पगडंडी पर चलते-चलते
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं,
कुछ करने की अभिलाषा में
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं।
मौके आए जाने कितने
जब-जब मन घोर निराश हुआ,
आगे बढ़ चलने की धुन में
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं।
मेरा जीवन शुचि-सरिता है
पल-पल आगे बढ़ते रहना,
प्रस्तर कितने ही टकराए
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं।
आगे बढ़ना ही ध्येय रहा
परहित मेरा पाथेय रहा
इस जग की प्यास बुझाने को
मैं थकी नहीं ,मैं रुकी नहीं।
गतिहीन नियति सबकी जग में
सागर में मैं गतिशून्य हुई,
सर्वस्व निछावर करके भी
मैं थकी नहीं, मैं रुकी नहीं।।
—- कल्पना श्रीवास्तव
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)