डंक : विशाखा की पंक्तियों में लघुकथा
बालकनी के कोने में, वॉशिंग मशीन के नीचे मिट्टी का छोटा-सा घर बना था। पहले सिर्फ़ पीली-काली ततैया दिखती थी, घर नहीं। कुछ दिनों बाद घर भी दिखने लगा- और उसके साथ डर भी।
बालकनी किचन से लगी थी।कामवाली रोज़ वहीं से गुज़रती- “मैडम, डंक मार देगी। हटवा दीजिए।”
मैंने हँसकर टाल दिया- “इतनी ज़ल्दी भी क्या है।” पर मैं बचपन में अमरूद के पेड़ के पास डंक का दर्द झेल चुकी थी।
ततैया को यह कोना सबसे सुरक्षित लगा होगा – बारिश से बचा, मशीन का स्थिर स्टैंड। मगर हर रोज़ मशीन चलती थी, हर रोज़ उसके पास जाना पड़ता था। डर अब दूसरों के लिए भी था।
एक सुबह मैंने झाड़ू के डंडे से वह घर हटा दिया। मिट्टी बिखर गई। ततैया लौट-लौट कर ख़ाली जगह को देखती रही—घूमती, ठहरती, मानो किसी का विलाप हो।
बच्चे ने पूछा : “मम्मी, वह क्यों घूम रही है?”
मैंने झूठ बोला: “शायद उसके घरवाले बुला रहे होंगे।”
ततैया कुछ देर वहीं मँडराती रही, फिर उड़ गई। बालकनी में अब बस एक ख़ाली कोना था – और उस कोने को देखते हुए पहली बार मुझे लगा, डंक मुझ पर नहीं, मैं किसी और पर मार आई हूँ।
●●● जयप्रकाश मानस