March 6, 2026

“पहचान कर्मयोगी की” लेख प्रस्तुति

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संत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में लिखा गया, कि “हानि_लाभ, जीवन_मरण, यश_अपयश, विधि हाथ”। निश्चित रूप से उक्त सभी परिणाम विधि के हाथों में है। परंतु विधि भी आपको वही देता है जो आपके विचार और कार्यों में समानता का परिचायक हो। जीवन में प्रायोगिक और व्यावहारिक तौर पर स्वयं के विचारों का बहुत बड़ा दायरा होता है। हर व्यक्ति की निजी सोच एवं कार्यों का क्रियान्वयन तथा कार्यस्थल की सम_विषम परिस्थितियां, वातावरण के योगदान से यथा अनुकूल बदलाव अवश्यंभावी है।
हम जीवन और मृत्यु के प्रसंग को अपने इस विचार लेख प्रस्तुति में नहीं लाना चाहते, परंतु लाभ_ हानि, सुख_दुख, यश_अपयश, पक्ष-विपक्ष, सहमति_ विरोध जैसे शब्दों को रेखांकित करने की उत्कंठा है। यदा_कदा हमने संसार में किसी समृद्ध शाली व्यक्ति को अचानक कर्ज में डूबा हुआ देखा। पुनः उसी को खुद के हिम्मत और हौसले से दुनिया में श्रेष्ठतम पदवी पाते हुए देखा। उस महान व्यक्तित्व को इस सदी के महानायक की पदवी पाते हुए देखा। हम लोग इस महान व्यक्ति पर गर्व करते हैं। मान_सम्मान ,यश-अपयश, सुख_दुख में साथ साथ ही हर व्यक्ति अपनी मेहनत लिप्त रखता है, अथवा उदासीन ही रह जाता है, नितांत मनमौजी भी। दूसरों से सरोकार भी नहीं रखने वाला। दोनों ही स्थितियों में ईश्वर का प्रतिसाद प्राप्त होता है। अति रईस लोगों को नशे में, जुएं में, ऐशो आराम में , विसंगतियों और कुरीतियों से मिटते सिमटते समाप्त होते भी देखा है। उनके आड़े उसका कर्म आता है, जिसे कहा जाता है, विधि ने बदनामी दी, नुकसान दिया, अपयश प्रदान किया। परंतु उन सबके पीछे खुद का ही लेखा_जोखा काम करता है।
देखा जाता है, आपकी बढ़ती प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, क्षमता, सामर्थ्य के कारण विद्वेष, विरोध, अवरोध के पत्थरों से सामना करना पड़ता है। विज्ञापन की दुनिया में एक बहुत पुराना विज्ञापन सुना देखा होगा, “तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे”। सच मानिए! ऐसा ही चक्र_कुचक्र आपके इर्द_गिर्द चला करता है। कभी तो ज्ञात भी होता है, और कभी अंजान भी रहते हैं। यदि आप अपने कदमों को सतत शीर्ष स्थान देने हेतु सत्कर्म में लिप्त और संयत विचार श्रृंखला से चलते हैं, तब आपको मिली सफल यश कीर्ति पताका के ध्वज वाहक आप बनते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे अनेक लोग भी समाज में हैं, जिन्हें उनका कर्म आपको नुकसान पहुंचाने, प्रतिष्ठा में बट्टा लगाने में व्यतीत होता हैं।आपके पीठ पीछे की दुनिया किसी और के सपनों की दुनिया होती है। पूर्व राष्ट्रपति महान वैज्ञानिक का ऐसे सपनों के लिए कथन सुना है, कि सपने वो नहीं जो रात में सोते हुए देखे जाते हैं। वरन सपने वो होते हैं जो दिन में दशा, दिशा और दायित्व प्रतिपालन में विकासोन्मुखी कदमों से परिणाम तक पहुंचाते हैं। यही वास्तविक सपना सफल है। आपको ये भी तय करना चाहिए, कि आप अन्य को सफल बनाना चाहते हैं, या स्वयं को सफलता दिलाना चाहते हैं।
अपनी झोली की ताकत, अपनी निस्वार्थ मेहनत, समय का सच्चा सदुपयोग और समयानुसार दायित्व पूर्ति मार्ग आपको यश, सम्मान, प्रतिष्ठा दे पाता हैं। जीवन के किसी मोड़ पर ये न सोचें, कि अमुक राह में कभी पराजित हुए हैं, आपकी प्रतिष्ठा खोई है, वरन यही सोचें कि हर समय भगवान आपको वो नहीं देता जो आप चाहते हैं। वरन वो देता है, जो आपके स्वभाव सामर्थ्य के अनुसार जरूरी है। ताकि आपकी जिंदगी में परेशानियां, बदनामी घर न बना सके। उस जीतनेवाले से ज्यादा आपकी पराजय आपको प्रतिष्ठा दे रही हो, लोग आपकी कमी महसूस करते हों, उनको खुद की गलतियों का एहसास होता हो, तब इसे ईश्वर का दिया हुआ वरदान ही तो मानेंगे! अतः स्वतः सिद्ध होता है, कि यश अपयश, बद बदनाम, जय पराजय की उपाधियां ईश्वर के ही अधीन हैं।
सृष्टि की रचना करने में हर जीव, प्राणी मात्र, और हरेक वस्तु का अवलोकन किया जाए, तो इसमें एक सिरा ऊंचाई को दर्शाता है। तो दूसरा छोर निचाई को इंगित करता है। अतः ऊंचाई_निचाई, उत्थान_ पतन, उठना_गिरना, ताकत-कमजोर, सुखी_दुखी ऐसे ही हालातों से निर्मित हुए हैं। इनके मध्य तर्क_कुतर्क,
पक्ष_विपक्ष, सहमति_असहमति के स्वर गुज़र होते हैं। सृष्टि को जिस रूप में लोग स्वीकार करते हैं, उनकी दृष्टि भी वैसी वैचारिक सुविधा_दुविधा में लगी रहती है। सकारात्मक व्यक्ति को सहज कार्य करने में आनंद आता है, तो नकारात्मक पक्षधर के लोगों को काम बिगाड़ने और विरोध पैदा करने में सुकून मिलता है। और ये सारा खेल नेता बनने के जुनून का होता है। सत्ता के लिए संघर्ष उनके लिए बाएं हाथ का खेल है, इसलिए दाएं हाथ को महत्व नहीं देता और पतन की तरफ लाता है।
घर ,परिवार,समाज, देश सभी जगह अलग अलग स्तर पर उक्त सभी हालातों के तथाकथित नेता जन विराजमान होते हैं। जिन्हें किसी भी प्रकार की प्रगति, विकास, स्वच्छ और स्वस्थ रिश्तों से परहेज़ रहता है। और केवल विरोध करने के सारे पैंतरे आजमाइश से लबरेज रहता है। इसलिए अपने लेख को अंतिम चरण में रखते हुए एक पुरानी फिल्म “पहचान” के एक गाने को रेखांकित करता हूं।
” पैसे की पहचान यहां, इंसान की कीमत कोई नहीं,
बचके निकल जा इस बस्ती से करता मोहब्बत कोई नहीं”
महान संत तुलसी दास जी की लाइनों को शिरोधार्य करता हूं नमन करता हूं। ईश्वर प्रदत्त जीवन से यही शिक्षा है, पहचान करनी हो तो सर्वप्रथम स्वयं से स्वयं की पहचान करने का सामर्थ्य रखें। ईश्वर आपको आपकी प्रतिभा, कला, साहस क्षमता के अनुरूप देता ही रहेगा। कर्मयोगी की सदा विजय होती है।
जय श्री कृष्ण।
(लेख प्रस्तुति: डॉ विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’ दुर्ग)

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