पितृपक्ष में कवि : स्मृतियां श्रीकांत वर्मा की
[ जन्म : 18 सितंबर, सन् 1931 ]
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जहां बीता था संघर्ष समूचा
जहां बेआवाज़ हँसी फिसलती थी बारंबार
भीतर ही भीतर सूखते थे दुःख जिन गलियों में
घुटन घेरती थी पल-प्रतिपल जहां
वहीं थे साथी सहोदर , हमराही कुछ दर्दी।
पाठ, टीकाएं और गद्य जिनका पढ़ते हुए
जहां वे बदल रहे थे एक मुकम्मल श्रीकांत वर्मा में।
वे जगहें जहां से गुज़रा करते थे रोज़ ही
धूल – मिट्टी , पसीना और गंध धान – मिंजाई की
रावत नाच महोत्सव की टेर
शनीचरी बाज़ार का वह घुमंतू इलाका।
छोटा पड़ता था मानो एक कस्बाई शहर
बड़ा बनने का स्वप्न बुन रहे आदमी को
अब यह प्रबल वेग ही तो था
कि असमाप्त होती बेचैनी के बीच भी
तान रहे थे शामियाना बड़ा कोई अदृश्य
गढ़ रहे थे बिलासपुर में दिल्ली !
रचा , लिखा
कितने ही ‘मगध’ भीतर उमड़ते गए
भले बोला न जाता हो , बोला भी नहीं,
नेपथ्य लेकिन बिलासपुर बना रहा आजीवन।
साक्षी वह शहर छत्तीसगढ़िया
निकला नहीं, बना रहा भीतर
जबकि निकल गए थे वे
‘बेलासपुरिया श्रीकांत’ को वहीं छोड़
नए व्याकुल- आकाश की गहरी तलाश में।
फतह की जब दिल्ली
झूला सुख का झूला
तब भी कहीं वे बैठकें
कपड़ा प्रेस करने वाले की वह दुकान
आयरन के भीतर विलंबित सुलगता कोयला
ठीक उसी तरह सुलगता था
भीतर एक मगध हर पल बेचैन!
उनके बग़ैर भी है बिलासपुर
और किनारा अरपा नदी का
एक मार्ग है उनका नामोल्लेख दिखाता
लिखा हुआ तो रहेगा ही हमेशा उनका
जैसे मगध नहीं , मगध कविता तो है
श्रीकांत वर्मा नहीं
श्रीकांत वर्मा का रचना संसार तो है।
इस तरह वे रहेंगे – जब तक रहेगा बिलासपुर
और कोई शहर जाता है कहीं ?
कहीं नहीं जाता
हम ही इधर-उधर हो जाते हैं!
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राजेश गनोदवाले