प्रतीक्षा में समय रेत की तरह नहीं फिसलता
प्रतीक्षा कोई सूखा पत्ता नहीं, जो हवा में बिखर जाए। जब मित्र की आहट कानों में गूँजती है, तो मन का आँगन रस से भीग जाता है। जैसे सुबह की ओस घास पर चमकती है, वैसे ही चेहरा खिल उठता है। प्रतीक्षा तब रस बनकर टपकती है, जब वह आगंतुक मित्र का चेहरा लिए दरवाज़े पर खड़ा होता है, और आँखें हँसी से गीली हो जाती हैं।
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प्रतीक्षा में एक तार बँधा होता है, जो मन को हल्क़े-हल्क़े झंकृत करता है। मित्र के आने की ख़बर जैसे ही हवा में तैरती है, मन एक पतंग बन जाता है—डोर प्रतीक्षा की, और उड़ान उस मुलाक़ात की। वह रस नहीं, जो जीभ पर चखा जाए; वह रस है, जो मन के तालाब में लहर बनकर उठता है, जब मित्र की हँसी दरवाज़े से टकराती है।
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प्रतीक्षा में समय रेत की तरह नहीं फिसलता। वह तो रुककर साँस लेता है, जैसे कोई पुराना गीत गुनगुनाने लगे। मित्र के आने की प्रतीक्षा में खिड़की से झाँकता मन, हर पत्ते की हलचल में उसका चेहरा ढूँढता है। और जब वह आता है, तो समय रस बनकर बहता है—नहीं रुकता, मगर ठहर-सा जाता है, जैसे नदी किनारे पर चुपके से बैठ जाए।
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प्रतीक्षा का रस चेहरे पर उगता है, जैसे खेत में नया अंकुर। मित्र के क़दमों की आहट सुनते ही आँखों में एक चमक जागती है, जो सूरज की किरणों से उधार ली गई मालूम होती है। वह रस नीरस नहीं, वह तो हँसी की बूँद है, जो गालों पर टपकती है। मित्र का चेहरा देखकर मन कहता है—यह प्रतीक्षा नहीं, यह तो मुलाक़ात का पहला गीत है।
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प्रतीक्षा तब पूरी होती है, जब मित्र का हाथ हाथ में थाम लेता है। वह रस, जो इंतज़ार में पनपता है, मिलन में फूल बनकर खिलता है। जैसे बारिश की बूँदें धरती को गीला करती हैं, वैसे ही मित्र की बातें मन को भिगो देती हैं। प्रतीक्षा का रस तब नहीं सूखता, बल्कि और गाढ़ा हो जाता है—जैसे कोई पुराना पेड़, जो हर मुलाकात में नई टहनियाँ उगाता है।
●●● जयप्रकाश मानस