फ़ेस है, लेकिन वह फ़ेक है
जयप्रकाश
( दरसल यह पुरुषों के बारे में है)
अब प्रेम मोबाइल स्क्रीन पर उगता है, जैसे किसी पुराने खेत में अब सब्ज़ी नहीं, नोटिफ़िकेशन उगते हैं। हर ‘लाइक’ किसी काँच के प्याले में रखा गुलाब है – जो असली नहीं, पर दिखता बहुत सुंदर है।
स्त्रियाँ अब प्रेम नहीं करतीं, वे उसे पोस्ट करती हैं। उनकी मुस्कानें इमोजी हैं, जो हर भाव में एक ही आकार की रहती हैं।
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प्रेम अब आत्मा का नहीं, नेटवर्क का मामला है । सिग्नल गिरा तो प्रेम भी गिरा।
वे अपने जीवन की थकान को फिल्टर में छुपा लेती हैं। रात का अकेलापन अब स्क्रीन की नीली रोशनी से भरा है, जहाँ कोई “टाइपिंग…” करता हुआ दिखता है – पर कभी आता नहीं।
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कभी-कभी वे कविता लिखती हैं – जैसे किसी टूटी हुई खिड़की से बाहर झाँकती हों, पर हवा की जगह अब केवल कमेंट्स आते हैं, जो कहते हैं – “वाह”, और कुछ नहीं।
वे हर बार अपने को व्यक्त करती हैं, पर उनका व्यक्त होना जैसे किसी परदे के पीछे से गुजरना है। उनका चेहरा असली है, पर उजाला कृत्रिम। उनकी आहें असली हैं, पर ध्वनि म्यूट।
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प्रेम अब एक ऐप है – जहाँ ‘ब्लॉक’ करना मृत्यु है,‘अनफ़ॉलो’ करना विस्मृति, और ‘लॉगआउट’ होना, पुनर्जन्म।
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वे स्वतंत्र हैं – पर उनकी स्वतंत्रता भी पासवर्ड से सुरक्षित है। वे कहती हैं, कोई सवाल मत पूछो, क्योंकि सवाल अब न प्रेम का हिस्सा है, न कविता का।
वे किसी के प्रेम में नहीं, बल्कि अपने ही प्रोफ़ाइल की चमक में खोयी हैं। जहाँ हर पोस्ट कहती है – “देखो, मैं अब भी सुंदर हूँ, अब भी ज़िंदा हूँ।”
मगर भीतर कहीं एक धूल-सा बचा है – पुराना, अनलॉग्ड प्रेम,
जो कभी किसी चिट्ठी में लिखा गया था, और अब स्क्रीन पर नहीं मिलता।
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