नदी का पानी आदिवासी लड़की की हैँसी जैसा था
( आदिवासी : गीत और स्वप्न पर कुछ कविताएँ)
(एक)
पहाड़ की गोद में
एक बहुत पुराना टूटा ढोलक पड़ा है –
उसकी थाप जहाँ पड़ती है
बिजली की आख़िरी चमक अब भी धड़कती है।
(दो)
जंगल के पेड़
रात में अपने पत्तों से
पुरखों के नाम पुकारते है
और सुबह तक
घास के तिनके उन्हें याद कर रोते हैं।
(तीन)
क्या नदी का पानी
आदिवासी लड़की की हैँसी जैसा था-
जितना रोको, उतना छलकता
जितना बाँधो, उतना मचलता
गुप्त रास्तों से अकेले गाता हुआ
गुनगुनाता हुआ
कहीं और बसे प्रेमी के लिए भागा जाता हुआ।
(चार)
एक बच्चा
बिलकुल एक बेरोज़गार की तरह
ख़ाली महुए की टोकरियों में
चाँद छुपा कर ले जाता है-
ताकि उसकी झोपड़ी की दीवारों
पर सपनों की रोशनी टँक सके।
(पाँच)
खनन मशीनों की चीख़ के बीच किसी बूढी दादी की कहानी
अब भी साँस ले रही है –
पत्थर के नीचे
मिट्टी ने उसका लहजया छिपा रखा है ।
●●● जयप्रकाश मानस