मातृभाषा में लौटने का उजाला
[ डायरी : उन्मेष 2025, पटना ]
आज के दिन को मैंने कई बार अपने भीतर दोहराया।
साहित्य अकादमी और बिहार सरकार के संयुक्त आयोजन ‘उन्मेष 2025’ में पहुँचना, और वर्षों बाद दीदी प्रतिभा राय जी (2011, 47वें ज्ञानपीठ पुरस्कार – 1991मूर्तिदेवी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला रचनाकार) से मिलना – यह मेरे लिए जैसे अपनी ही भाषा के भीतर लौट आने जैसा था।
भीड़ में, मंच के पीछे, उनका सफ़ेद-नीला आँचल और वही आत्मीय मुस्कान देखकर मुझे ओड़िया की लय में ही उनके पास जाना पड़ा। अपनी मातृभाषा में “नमस्कार दीदी” कहने की जो तृप्ति थी, वह किसी पुरस्कार या मंच के तामझाम से बड़ी थी।
हम दोनों के बीच की बातचीत धीरे-धीरे साहित्य की छोटी-छोटी धाराओं से होकर गुज़री। मैंने उनके उपन्यासों – शिलापद्म और याज्ञसेनी – का ज़िक्र किया।
उन्होंने मुस्कराकर कहा, “जब मैं द्रौपदी को लिख रही थी, तब भीतर एक औरत की सारी चुप्पियाँ मेरे कान में बोल रही थीं।”
उनकी आवाज़ में वह धीरज था जो केवल बरगद के नीचे बैठी हुई नदी की रेत में होता है।
मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहा; बीच-बीच में हम दोनों ओड़िया के किसी शब्द को पकड़कर हँस पड़ते।
फिर अचानक उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा, “मुझे गर्व होता है मानस, तुम तन और मन दोनों से ओड़िया होकर भी हिंदी कविता के साथ खड़े हो।”
उनकी यह बात सुनते ही भीतर एक हल्क़ी लहर उठी – जैसे कोणार्क के शिल्प पर सुबह की धूप गिरती हो।
बातों-बातों में उन्होंने मेरे पड़ोस के पास खिड़की वाले कवि [ विनोद कुमार शुक्ल जी] को भी याद किया और उनके स्वास्थ्य का हाल पूछा। उस क्षण लगा, साहित्य केवल किताबों के नाम या पुरस्कार नहीं, बल्कि एक संवेदना की कड़ी है जो लोगों को जोड़ती रहती है।
हम दोनों ने भविष्य के साहित्य पर भी चर्चा की। दीदी कह रही थीं – “लिखना अब केवल किताबों तक नहीं रहेगा। वह आवाज़, चित्र, मंच और स्क्रीन – सब जगह बहेगा। लेकिन संवेदना की जड़ें अगर मिट्टी में रहेंगी तो पेड़ कभी सूखेंगे नहीं।”
उनकी बात सुनकर मुझे अपने गाँव की मिट्टी की गंध आने लगी।
इस पूरे मिलन में सबसे बड़ा सुख यह था कि हम अपनी भाषा में थे। ओड़िया में पूछना, सुनना, हँसना – यह सब एक गुप्त आँगन में बैठकर बात करने जैसा था। मंच पर माइक, भीड़, कार्यक्रम – सब पृष्ठभूमि में चले गए और सामने बस दीदी और उनकी आँखों का अपनापन रह गया।
जब विदा लेने का समय आया, उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। बोलीं – “लिखते रहो। अपनी मिट्टी से जुड़े रहो। समय बदलता है, पर शब्दों की सच्चाई नहीं।”
उनके शब्द मेरे भीतर किसी दीपक की तरह जल उठे।
आज की डायरी का यह पन्ना मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि आने वाले दिनों में जब भी साहित्य के भविष्य के बारे में सोचूँ, मुझे यह दिन याद रहे – जब एक महान लेखिका के सामने मैं सिर्फ़ एक पाठक नहीं, अपनी ही भाषा का एक छोटा-सा लेखक बनकर खड़ा था।
●●● जयप्रकाश मानस