अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
इस अवसर पर पढ़िए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार- 2025 विजेता बानू मुश्ताक की कहानी ‘कफ़न’ का मेरा अनुवाद.
यह अनुवाद नया ज्ञानोदय के अगस्त-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित हुआ है:
कफ़न – बानू मुश्ताक
जब शाज़िया फज्र (सुबह पढ़ी जाने वाली नमाज़) के लिए समय पर नहीं उठ पाती, तो वह इसका दोष अपने हाई ब्लड प्रेशर को देती, और कहती, ‘इन कमबख़्त गोलियों की वजह से तो मुझे चैन ही नहीं है.’
उसकी माँ कहती ‘यह सब शैतान की चाल है. शैतान सुबह-सुबह आता है, तेरे पाँव दबाता है, तुझे कंबल ओढ़ाता है, पीठ थपथपा कर तुझे सुला देता है ताकि तू नमाज़ न पढ़ सके. तुझे उसे लात मारकर भगाना चाहिए और फ़ज्र के लिए समय पर उठने की आदत डालनी चाहिए.’ शाज़िया को यह विचार बड़ा रोमांटिक लगता कि एक नौकर की तरह शैतान उसके पाँव दबाता है. इस विचार पर खुश होते हुए वह उसे लात मारने का नाटक करती और इस प्रकार शैतान के बहाने उसकी देर से उठने का आदत बनी रही.
उस दिन भी वह जब गहरी नींद से जागी तो सुबह हुए काफी देर हो चुकी थी. जब उसकी आँखें खुली, तो वह चौंक गई. कुछ देर तक वह समझ ही नहीं पायी कि वह कहाँ थी. उसने अपना हाथ फैलाया और अपने पति को बगल में पाया. जब उसने देखा कि उसका सिर अपने तकिये पर था, कि उसने अपनी आयातित कंबल ओढ़ रखी थी, तक उसे यकीन हुआ कि वह अपने कमरे में थी, अपने घर में थी. और यह सोचकर उसे सुकून मिला.
लेकिन यह सुकून ज़्यादा देर नहीं टिक पाया. उसने बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनी और जब वह धीरे से खड़ी हुई और दरवाज़े की तरफ गई, उसे अपने बेटे फ़रमान की आवाज़ सुनाई दी. वह जल्दी से बरामदे में आई, वहां अल्ताफ़ खड़ा था — वह परेशान नज़र आ रहा था. फ़रमान उसे समझा रहा था. ‘जो होना था, हो गया,’ वह कह रहा था, ‘यह सब किसी के हाथ में नहीं है. तू चिंता मत कर, घर जा. जब अम्मी उठेंगी तो मैं सब कुछ तेरे घर भिजवा दूंगा. वे अभी सो रही हैं, उनकी तबीयत ठीक नहीं है. डॉक्टर ने उन्हें आराम करने के लिए कहा है.’
‘लेकिन भैया,” अल्ताफ़ ने कहा, ‘जमाअत ने तय किया है कि दफ़न आज शाम पाँच बजे होगा. हमें किसी के बाहर से आने का इंतज़ार नहीं करना है. इसलिए ग़ुस्ल और बाकी रस्में जल्दी करनी होंगी.’
फ़रमान ने अपना आपा खो दिया और कहा, ‘देख, तूने मुझे हिफाज़त में रखने के लिए कोई कफ़न नहीं दिया था. अम्मी को हज से आए छह-सात साल हो गए हैं. यासीन बुआ ने इतने सालों में अम्मी से कफन क्यों नहीं लिया? या हो सकता है उन्होंने ले लिया हो और कहीं रख दिया हो. जा, घर में एक बार फिर ढूंढ कर देख ले.’
शाज़िया ये बातें सुनकर चौंक गई. वह अपने बेटे के पीछे आकर खड़ी हो गई, ‘क्या हो रहा है?’ उसने कहा, ‘फ़रमान, तुम किससे बात कर रहे हो, बेटा?’ फ़रमान अपनी माँ की तरफ मुड़ा, उसके चेहरे पर अधीरता साफ़ झलक रही थी. उसने मन ही मन सोचा, ‘ये औरतें चुप नहीं बैठ सकती हैं, जब तक दूसरों के मामलों में टांग नहीं अड़ाए इन्हें खाना हजम नहीं होता.’ मगर उसने अपनी नाराजगी नहीं जताई, बस इतना कहा, ‘सो जाइए अम्मी, आप क्यों उठ कर आ गईं? यासीन बुआ का बेटा, अल्ताफ आया है; वह किसी कफन के बारे में पूछ रहा है.’
शाज़िया को लगा जैसे उस पर एक साथ हजार बोल्ट की बिजली गिर पड़ी थी. वह घबरा कर आगे आई और अल्ताफ की ओर सवालिया नज़रों देखा और गुस्से से पूछा: “सुबह-सुबह तुम यह कैसा तमाशा खड़ा कर रहे हो? कफ़न कहीं भाग तो नहीं जाएगा! तुम्हें इस बात की बिलकुल तमीज नहीं है कि किसके घर कब आना चाहिए?’ वह समझ गयी कि फ़रमान को यह सब पसंद नहीं था. अल्ताफ व्यथित होकर पीछे मुड़ा और धीमे स्वर में कहा, ‘चिक्कम्मा, अम्मी का इंतक़ाल आज सुबह फ़ज्र के वक़्त हो गया है, इसलिए मैं कफन लेने आया हूँ.’
खबर सुनते ही शाज़िया अन्दर ही अन्दर ढह गई. खुद पर काबू पाने में असमर्थ वह पास की कुर्सी पर धम्म से बैठ गई. अकल्पनीय, असंभव घटित हो चुका था. अब वह इसका सामना कैसे करेगी? इसका समाधान कैसे करेगी? वह खुद पर काबू नहीं रख पाई. वह विलाप करने लगी – ‘या अल्लाह, ये क्या हो गया.’
न चाहते हुए भी, उसका मन अतीत की ओर भागने लगा. उस दिन उसके घर में एक बड़ा आयोजन था. रिश्तेदारों और दोस्तों की भारी भीड़ जमा थी. शाज़िया और उसका पति सुब्हान हज पर जा रहे थे. वे अपने अधिकांश रिश्तेदारों एवं दोस्तों से पहले ही मिल चुके थे. उन्होंने सब को गले लगाया, उनसे माफ़ी मांगी कि अगर कभी कोई गलत बात कह दी हो, किसी को ठेस पहुँची हो, तो वे क्षमा कर दें. रिश्तेदारों ने भी दंपत्ति के लिए दावतें रखीं, अपने सामर्थ्य के अनुसार कपड़े व उपहार दिए, और उन्हें उनकी जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए दिल से माफ किया. इस रस्म अदायगी के बाद उनके परिजनों और करीबी दोस्तों ने उन्हें भाव-भीनी विदाई दी.
हज यात्रा के लिए रवाना होने में अब केवल एक हफ़्ता बाकी था. जिन रिश्तेदारों से वे नहीं मिल पाए थे, उनसे फोन पर माफ़ी मांगी गई. लम्बे-चौड़े कारोबार के मालिक सुब्हान और एक भव्य कोठी की मालकिन शाज़िया के लिए व्यक्तिगत रूप से सबसे मिलना संभव नहीं था इसीलिए उन्होंने सामूहिक दावत रखी. एक दूसरे से माफी मांगने की रस्म यहां भी जारी रही.
इस दावत में बिन बुलाए मेहमान के रूप में, बिना किसी अहंकार अथवा दुर्भावना से यासीन बुआ भी आयीं. उनका पति उन्हें शादी के तीन साल के भीतर दो बच्चे देकर हमेशा के लिए छोड़ गया था. वह एपीएमसी यार्ड में मजदूरी करता था और एक दिन भारी बोझ उठाते समय उसे दिल का दौरा पड़ा और उसकी मृत्यु हो गयी. अपने पति की मृत्यु के बाद बुआ ने इद्दत की रस्म भी नहीं निभाई. भरी जवानी में, सिर पर स्कार्फ बाँधकर वह लोगों के घरों में बर्तन माँजने, झाड़ू-पोंछा लगाने का काम करने लगी — शादी-ब्याह, वार-त्योहार, जन्मदिन जैसे हर मौके पर वह लोगों के सुख-दुख का बोझ अपने कंधों पर ढोते हुए अपने बच्चों का पेट भरती रहीं. इद्दत के दौरान वह किसी कमरे में सिर ढककर बैठी नहीं रही, न अपने दिवंगत पति के लिए दुआ मांगी और न ही शोक की अवधि का पालना किया. लोगों ने एक जवान बेवा पर तरह-तरह के लांछन लगाकर उसे बदनाम करने की कोशिश की. लेकिन बुआ के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने बच्चों का पेट भरना था. उनकी मेहनत रंग लाई — बेटी ने थोड़ा-बहुत पढ़-लिखकर लड़कियों को कुरआन पढ़ाना शुरू किया और थोड़ा-बहुत कमाने लगी और फिर यासीन बुआ ने उसके कमाए पैसों में अपनी बचत जोड़ी और उसका निकाह कर दिया. फिर वह अपने बेटे के साथ रहने लगी, जो ऑटो रिक्शा चलाता था.
उनकी सबसे बड़ी चाहत थी बेटे की शादी करना — लेकिन उससे भी बढ़कर एक और इच्छा ने उनके दिल और दिमाग पर कब्जा जमा लिया. सारे दिन वह इच्छा उनके चारों ओर पतंग की तरह मंडराती रहती. एक-एक पैसे को जोड़ने की उनकी आदत उनकी कंजूसी को नहीं, बल्कि भविष्य की अनिश्चितता को दर्शाती थी. जब उन्होंने अपने बेटे की शादी के लिए जमा पैसों में से कुछ पैसे निकाल कर कफ़न खरीदने का मन बनाया, उन्हें एक तरह का अपराध-बोध सताने लगा – मानों उन्होंने किसी की वस्तु चुरा ली थी. वे बेचैन हो गयी और तीन दिन तक नोटों की छोटी सी गठरी को अपने पल्लू में बाँधकर घूमती रहीं. लेकिन मां का स्वाभाविक प्रेम उनकी उस निजी ख्वाहिश की तीव्रता को हरा न सका. उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से बंधी पोटली को कसकर पकड़ा और तेजी से शाज़िया के घर की ओर चल पड़ी. वहां दावत में बहुत सारे लोग थे और उत्सव का माहौल था….
उन्हें दावत में बुलाया नहीं गया था. उनका स्वागत करने वाला कोई नहीं था. किसी ने उनसे खाने के लिए भी नहीं पूछा. उन्होंने अपने जीवन में कभी जाना ही नहीं था कि सम्मानित अथवा प्रतिष्ठित होना क्या होता है. अनादर को भी वे नहीं पहचानती थीं. वे चुपचाप काम करती रही – उन्होंने बर्तन मांजे, चिकन बिरयानी की चिकनी भारी प्लेटों को रगड़-रगड़ कर साफ़ किया. सबके खाने के बाद, वे सामने वाले आँगन के फ़र्श पर बैठ गईं और कुछ कौर खाए. उनका सारा ध्यान शाज़िया पर था. ‘शाज़िया कितनी भाग्यशाली औरत है.’ वे सोच रही थीं कि उसे कब फुर्सत मिलेगी, और कि वे अपनी इच्छा को उसके सामने किस प्रकार व्यक्त कर पाएंगी – साथ ही वे पूरे धैर्य के साथ शाज़िया की हर गतिविधि पर अपनी नज़र जमाए हुए थीं.
उन्होंने देखा कि शाज़िया सब को गले लगाकर, दुआएँ लेकर थक चुकी थी. कोई अपनी बेटी के रिश्ते के लिए, कोई अपने बीमार रिश्तेदार के ठीक होने लिए, और कोई अपने बेरोजगार बेटे की नौकरी के लिए दुआ मांगने के लिए कह रहा था — ‘इंशा अल्लाह, ज़रूर दुआ करूँगी.’ थकी होने के बावजूद शाज़िया उन्हें मुस्कुरा कर विदा कर रही थी. हालांकि दावत का आयोजन दोपहर में किया गया था, लेकिन लोग देर शाम तक लोग आते रहे. यासीन बुआ बर्तन धोती रहीं, प्लेटें साफ़ करती रहीं, झाड़ू लगाती रही, और अपनी बारी का इंतजार करती रहीं.
रात के करीब ग्यारह बजे, जब शाज़िया थक कर सोफे पर बैठ गई और नर्म कालीन पर अपने पाँव फैलाए, तब दरवाज़े पर उसे बुआ की परछाईं दिखाई पड़ी. शाज़िया को देखकर बुआ के दिल पसीज गया, ‘अय्यूओ बेचारी, कितनी थकी हुई है.’ उन्होंने दोनों हाथों को अपने पल्लू से पोंछा और पंजों के बल चलते हुए, अपनी गंदी और फटी हुई एड़ियों से कीमती कालीन को बचाते हुए, उसके पास पहुँची.
‘बुआ, आप कब आईं?’ शाज़िया ने थोड़ा हैरान होते हुए पूछा.
‘मैं बहुत समय पहले आ गयी थी, बेटा,’ बुआ ने जवाब दिया. शाज़िया से अंततः मिल पाने की खुशी उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी.
‘अच्छा? आप तो पूरी शाम दिखाई ही नहीं दीं.’ और फिर नरम स्वर में पूछा, ‘आपने खाना खा लिया?’
‘हाँ, ताई. मेरा जीवन अभी भी आपके घर के चावल से ही चल रहा है. अल्लाह करे आप जिसे छूएं वह सोना हो जाए, आपका घर सदा आबाद रहे.’ शाज़िया को संतुष्टि का अहसास हुआ. ‘इतनी देर हो चुकी है, बुआ. अब आप घर कैसे जाएंगी?’ इस स्त्रियोचित चिन्ता के जवाब में बुआ ने कहा ‘अल्ताफ ने कहा था कि वह मुझे अपने ऑटो में ले जाएगा. उसके आते ही मैं चली जाऊंगी.’ शाज़िया ने देखा कि बुआ सारा दिन किसी न किसी काम में लगी रही थीं, वह भारी कदमों से अपने कमरे में गयी और कुछ पैसे ले आई, ‘इन्हें रख लीजिए, बुआ — आपके खर्च-पानी के लिए. हम तीन दिन बाद हज के लिए रवाना हो रहे हैं — आप दुआ कीजिए अल्लाह हमारी हज को कबूल फरमाए.’
उसने बुआ के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और उनमें पैसे रख दिए. यासीन बुआ अभिभूत थीं. उनकी आँखें भर आईं. उन्होंने शाज़िया से पैसे नहीं लिए. इसके बजाए उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू का गांठे खोली और कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले. अपने हाथ शाज़िया की ओर फैलाए और विनती करते हुए कहा, ‘बेटा, ये छह हज़ार रुपये हैं. ‘तुम हज पर जा ही रही हो बेटा, वहाँ से मेरे लिए ज़मज़म के पवित्र जल में डुबोकर एक कफ़न लेती लाना. शायद उसी पवित्र कफ़न की बदौलत मुझे जन्नत नसीब हो जाए.’
कुछ क्षणों के लिए शाज़िया अवाक रह गई. उस समय उसे यह कोई मुश्किल काम नहीं लगा. उसने सोचा, ‘अय्यू! एक कफ़न की ही तो बात है. थोड़ा ज़्यादा ख़र्च हो गया तो क्या?’ और उसने सहज रूप से हामी भर दी.
जब नोट बुआ के हाथों से निकलकर उसके हाथों में आये उसे एक अजीब-सी अनुभूति हुई और तभी उसे समझ में आया. ग़रीबों की जेब से निकला पैसा भी, बिलकुल उन्हीं की तरह टूटा-फूटा, सिकुड़ा हुआ, झुर्रीदार और घिसा-पिटा होता है. उसे कई बार लगता था कि यदि गरीबों को कड़क-कड़क नोट भी दिए जाएं, तो कुछ समय बाद वे भी बदरंग अथवा भद्दे हो जाएंगे; अब उसे अपनी इस बात पर यकीन हो गया था. उसने कहा, ‘ठीक है बुआ, आप जाइए.’ उन्हें विदा करने के बाद शाज़िया तुरंत संलग्न बाथरूम में गई, नोटों को सिंक के ऊपर रखा, और हाथों को सैनिटाइज़र से अच्छी तरह साफ कर बिस्तर पर लेट गई.
उसे याद नहीं रहा कि उसने बुआ के दिए पैसे सिंक से उठाए थे अथवा नहीं.
वे सुबह की उड़ान से मदीना पहुँचे. नया माहौल, पवित्र ज़मीन, धार्मिक स्थलों की यात्राएं और आठ दिनों में प्रवास के दौरान अनिवार्य चालीस नवाजें, उसे समय बीतने का अहसास ही नहीं हुआ. सुब्हान ने उसे खरीददारी करने के लिए मना किया था. लेकिन उसे पाबंदियों की ज़रा भी परवाह नहीं थी. उसका मानना था कि नियम तोड़ने के लिए ही बनाए जाते हैं, और वह वही करती थी जो वह करना चाहती थी.
सुब्हान ने ‘नियत’ का सवाल उठाया. हज पर रवाना होने से पहले उन्होंने यात्रा के निर्धारित नियमों का दृढ़ता से पालन करने का निश्चय किया था. अतः उसने शाज़िया से कहा कि वह हज यात्रा के बाद खरीदारी कर सकती थी, और कि इस दौरान की गयी कोई भी खरीदारी ‘नियत’ एवं इबादत की भावना के विरुद्ध होगी.
जब वे मदीना से मक्का के लिए रवाना हुए, तो शाज़िया के लिए फिर एक नया अनुभव था. मक्का पहुँचने के बाद वह एक अलग ही दुनिया में थी. इस सबके बीच वह अपना गाँव एवं घर भूल गयी थी. मक्का में ठहरना उसके लिए एक अविस्मरणीय् अनुभव था. हज कमेटी द्वारा रिहायश की सारी व्यवस्था की गई थी — दो कमरों के बीच एक बाथरूम, एक छोटा-सा किचन, गैस सिलेंडर, स्टोव, फ्रिज, वॉशिंग मशीन वगैरह. उनके साथ उसके ननिहाल के चार सदस्य भी थे, इसलिए उन्हें बड़ा कमरा दिया गया था. जैसा कि अकसर होता है, खाना बनाने की ज़िम्मेदारी औरतों ने अपने ऊपर ले ली थी. उनका ज़्यादातर समय नमाज़, तवाफ, दुआओं और धार्मिक रस्मों में बीतता था. सऊदी सरकार ने कुछ बड़े व्यापारियों और दानदाताओं की मदद से नमाज़ बाद उनके लिए खाने के पैकेट, जूस और पानी की बोतलों के वितरण की समुचित व्यवस्था की थी. चूंकि हज यात्री अल्लाह के मेहमान थे, इसलिए उनका मानना था कि हज यात्रियों की अच्छी सेवा करने से अल्लाह खुश होता है. हर कोई उनकी खिदमत में इस तरह से लगा हुआ था मानो उनकी मेहमाननवाज़ी करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य था.
शाज़िया और उसके सभी साथी हज की बाकी रस्मों को पूरा करने में लगे हुए थे. एक दिन दोपहर को, जब शाज़िया काबा से नमाज़ पढ़कर लौटी, तो तेज़ धूप अथवा खाने के बाद की तंद्रा के कारण उसे नींद आ गई. जब वह छोटी सी झपकी के बाद जागी तो उसे थोड़ी ताजगी महसूस हुई. जल्द ही उन्हें नमाज़ के लिए अल-हरम मस्जिद के लिए रवाना होना था. जब वह वुज़ू के लिए बाथरूम गई, वहां उसने कुछ ऐसा देखा कि वह ठिठक गयी: बगल वाले कमरे की ज़ैनब पीने के पानी के डिस्पेंसर से बाल्टी भर रही थी. शाज़िया ने हैरानी से पूछा — ‘ज़ैनब, यह तुम क्या कर रही हो?’
ज़ैनब ने उसकी ओर देखा और कहा, ‘मुझे कफ़न धोना है.’
‘क्या कहा?’ शाज़िया गुस्से में बोली, “तुम पीने का पानी चुरा रही हो? क्या यह ठीक है? यहां भी तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हो?’ वह चिल्लाने लगी. ज़ैनब तुरंत बाल्टी लेकर कमरे में भाग गई और दरवाज़ा बंद कर लिया. शाज़िया समझ गयी कि क्या हो रहा था – सऊदी सरकार काबा परिसर से ज़मज़म का पानी लाकर इन डिस्पेंसरों में भरवाती थी. दो कमरों के बीच एक डिस्पेंसर रखा जाता था. प्रत्येक डिस्पेंसर में दस से पंद्रह लीटर पानी होता था, और उसे हर रोज दोपहर तीन बजे के आस-पास भरा जाता था. शाज़िया को शायद ही कभी इससे पीने का पानी नहीं मिल पाता था. सुब्हान अकसर रात को नमाज़ से लौटते वक्त उनके इस्तेमाल के लिए पांच लीटर की बोतल खरीदकर ले आता था.
ज़ैनब का जवाब सुनकर शाज़िया आग-बबूला हो गयी. उसकी धृष्टता से मायूस वह सोचने लगी कि जैनब ने इस तरह पीने का पानी चुराकर कितने कफ़न धोए होंगे. ‘या अल्लाह! क्या वह अपने पूरे परिवार को ज़मज़म में भीगे कफ़न में लिटाने वाली थी? उसने इस सब की कल्पना की और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी. अपनी पत्नी की आवाज़ सुनकर सुब्हान कमरे से बाहर आया और पूछा, ‘क्या हुआ, इतनी हँसी क्यों आ रही है?’ शाज़िया ने हँसते हुए पूरा किस्सा सुनाया और बोली, ‘देखिए न, ये लोग हज के महत्व को बिलकुल नहीं समझ सकते — पानी चुराकर कफ़न धो रहे हैं!’ सुब्हान हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, ‘मुझे पहले दिन ही इसका पता चल गया था. छोड़ो, यह लड़ने-झगड़ने की बात नहीं है.’
शाज़िया को अचानक बुआ का कफ़न याद आया — ‘अरे हां, हमें यासीन बुआ के लिए कफ़न खरीदना है. चलिए, आज शाम की नमाज से लौटने के बाद यह काम कर लेते हैं.’ अपने वादे को याद करते हुए और उसे पूरा करने के लिए तत्परता दिखाते हुए, उसने कहा. सुब्हान ने हामी भरी, और जल्दी से तैयार हो गया. जैसा कि उनका अनुमान था, जब तक वे अल-हरम पहुंचे, लोग पहले ही इकट्ठा हो चुके थे. प्रथा के अनुसार पुरुष और महिलाएं अलग-अलग खड़े थे – सिर झुकाए, श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़े. क्योंकि शाज़िया और सुब्हान को आने में देर हो गयी थी, वे दोनों मस्जिद के अहाते में साथ-साथ खड़े थे, जो देर से आने वालों से तुरंत भर गया था.
इशा की नमाज़ के बाद, वे काबा परिसर से वापस बाहर आ गए. मुख्य सड़क और छोटी सड़कों पर चल रही लाखों लोगों की भीड़ में सुब्हान समझ नहीं पाया रहा था कि उसे कफ़न की दुकान कहाँ मिल सकती है, जहाँ से शाज़िया अपनी यासीन बुआ के लिए कफ़न खरीद सके. शाज़िया का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चलना और हर दुकान पर रुक कर कफ़न के बारे में पूछताछ करना, और फिर आगे बढ़ना — यह सब थका देने वाला था. कफ़न ढूंढते समय, यकायक एक कालीन की दुकान ने शाज़िया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. वहां प्रदर्शित एक से एक बेहतर खूबसूरत डिजाइन एवं बढ़िया बुनाई वाले कालीनों ने शाजिया का मन मोह लिया. उनमें से एक कालीन उसे बेहद पसंद आया और उसने अपने पति से बिना पूछे ही सौदेबाज़ी शुरू कर दी, और सुब्हान की उसे खरीददारी करने से रोकने की योजना धराशायी हो गयी. उसकी ‘नीयत’ और हज यात्रा के लिए तय किए गए नियम-कायदे – जैसे भावनात्मक मुद्दे हवा में उड़ गए थे. वह सुब्हान से किए अपने वादे को भूल गयी थी कि वह हज की सारी रस्में पूरी होने के बाद ही खरीदारी करेगी. सुब्हान ने उसे कालीन की दुकान से बाहर निकालने की भरसक कोशिश की, लेकिन उसके सारे प्रयास बेकार साबित हुए.
हर तरफ से बेखबर वह उस तुर्की कालीन में खोई हुई थी, जिसे उसने पसंद किया था. हार मानकर, सुब्हान ने दुकान के सहायक से धीरे से पूछा, ‘क्या हमें कफ़न मिल सकते हैं?’ सहायक तुरंत प्लास्टिक में लिपटा कफ़न लाया, जो लाश जितना भारी था. उसने शाज़िया का ध्यान खींचने की पूरी कोशिश की. शाज़िया ने उसे मजबूती के साथ पकड़ा और अपने बाएँ हाथ से उठाने की कोशिश की — ‘अय्यप्पा, कितना भारी है! हम इसे कैसे ले जाएंगे?’ उसने कहा, और उसका ध्यान वापस कालीन की ओर चला गया.
आखिरकार उसकी खरीदारी पूरी हुई. सुब्हान ने पैसे दिए और बिना किसी संकोच के उस भारी कालीन को अपने कंधे पर उठा कर बाहर आ गया.
वहाँ किसी कुली या ऑटोरिक्शा की उम्मीद करना बेकार था, इसलिए वह खुद ही कालीन को घसीटने लगा. आशा के विपरीत उसे बार-बार परिचित लोग मिलते रहे. शाज़िया को भी बुरा लगा और उसने प्यार से पूछा, ‘बहुत भारी तो नहीं है, रिए?’ उसने कुछ नहीं कहा. वह बेहद गुस्से में था. घर आकर उसने कालीन को कमरे के कोने में पटक दिया और आह भरी. कोई और मौका होता तो वह ज़रूर कुछ कहता. लेकिन क्योंकि यह हज का समय था, और कमरे में मौजूद सभी उसके रिश्तेदार थे, उसने खुद को शांत रखा.
उनकी हज यात्रा पूरी हुई. हालाँकि दोनों को लगा कि हज यात्रा के दौरान छोटी-मोटी गलतियां हुई थीं, फिर भी दोनों संतुष्ट थे. एक बार जब वे मीना से लौटे, तो शाज़िया ने बिस्तर पकड़ लिया, जिससे कुछ चिन्ता हुई. उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया था और उसे दो दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था. अस्पताल से डिस्चार्ज और एक दिन के आराम के बाद ही उसका ब्लड प्रेशर सामान्य हो पाया. उसे, हालांकि, सबसे बढ़कर इस बात की झुंझलाहट की थी कि उसकी खरीददारी का समय बर्बाद हो रहा था. उसने सुब्हान के सामने जोर देकर कहा कि उसकी तबीयत ठीक थी, और जल्द ही वह बेहतर महसूस करने लगी. सुब्हान खरीदारी टालने की कई रणनीतियों पर विचार करता रहा – सवाल पैसे का नहीं था, वह जानता था कि ज़्यादा सामान होने पर फ्लाइट में दिक्कतें आ सकती थीं, वह उस जाल में फंसना नहीं चाहता था. साथ ही वह न तो शाज़िया को निराश करना चाहता था और न ही उसके ब्लड प्रेशर को बढ़ाना चाहता था, इसलिए उसकी (शाज़िया की) खरीददारी में कटौती करने की उसकी योजनाएं धराशायी हो गयी. शाजिया को रोकने वाला कोई नहीं था.
खरीदारी की भागदौड़ में यासीन बुआ और उनके कफ़न के विचार बार-बार उसके दिमाग में कौंधते रहे, आते-जाते रहे, और धीरे-धीरे वह उस बात को पूरी तरह से भूल गयी. इस अद्भुत जगह पर आकर, कफ़न जैसी मनहूस व बोझिल वस्तुओं के बारे में सोचना….या अल्ला….वह भारत में भी मिल सकता है! क्या हमारे गाँव में नहीं मिलता? मैं यह कह भी तो सकती हूँ कि मुझे वह मक्का में नहीं मिला. हम्म! क्या मैं हज से लौटने के तुरंत बाद इस प्रकार के झूठ बोल सकती हूँ? ‘तौबा, तौबा,’ उसने अपने गालों पर हलकी-सी चपत लगाते हुए कहा. उसे उम्मीद नहीं थी कि यासीन बुआ की इच्छा उसके लिए परेशानी का सबब बन जाएगी.
अब, यासीन बुआ के इंतकाल की खबर सुनकर, वह उनकी अधूरी इच्छा के परिणामों के बारे में सोचकर व्याकुल हो गयी. अय्यो! यदि उसे पता होता तो वह अपना वादा अवश्य निभाती, चाहे उसे थोड़ी-बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता, वह दुख से तड़फ उठी.
जब वे हज से लौटे, शाज़िया ने इतना सामान खरीद लिया था कि उन्हें उस अतिरिक्त सामान को दूसरे साथियों के बीच बांटना पड़ा. इस काम को ठीक से अंजाम देने की प्रक्रिया में सुब्हान थक कर चूर हो गया. शाजिया ने बस इतना किया कि बुरका पहने, हाथ में बैग लटकाए, वह हर छोटी से छोटी बात के लिए अपने पति के पास भागती रही, जिससे सुब्हान की चिड़चिड़ाहट और बढ़ गयी. आखिरकार, काफी जद्दोजहद के बाद वे अपने सारे सामान को ठीक से लोड कर फ्लाइट में चढ़ने में कामयाब हुए.
हज से लौटने के एक महीने बाद तक, शाज़िया हज यात्रा के दौरान खरीदे सामान को अपने रिश्तेदारों एवं दोस्तों में बांटती रही. पहले तीन दिन तक वह बीमारी और जेट लैग के कारण बिस्तर से नहीं उठ पाई. उसके बाद सामान खोलने का सिलसिला शुरू हुआ. सबसे पहले उसने कीमती तोहफों को अपने सबसे करीबी एवं प्रियजनों को भिजवाने की व्यवस्था की. फिर उसने कीमती कालीन खोला, और बहुत खुश हुई. इस सब के बीच सुब्हान के अनमनेपन की ओर उसका ध्यान बिलकुल नहीं गया. फिर जिनके लिए वह कपड़े, खिलौने आदि लाई थी, उनके यहां पहुंचाए. उसके कुछ करीबी दोस्तों एवं रिश्तेदारों ने खास किस्म की डिजाइन व कढ़ाई वाले बुरके मंगवाए थे. कुछ ने पैसे दिए थे. दूसरों के लिए, उसने दायित्व की भावना से वशीभूत होकर उपहार के रूप में बुरके भिजवाए. बाकी सब के लिए उसने जा-नवाज़, तसबीह एवं मुट्ठीभर खजूर के साथ ज़मज़म पानी की बोतलें भिजवाईं. हालांकि यह सब उसने अकेले नहीं किया, उसकी निगरानी में हुआ था. फिर भी सारे काम को निपटाने में एक महीना से ज्यादा समय लगा और वह थक गयी.
यह मान्यता है कि जो हज से लौटकर आते हैं उनमें काफी सकारात्मक एवं आध्यात्मिक ऊर्जा समाविष्ट होती है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह उर्जा नष्ट न हो और बल्कि अल्लाह की इबादत में लगे, मुसलमान चालीस दिन तक घर पर रहते हैं, और इसका पालन सख्ती के साथ, एक संकल्प की तरह किया जाता है. शाज़िया ने भी इसका पालन किया. इन दिनों यासीन बुआ तीन-चार बार घर पर आईं, और अपनी आदत के अनुसार चुपचाप अपना काम निपटाकर चली गयीं. हर बार यासीन बुआ को यही बताया गया कि शाज़िया नींद में थी, या आराम कर रही थी, या नमाज़ पढ़ रही थी या फिर किसी महत्वपूर्ण काम में व्यस्त थी. बुआ एक तरफ तो अपने कफ़न को देखने के लिए बेताब थीं और दूसरी तरफ वह हाज्जा शाज़िया के पास जाने, उससे मिलने के लिए उतावली थीं, अपने खुरदरे हाथों में उसके हाथ लेना चाहती थीं, उन्हें दबाना चाहती थीं. वह बड़ी उम्मीद के साथ इंतज़ार पर इंतज़ार करती रहीं कि शायद शाज़िया उसके लिए तोहफा लाई होगी.
आखिरकार, शाज़िया प्रकट हुई और बुआ के लम्बे इंतज़ार के यातनादायक दौर की साक्षी बनी. उस दिन जब शाजिया तैयार होकर, एक शानदार आसमानी रंग का चूड़ीदार सूट और सिर पर मैच करता हुआ कसूती-कढ़ाई वाला दुपट्टा ओढ़ कर बाहर आई तो यासीन बुआ ख़ुशी से झूम उठी. उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने दौड़कर शाज़िया के हाथों को अपनी आँखों पर रख लिया. हाज्ज़ा के हाथों को छूकर उन्हें लगा वे भी आध्यात्मिक रूप से पाक हो गयी थीं, और उनके हाथों के रोंगटे खड़े हो गए. शाज़िया ने अपने हाथ छुड़ाए और औपचारिक मुस्कान के साथ बात शुरू की, ‘कैसी हो, बुआ?’ और फिर वह तेज़ी से अपने कमरे में गयी और एक जानमाज़ और तसबीह लाकर बुआ को देते हुए कहा, ‘यह लो, आपके लिए लायी हूँ.’ यासीन बुआ जिसे देखने के लिए तरस रही थीं, वह वहाँ नहीं था. यही वह पल था जब ज़मज़म के पानी में भीगे कफ़न में लिपटकर अल्लाह की ओर यात्रा करने की उनकी ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी. उन्होंने तोहफे लेने के लिए अपने हाथ आगे नहीं बढ़ाए, निराशा के अंधकार में डूबी वे बस शाज़िया को अविश्वास से देखती रहीं. अपने अंदरूनी साहस को जुटाकर उन्होंने दृढ़ एवं स्पष्ट आवाज़ में शाजिया से कहा, ‘मुझे यह सब नहीं चाहिए. मुझे मेरा कफ़न दे दो. शाज़िया को इसकी उम्मीद नहीं थी, उसे बहुत गुस्सा आया. उसे छुपाने की जहमत उठाए बिना, उसने ऊंची आवाज़ में बुआ को फटकारा, ‘छी! भला कोई जानमाज़ लेने से मना करता है?’ लेकिन बुआ टस से मस नहीं हुईं. वे अपनी बात पर अड़ी रहीं, ‘मेरे पास अब भी आपकी सास का दिया जानमाज़ है जिसे उन्होंने हज से लौटने पर दिया था. जब भी मुझे समय मिलता है मैं उसे बिछाकर नमाज़ अदा करती हूँ. इस नए एवं खूबसूरत जानमाज़ को मैं कहाँ रखूँगी? मुझे अब और कितना जीना है? मैं और कितनी नमाज़ अदा कर पाऊंगी? मुझे और कुछ नहीं, बस कफ़न चाहिए.’
शाज़िया ने बुआ को इस रूप में पहले कभी नहीं देखा था. यह वही बुआ थीं जो नम्रता से झुककर चलती थीं, हर वक्त उसकी तारीफ़ करती थीं, दुआएँ देती थीं — ‘अल्लाह तुम्हें लंबी उम्र दे, दौलत दे, तुम्हारा परिवार खुशहाल रहे, तुम्हारा वैवाहिक जीवन सलामत रहे. अल्लाह तुम्हें जन्नत में मानिक-मोती का घर दे.’ यह बुआ कौन थी जो इतनी तनकर खड़ी थीं.
शाज़िया का गुस्सा अब अपने उफान पर था. वह भूल गयी कि वह अभी-अभी हज से लौटी थी. ‘कौन सा कफ़न? किस कफ़न की बात कर रही हो? मरने के बाद कोई न कोई आपको कफ़न में लपेट ही देगा! इतना तमाशा क्यों? बुआ, आपको क्या हो गया है, आपका दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया है? आपने मुझे कितने पैसे दिए थे? ठहरो, मैं अभी उसका दस गुना आपके मुंह पर फेंकती हूँ! और हां, आइंदा अपनी शक्ल मत दिखाना!’ वह चिल्लाई और सीधा अपने कमरे में चली गयी. जब वह पांच सौ के दो नोट लेकर बाहर आई, तो उसे यासीन बुआ कहीं दिखाई नहीं दीं. अपने गुस्से को देखते हुए, वह बुआ को आसानी से जाने देने वाली नहीं थी. वह जल्दी से किचन में गयी, मकान के पीछे बरामदे में गयी, उसने पास की गली में झांका, लेकिन बुआ कहीं नहीं दिखी. आखिरकार उसने नोट तिपाई पर रख दिए और बुदबुदाई, ‘मेरी बला से जहन्नुम में जाए.’ जैसा शाज़िया चाहती थी, यासीन बुआ फिर कभी उसके सामने नहीं आयी. यह सोचकर कि अच्छा हुआ उनसे छुटकारा मिल गया, वह शांति और संतुष्टि के भाव से बिस्तर पर लेट गयी. ‘लेकिन, बुआ ऐसा कैसे कर सकती थीं?’ यह सवाल उसके मन में यदा-कदा उठता रहा और उसके दमित गुस्से को भड़काता रहा. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, जब बुआ अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहती थीं? शायद वह रमज़ान अथवा बकरीद के मौके पर बख्शीश मांगने आ जाए. लेकिन उसने बुआ के आत्म-सम्मान को कम करके आँका था. वे कफ़न पर एक नज़र डालने के लिए, बस एक बार छूने के लिए कितनी उत्सुक थीं – अपने निकाह के तोहफे का इंतज़ार करती दुल्हन की तरह. गहनों एवं आलीशान पोशाक में सजी-संवरी शाज़िया ने उस दीन-हीन बेसहारा के साथ जो बर्ताव किया था, वह उनके दिल में ज़ख्म का एक गहरा दाग छोड़ गया था.
अपने बुरे से बुरे सपने में भी शाज़िया ने यह नहीं सोचा था कि बुआ अपनी मौत के बाद भी उसे इतना परेशान करेंगी. वह आकस्मिक पीड़ा के भार से ढह गयी. उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? यदि बुआ एक लाख रुपए का कफ़न भी मांगती, शाजीया उसे देने को तैयार थी, लेकिन ज़मज़म के पानी में भीगा मक्का से लाया कफ़न, या अल्लाह, अब वह क्या करे? वह इस बात को लेकर परेशान थी कि अपनी गलती कैसे सुधारे. मैं क्या करूं, क्या करूं, इसी उधेड़बुन में घबराकर वह मोबाइल लिए जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर की मंजिल के खाली कमरे में आ गयी. वह पसीना-पसीना हो रही थी और बुरी तरह काँप रही थी. कितना दुर्भाग्यपूर्ण! क़यामत के दिन, यदि यह अभागी औरत अल्लाह के सामने अपना आँचल फैलाकर इंसाफ़ मांगेगी, तो मेरे सारे अच्छे कर्मों के बावजूद मैं ही दोषी ठहराई जाऊंगी, शाज़िया ने घबराकर सोचा. उसके सामने यह स्पष्ट हो गया कि असल में वह बुआ से भी अधिक गरीब थी और अभागी भी.
कफ़न बुआ की अंतिम इच्छा थी, वरना उनका बेटा सुबह-सुबह कफन लेने क्यों आता? उसके लिए इतना क्यों गिड़गिड़ाता. हालांकि उसने अपनी बात नम्रता से कही, लेकिन यह साफ़ था कि वह अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए दृढ़ था. अब वह इससे कैसे उबर पाएगी? उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गयी. यदि वह किसी दूसरे कफ़न के लिए राजी नहीं हुआ, तो बुआ का जनाज़ा समय पर नहीं निकल पाएगा. जमाअत उसके पति और बेटे को मस्जिद में बुलाएगी, सवाल-जवाब करेगी. इस विचार ने कि वे दोनों अपने सिर झुकाए, हाथ बांधे जमाअत के सामने खड़े होंगे, उसे डरा दिया. फरमान निश्चित रूप से उसे नहीं छोड़ेगा. वह जितनी शिद्दत से उसे प्यार करता था उतनी ही निर्दयता से उसे अपमानित भी कर सकता था. उसके विचार उलझी हुई पतंग की तरह फड़फड़ा रहे थे. वह बहुत देर तक बिलखती, सिसकती रही. क्या इतना रोने के बाद वह अपने आपको हल्का महसूस कर रही थी? नहीं, गहरी वेदना उसके गले में फांस की तरह अटक गयी थी. भगवान ऐसी पीड़ा किसी दुश्मन को भी न दे! उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी.
इस तरह करीब दो घंटे अकेले में रो लेने के बाद वह थोड़ी सहज हुई. उसे नीचे से सुब्हान की आवाज़ सुनाई दी. वह उसे जोर से उसे पुकार रहा था. ‘शाज़िया, शाज़िया, मेरे कपड़े कहाँ है? मेरी कलम? मेरा नाश्ता तैयार है न? उसने सब कुछ सुना, लेकिन वह बोल नहीं पाई. सबा फौरन अपने कमरे से बाहर आई और जवाब दिया, ‘अब्बा जी, अम्मी घर पर नहीं हैं. सुबह-सुबह किसी के इंतकाल की खबर आई थी, वहीं गयी होंगी.
‘क्या? किसका इंतकाल हुआ है? तुम्हें किसने कहा?’ उसने हैरानी से पूछा.
फ़रमान ने मुझे बताया, और बिना चाय- नाश्ता किए चले गए. अम्मी भी उसके साथ गयी होंगी.’ उसने कहा. शाज़िया ने राहत की सांस ली. एक बहु के नाते चाहे सबा कितनी भी चतुर-चालाक क्यों न हो – उस पल उसे सबा पर प्यार आ गया. वह सुब्हान के लिए नाश्ते की मेज़ पर रसोइये द्वारा तैयार चपाती एवं सब्जी लगा रही थी. थोड़ी देर बाद, सुब्हान की कार अहाते से बाहर निकल गयी. अब और रोने का कोई फायदा नहीं था. उसे लगा कि अब उसे कुछ करना पड़ेगा.
किसी दूसरे व्यक्ति की मौत पर शाज़िया इतने आंसू कभी नहीं बहाए थे, अपने अब्बा की मौत पर भी नहीं. लेकिन ऐसे मौकों पर वहां उसे सांत्वना देने और संभालने के लिए कई लोग मौजूद होते थे – उसके रिश्तेदार, उसके दोस्त, उसके पड़ोसी. लेकिन आज वह घर पर अकेली थी, एक अनाथ की तरह. यह सब उसका खुद का किया धरा था. अब उसे हर हालत में इससे बाहर आना होगा. फैसला लेने के बाद, वह तुरंत ही अपने रिश्तेदारों एवं दोस्तों को फोन करने लगी.
‘आपके पास ज़मज़म में भिगोया हुआ कफ़न है क्या? मुझे….’ उसका सवाल पूरा भी नहीं होता कि उनका जवाब आ जाता, ‘हम्म, शाज़िया बोल रही हो? नहीं, हमारे घर पर कफ़न नहीं है. हमारी माँ हज यात्रा पर गयी थी, तब लाई थी, पर वह कफ़न तो हमने किसी और को दे दिया.’ किसी ने कहा, ‘क्या, तुम्हें कफ़न चाहिए?’ (खिलखिलाहट) ‘हम हमारे घर में कफन नहीं रखते. हम किसी से कफ़न लाने का वादा नहीं करते. यह बड़ा झंझट का काम है.’ किसी और ने कहा, ‘वहाँ के कफ़न क्या जरूरत है? कफन यहाँ का हो तो क्या फर्क पड़ता है. हमारे आमाल (कर्म) ही तो हमें आख़िरत में मददगार होंगे. मैं ठीक कह रही हूँ न?’
अब और कोई रास्ता नहीं बचा था. अतः उसने अपनी इच्छा के विपरीत, भारी मन से सबा की माँ को फोन किया. ‘अस्सलाम वालेकम…’ और कुछ औपचारिक बातों के बाद, उसने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को ताक में रखते हुए कहा, ‘क्या आपके पास मक्का से लाया हुआ कफन होगा?’ सबा की माँ शाज़िया को ज्यादा पसंद नहीं करती थी. सबा की नियमित ख़बरों के अनुसार, शाज़िया हमेशा बड़बड़ाती रहती थी, एक जालिम औरत जो अपनी बहू पर कड़ी नजर रखती थी, एक चुड़ैल जो उसे बहुत सताती थी. यह सब देखते हुए सबा की माँ हर कीमत पर कफन की व्यवस्था करने के लिए तैयार थी – बशर्ते कि यह खुद शाज़िया के लिए होता. उसने पूछा, ‘क्या तुम्हें कफ़न चाहिए?’ अपनी बात का वज़न बढ़ाने के लिए कुछ देर रुकी… और पूछा, ‘पर तुम्हें कफ़न क्यों चाहिए?’ व्यंग्य स्पष्ट था और शाज़िया ने बिना कुछ कहे फ़ोन काट दिया. शाज़िया को ज़मज़म में भीगा कफ़न चाहिए – यह बात उसके मायके से लेकर सभी रिश्तेदारों एवं दोस्तों तक फ़ैल चुकी थी. उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वह इतनी बेबस हो सकती थी, और फिर से उसकी आँखों से आंसू फूट पड़े.
यह अहसास होने पर कि रोने का कोई फायदा नहीं था. उसने अपने कमरे से बाहर आने, कुछ खाने और दवाई लेने का फैसला किया. लेकिन इस सब का कोई फायदा नहीं हुआ. आखिरकार उसने सोचा – क्यों न यहीं से कफ़न खरीदकर उसे घर में स्टोर किए ज़मज़म के पानी में भिगोकर वहाँ भिजवा दूं. लेकिन वह मक्का से लाया कफ़न नहीं होगा. हाय अल्ला! एक हाज्जा होकर झूठ बोलूँ? तौबा तौबा…’ उसने असहाय होकर खुद को कोसा: ‘थू! शाजिया, धिक्कार है तेरे जीवन को.’ उस पल की पीड़ा, वेदना, शर्मिंदगी और बेबसी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था.
दोपहर करीब तीन बजे फरमान घर आया. खाने की मेज़ की तरफ जाते हुए उसने सबा से पूछा, ‘अम्मी कहाँ है? वह कुछ नहीं बोली, उसने बस आँखों से शाजिया के कमरे की ओर इशारा कर दिया. फरमान भागकर अन्दर गया, अपनी माँ की चुप्पी के बावजूद वह उसके चेहरे को देखकर सब कुछ समझ गया. वह उसके पास बैठ गया और उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘अम्मी,’ अब शाज़िया को रोने के लिए एक कंधा मिल गया था. उसने अपनी अम्मी को सांत्वना देने की भरसक कोशिश की, लेकिन वह सुबक-सुबक कर रोती रही. दरवाज़े के पास खड़ी सबा हैरान थी क्या मेरी सास इतनी संवेदनशील थी कि एक नौकरानी की मौत पर इतना शोक मना रही थी? फरमान के अपनी पत्नी को वहां से जाने का इशारा किया.
वह सुबह अपनी माँ से नाराज़ था. ‘उन्हें इस पर राजी नहीं होना चाहिए था…लेकिन राजी होने के बाद, क्या उन्हें अपना वादा नहीं निभाना चाहिए था. एक कफ़न लाना कौन सा बड़ा काम था? वह भी उस बेचारी गरीब औरत के लिए. उसे बहुत बुरा लगा था. ‘पिछले साल जब सबा और मैं उमराह गए थे, क्या मम्मी हमें नहीं कह सकती थीं? मैं कफन ले आता.’ वह सोचने लगा कि आखिर कफ़न लाना इतनी बड़ी समस्या क्यों बन गयी थी? वह अम्मी को दोषी ठहराने वाला ही था कि ऐन वक्त उसने अपने आप पर काबू पा लिया और शांत हो गया. यह महसूस करते हुए कि उन्होंने कितना दुख सहा था, उसने कहा, ‘अम्मी जाने दो. कभी विस्मृति के कारण और कभी दुर्भाग्यवश, ऐसी बातें हो जाती हैं. आप इसे अपने दिल पर मत लीजिए. मैं सुबह अल्ताफ़ के घर गया था. बुआ के दफ़न की सारी तैयारी हो गयी है: जरूरत का सारा सामान – कफ़न, अगरबत्ती, इत्र आदि आ गया है, शव को नहला दिया गया है, अल्ताफ़ द्वारा तय जगह पर कब्र खुदवा दी गयी है. अब आप उठिये, खाना खा लीजिए, फिर हम यासीन बुआ को आखिरी बार देखने चलेंगे.’
शाज़िया फिर से दुख में डूब गयी. फरमान ने उनके सामने थाली रखी. शाज़िया ने थोड़े से चावल खाए और उठ गयी. वह शाज़िया को बुआ के घर ले गया. वही हुआ जिसकी कल्पना फरमान ने की थी. यासीन बुआ का चेहरा देखकर वह फूट-फूट कर रोने लगी. रो-रो कर उसकी आंखें लाल हो गईं थे और होंठ सूज गए थे. एक प्रतिष्ठित अमीर परिवार की किसी औरत को एक नौकरानी की मौत पर इस तरह से विलाप करते देखकर लोग हतप्रभ थे. वे सोच में पड़ गए, आखिर उन दोनों का क्या रिश्ता था…और उन्होंने सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया. सच केवल शाजिया जानती थी: अंत्येष्टि यासीन बुआ की नहीं, उसकी अपनी हो रही थी.
—————–
अंग्रेजी में अनुवाद : दीपा भास्थी
हिंदी में अनुवाद: डॉ. बालमुकुन्द नन्दवाना