शुक्रिया दोस्त
मुझे याद नहीं वर्षों की गणना
मैं कब आया हूँगा तुम्हारे सौर मंडल में!
पूछना धरती के सात आवारा समुद्रों से
जिनका हृदय बहकने लगता है
मेरी एक झलक से ही।
तुम्हारे बादल ढकने में लगे रहते हैं
धरती के अनावृत वक्ष या फिर कंचन जंघाएं
जिन्हें देख कर मैं रहता हूँ तपस्या-रत
किसी निर्विकार योगी की तरह!
कितनी कहानियाँ गढ़ ली हैं तुमने
मुझे देख कर!
सारा एक पक्षीय संवाद
क्योंकि मैं निरापद हूँ!
कह लेते हो मुझे प्रेयसी का चेहरा
या किसी कठोर मानिनी का
दर्प और धब्बों से भरा निस्तेज मुख।
सोचो तो ज़रा प्रेम भी तुम्हारा ही होता है
और ईर्ष्या से उपजी घृणा भी!
चाहो तो बना लेते हो मुझे चंदा मामा
गाते हो कितने ही गीत
और स्नेह से माँगने लगते हो कोई अनूठा उपहार!
सब कल्पनाएँ हैं तुम्हारी
मैं तो कुछ भी नहीं जानता!
हाँ, देखता मैं भी हूँ तुम्हें….
जब तुम रात रात भर मुझे देखते हुए
जागती हो अपनी पीड़ा और दुखों के साथ,
द्रवित होता है मेरा मन!
उतर कर तुम्हारी आँखों में
पोंछता हूँ तुम्हारे आँसू
चूमता हूँ तुम्हारा मस्तक
सहलाता हूँ तुम्हारे केश।
भोर में तुम्हें सुलाकर
भारी मन से लौटता हूँ अपने घर
उषा से नज़रें बचाते हुए!
अक्सर तुम्हारे पास आता हूँ मैं
फिर भी तुमसे बहुत दूर हूँ मैं!
शायद हज़ारों प्रकाश वर्ष दूर…
शुक्रिया
तुमने याद किया दोस्त!
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सुनेत्रा,
तुम लिखो न लिखो,
कभी-कभी चाँद भी लिख लेता है मुझे ख़त।
—- राजेश्वर वशिष्ठ