्द्र सरल मंचों पर हास्य व्यंग्य की पैरोडी सुनाकर श्रोताओं की वाहवाही और सराहना बटोरते थे। उनकी रचना से हँसी के फौव्वारे यूँ निकलते थे कि दर्शक लोटपोट हो जाते थे और मैं भी कई बार खुशी से गदगद हुआ हूँ। लेकिन अब वे धारदार हथियार के साथ मेरा मतलब व्यंग्य के तीर और तलवार जैसे शब्दों का प्रयोग कर अपनी लेखन में ऐसे जायकेदार पकवान परोसते चले जाते हैं कि पढ़ने वाला गदगद होकर इस से अलग हो ही नहीं सकते। गलती से भी यदि आपने उनकी रचना को हाथ लगा दिया तो आप गए काम से। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि एक बार कोई पढ़ना शुरू किया तो पूरा पढ़कर ही दम भरेगा। वरना चैन नहीं आएगा। उधर आपके जरूरी काम -धंधे धरे के धरे रह जाएंगे। मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ है। लिहाजा मैंने अपना अनुभव शेयर किया है, इसे अन्यथा नहीं लेंगे।और फुर्सत में जरूर आजमाएंगे व पढ़ेंगे।

यूँ तो वे प्रारंभिक दिनों में कुछ हास्य व्यंग्य कविताओं के माध्यम से अपनी बात कहकर तालियाँ बटोरते थे; लेकिन कालांतर में समझ और सोच विकसित कर पूरी परिपक्वता के साथ व्यंग्य की दुनिया में दस्तक देते हैं; वह भी बिना किसी जान-पहचान अथवा वरदहस्त के सहारे। बचपन से विभिन्न व्यंग्यकारों को पढ़ – पढ़कर बड़े हुए वीरेन्द्र आज समूचे देश में बड़े- बड़े नामीगिरामी व्यंग्यकारों के बीच खड़े होकर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल हुए हैं। यह बहुत बड़ी बात है। व्यंग्य लिखना वैसे भी आसान काम नहीं है। परन्तु वीरेन्द्र अपने सरल लेकिन धारदार शब्दों के जरिये ऐसे गहरे अर्थों वाली बात करते हैं कि पाठक को केवल गुदगुदाते नहीं अपितु मर्म को छूकर तिलमिलाने तथा सोचने पर विवश ही कर देते हैं।

व्यक्ति पूजा के प्रखर विरोधी और व्यक्तित्व के पुजारी वीरेन्द्र सरल अपनी कथनी और करनी में सामंजस्य स्थापित करने की सदैव प्रयास करते हैं। केवल थोथे और ऊँचे आदर्श लेखन के बजाय उन आदर्शों को अपने जीवन में प्रतिबिंबित करना अधिक श्रेयस्कर मानते हैं। सच्चा लेखक वही होता है जो अपने मन, कर्म व वचन से समाज में उच्च आदर्श को स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाए ; न कि बड़ी – बड़ी बातें कर ताश महल बनाए। मानवीय जीवन मूल्य जब तक दीर्घस्थायी या चिरस्थायी न हो तो वह साहित्य किस काम का..? इस बात को वे भलीभांति जानते समझते हैं और अपनी व्यंग्य-रचना के माध्यम से समाज में व्याप्त विद्रूपता तथा विसंगतियों पर प्रहार करते हुए उसमें सुधार लाना चाहते हैं। यह हम सबके लिए शुभ संकेत है।

भाई वीरेन्द्र सरल की अंतर्दृष्टि और अधिक पैनी हो एवं उनकी कलम और भी सक्रिय व मुखर हो; इन्हीं शुभकामनाओं के साथ उनके भविष्य स्वर्णिम होने की अग्रिम बधाई देता हूँ।
इति शुभमस्तु…

@ कृष्ण कुमार अजनबी
पोस्ट देवभोग जिला गरियाबंद
छत्तीसगढ़ : 493890
मोबाइल : 9691194953

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