कुछ और यादें कुछ और बातें
रंग में डूबे हुए शब्द
– दिवाकर मुक्तिबोध
आज उनकी न तो जयंती है और न ही पुण्य तिथि पर किसी अपने को याद करने के लिए किसी खास तिथि की जरूरत नहीं है क्योंकि स्मृतियां ह्रदय तल में रहती हैं तथा उठते-बैठते या कामकाज करते हुए वे अनायास उभर आती हैं. एक दिन बुक शेल्फ में किताबों को उलट पलट कर देखते समय डॉक्टर जेएसबी नायडू का कविता संग्रह ‘ मैं सोच रहा था कि ‘ हाथ में आया. 2018 में प्रकाशित इस काव्य संकलन में डॉक्टर नायडू की ढाई सौ से अधिक क्षणिकाएं हैं. किताब देखते ही स्मृतियां एकदम जीवंत हो उठीं. अपने इस प्रिय मित्र का स्मरण करते हुए मैंने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए और आम आदमी के जीवन के आसपास रची-बसी उनकी क्षणिकाओं को पढ़ना शुरू किया हालांकि चंद पंक्तियों की इन मिनी कविताओं में से कुछ को मैं तभी पढ़ चुका था जब डॉक्टर ने मुझे इस किताब के साथ उनकी पूर्व प्रकाशित अन्य किताबें भी भेंट की थीं. पढ़ते-पढ़ते मैं कईं जगह रूका, सोचता रहा और कुछ क्षणिकाओं को कागज पर उतारता रहा यह सोचकर कि जब भी नायडू याद आएंगे, इन क्षणिकाओं के जरिए उनसे बात करता रहूंगा.
डॉक्टर जेएसबी नायडू की जन्म तिथि मुझे ज्ञात नहीं और न ही जीवन से विदा लेने का दिन. एक दिन अखबार के पन्ने पलटते हुए अकस्मात शोक-संदेश काॅलम पर नज़र पड़ी. उनके निधन की खबर थी. पढ़कर सन्न रह गया. यह अप्रत्याशित झटका था. कल्पना से परे. कुछ समय बाद जब मन:स्थिति कुछ सामान्य हुई तो उनके बारे इधर-उधर से पूछताछ की. पता चला कि उनकी अंत्येष्टि हो चुकी थी. अखबार को निधन की सूचना एक दिन बाद दी गई. शोक के माहौल में मैने उनकी पत्नी डॉक्टर सरोज से फोन पर शोक संवेदना व्यक्त करना मुनासिब नहीं समझा अलबत्ता बाद के कार्यक्रम में घर गया. कुछ देर बैठा. तब भी रस्मी बातचीत से अधिक कुछ नहीं कह पाया. इतना तो मैं जानता भी था डॉक्टर नायडू काफी समय से बीमार चल रहे थे. इस दौरान एक-दो दफे उनकी तबीयत का हाल जानने उनके घर भी गया. इलाज से तबीयत सुधर रही थी पर एकाएक उनका चले जाना किसी सदमे से कम नहीं था.
डॉक्टर जेएसबी से मित्रता करीब चार दशक पुरानी थी. उनसे पहली मुलाकात का दृश्य याद है. अस्सी के दशक की बात है. एक दिन रंगकर्मी जयंत देशमुख जो तब उभरते हुए युवा कलाकार थे, एक सलोने सुंदर नाक-नक्श वाले युवक के साथ देवेन्द्र नगर स्थित मेरे घर आए. उन दिनों मैं अमृत संदेश में था. जयंत ने उनका जेएसबी नायडू के रूप में परिचय कराया जो पेश से चिकित्सक थे, स्त्री रोग विशेषज्ञ तथा सरकारी नौकरी में जगदलपुर में पदस्थ थे. लेकिन यह उनका असली परिचय नहीं था. वे दरअसल चित्रकार थे. इस पहली मुलाकात में ही मुझे उनसे अपनापन महसूस हुआ. उनसे औपचारिक परिचय के बाद हम तीनों कमरे में न बैठकर खुले आसमान के नीचे गच्ची में चले गए. छत की मुंडेर पर बैठे और चाय की चुस्कियां लेते करीब एक घंटे तक बातचीत करते रहे. जयंत इसके बाद कभी मेरे घर नहीं आए. भोपाल, भारत भवन से होते हुए सीधे मुम्बई पहुंच गए. भीषण चकाचौंध वाली मुंबई के समुद्र का खारा पानी उन्हें बहुत रास आया. उनके जीवन में मिठास घुल गई .बीते वर्षों में उन्होंने आर्ट डायरेक्टर के रूप में कईं फीचर फिल्में कीं. खूब ख्याति अर्जित की. वे अभी भी रंग कर्म की दुनिया में खासे सक्रिय हैं. रायपुर आते जाते रहते हैं.
इधर जयंत के जरिए जेएसबी से पहली मुलाकात के बाद दूसरी मुलाकात, समय के काफी अंतराल के बाद तब हुई जब उनका रायपुर तबादला हुआ. पुलिस लाइन में स्थित पुलिस अस्पताल में उनकी पोस्टिंग हुई. वे रिटायरमेंट तक पुलिस जवानों व अफसरों के डॉक्टर बने रहे. उनकी रायपुर वापसी के बाद मुलाकातों और बातचीत का रास्ता खुला. अधिकतर मुलाकातें अमृत संदेश के दफ्तर में या कभी कभार घर पर होने लगीं. अस्पताल की ड्यूटी से फारिग होने के बाद शाम के समय वे अखबार के दफ्तर आने लगे. घंटे आधे घंटे बैठकर बिना किसी के काम में व्यवधान डाले वे लौट जाते. इस नियमित बैठक का परिणाम यह निकला कि अपने व्यवहार से वे न केवल संपादकीय साथियों के वरन इतर विभागों में काम करने वाले सभी छोटे बड़े कर्मचारियों के प्रिय बन गए. हमारे प्रधान संपादक स्वर्गीय गोविंद लाल वोरा जी के आग्रह पर उन्होंने अखबार के लिए कैरिकेचर बनाना शुरू किया. अमृत संदेश के प्रथम पृष्ठ पर उनका पाकेट कार्टून छपने लगा. न्यूनतम शब्दों में रेखाओं के साथ तीखे व्यंग्य का उनका यह स्तंभ बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गया. अब इसके लिए प्रतिदिन दफ्तर आना अनिवार्य हो गया था. संपादकीय साथियों के पास बैठकर उस दिन की सबसे महत्वपूर्ण खबर जानने के बाद वे अपना रेखांकन शुरू करते थे. अमृत संदेश में अनेक वर्षों तक रोजाना उनके कैरिकेचर छपते रहे. कहना न होगा कि रेखा चित्रों के साथ उनके व्यंग्य बहुत मारक हुआ करते थे.
डॉक्टर जेएसबी की प्रतिभा बहुमुखी थी. चित्रकार के रूप में उनकी ख्याति थी. उनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियां हुईं. एक चिकित्सक के रूप में भी वे बहुत मानवीय एवं संवेदनशील थे. मित्रो के लिए वे क्या थे, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मेरी छोटी बच्ची दिशा बीमार पड़ी. उसे तेज बुखार था. शाम को डॉक्टर नायडू को खबर की. वे घर आए. उन्होंने इलाज शुरू किया. उस रात वे घर नहीं गए. बेटी के सिरहाने बैठे रहे. जबकि मैंने उनसे कईं बार घर जाने का अनुरोध किया लेकिन वे नहीं माने. भोर के समय जब बेटी का बुखार चला गया तब उन्होंने अपने घर की राह पकड़ी. खरी मित्रता का तकाजा तो खैर अपनी जगह पर है लेकिन पेशे के प्रति प्रतिबध्दता और मानवीय संवेदनाओं का यह अद्भुत उदाहरण है. दरअसल यह उनका स्वभाव था, सहज, सरल, परोपकारी व अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदारी. चूंकि सरकारी नौकरी में थे इसलिए नियम कायदों में रहते हुए उन्होंने कभी प्रायवेट प्रैक्टिस नहीं की जबकि पुलिस विभाग के आला अफसरों से उनकी मैत्री थी. चूंकि वे विभागीय चिकित्सक थे इसलिए एक फोन काॅल पर विजिट में पहुँच जाते थे चाहे वे पुलिस के जवान अथवा छोटे कर्मचारी ही क्यों न हो.
डॉक्टर नायडू चित्रकार तो थे ही किंतु आशु कवि भी हैं यह मुझे तब मालूम हुआ जब वे वाट्स एप पर कविताएं भेजने लगे. चंद पंक्तियों की ये कविताएं जीवन के उनके विविध अनुभवों का सजीव चित्रांकन करती थीं. उन्हें पढ़कर कभी कभार मैं अपनी राय देता था पर कभी भी उन्होंने खुद होकर प्रतिक्रिया जानने की कोशिश नहीं की. उनकी लेखनी निर्बाध चलती रही. 2005 से 2019 के बीच उनकी नौ किताबें छपीं जिनमें कविताएं, आत्मकथाएं तथा रेखाचित्र शामिल हैं. उन्होंने अपनी सभी किताबों के आवरण पृष्ठ स्वयं ही बनाए जिनमें उनकी काव्यात्मकता रंग संयोजन के जरिए अभिव्यक्त हुई है.
डॉक्टर जेएसबी नायडू को गुज़रे डेढ़ वर्ष हो गए. मित्र की अंतिम कृति हाथ में है. किताब के पन्ने पलटते हुए मैं भूमिका पर ठहर गया. ‘रंग में डूबे हुए शब्द ‘ शीर्षक से भूमिका छत्तीसगढ़ के नामचीन लेखक रमेश अनुपम ने लिखी है. वे लिखते हैं – ‘अत्यंत कम शब्दों में अपनी अनुभूतियों को पिरोना नि:संदेह कोई सरल कार्य नहीं है. इतने कम शब्दों में कवि द्वारा क्षणिकाओं के माध्यम से जीवन के अनेक छवियों का प्रकटन हमें आश्चर्य से भर देता है. शब्दों की बेहद फिजूलखर्ची और शोरगुल के मध्य शब्दों की यह चुप्पी, यह सजगता , यह सामर्थ्य कवि का अपना अर्जित किया हुआ कौशल है.’
और जैसा कि साहित्य की निर्मम दुनिया में, जिसमें छत्तीसगढ़ भी समाहित है, कवि हो या लेखक अथवा कलाकार , उनके योगदान को विस्मृत करने एवं उनकी रचनात्मकता को खारिज करने की प्रवृत्ति बहुत तगड़ी. कवि -चित्रकार डॉक्टर जेएसबी नायडू भी इस प्रवृत्ति के शिकार हैं. किंतु जब कभी, मेरी तरह, अन्य हाथों में उनकी किताबें अथवा चित्र आएंगे, यकीनन वे याद आएंगे. याद आते रहेंगे.