विसंगतियों को निशाना बनाने वाले शीर्षस्थ व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी
(आलेख : स्वराज करुण )
हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी जी का आज जन्मदिन है। लोगों को जन्म दिन के मौके पर बधाई दी जाती है ,लेकिन आज हम भारी हृदय से घोंघीजी को विनम्र नमन कर रहे हैं।छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय महासमुन्द के पास ग्राम बेलसोंडा में 28 सितम्बर 1935 जन्मे घोंघी जी अपने गृहनगर महासमुंद में 24 मई 2005 को यह भौतिक संसार छोड़ गए । हिंदी व्यंग्य साहित्य को समृद्ध बनाने में उनका अतुलनीय योगदान था। उनकी प्रकाशित रचनाओं और पुस्तकों की एक लम्बी सूची है। देश और समाज की तमाम तरह की विसंगतियों को व्यंग्य का निशाना बनाने वाले लतीफ़ साहब आज अगर हमारे बीच होते ,तो अब तक एक से बढ़कर एक ,उनकी और भी कई बेहतरीन रचनाएँ हमें पढ़ने को मिलतीं। लेकिन अफ़सोस कि ऐसा हो न सका। छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र लतीफ़ जी राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यंग्यकार थे। । उन्होंने महासमुन्द जैसे छोटे कस्बाई शहर में रहकर अपनी सुदीर्घ साहित्य साधना के जरिए देश -विदेश के छत्तीसगढ़ का नाम रौशन किया ।
लगभग आधी शताब्दी के उनके लेखकीय जीवन में विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में बड़ी संख्या में उनकी रचनाएं नियमित रूप से छपती रहीं। । देश के अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों से उनके 35 से अधिक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हुए। इनमें – तिकोने चेहरे (वर्ष 1964), उड़ते उल्लू के पंख (1968), मृतक से क्षमा याचना सहित (वर्ष 1974), बीमार न होने का दुःख (वर्ष 1977), संकटलाल ज़िंदाबाद (वर्ष 1978), बुद्धिमानों से बचिए (वर्ष 1988) और मंत्री हो जाने का सपना (वर्ष 1994)और बतरस भी उल्लेखनीय हैं। अपनी धारदार व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से उन्होंने हमेशा देश की सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक विसंगतियों पर निशाना साधा और व्यंग्य बाणों की बौछारों से व्यवस्था की विद्रुपताओं पर तीखे हमले किए।
मुस्कुराहटों के साथ तिलमिलाहट उनकी व्यंग्य रचनाओं की विशेषता थी ,जो किसी भी बेहतरीन व्यंग्य रचना की सफलता के लिए अनिवार्य है । जिसे पढ़कर पाठकों को हँसी तो आए लेकिन व्यवस्था जनित विसंगतियों पर गुस्सा भी आए । तरह -तरह की विवशताओं में कैद ,परेशान ,हलाकान इंसानों का चित्रण देखकर मन करुणा से भर उठे , वही असली व्यंग्य है। इस मायने में लतीफ़ घोंघी राष्ट्रीय स्तर के एक कामयाब और शानदार व्यंग्यकार थे। उन्हें समय -समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
वह पेशे से वकील थे ,लेकिन जीवन के पूर्वार्ध में उन्होंने आजीविका के लिए कई काम सीखे ,कई व्यवसाय किए ।
दर्जी का काम भी किया। सरकारी प्राथमिक स्कूल में अध्यापक की नौकरी की। बाद के वर्षों में वकालत की पढ़ाई करने के बाद अधिवक्ता के रूप में महासमुन्द कोर्ट में प्रेक्टिस करने लगे। साहित्य के अलावा संगीत में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। गायन ,वादन के शौकीन थे। व्यंग्य लेखक के रूप में उनकी एक बड़ी ख़ासियत यह थी कि वह अपनी किसी भी रचना की कोई भी कॉपी पहले किसी कागज या रजिस्टर या डायरी में हाथों से लिखकर नहीं रखते थे। उसे एक ही बार में ,एक ही स्ट्रोक में अपने छोटे-से पोर्टेबल टाइपराइटर पर टाइप कर लेते थे और छपने के लिए भेज देते थे। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनके व्यंग्य साहित्य पर कई शोधार्थियों को पी-एच.डी. की उपाधि मिल चुकी है। कई लघु शोध प्रबंध भी लिखे गए हैं।।छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी ने भी उनके चयनित व्यंग्य लेखों का संकलन प्रकाशित किया है।
आलेख -स्वराज करुण