क़ैदी
वे तीन थे
और जैसे किसी जेल में थे
अंदर थी एक संकरी-सी कोठरी
जिसके भीतर था उनका ही संकरा-सा जीवन
और सिर्फ़ उनकी ही थोड़ी-सी साँसें थीं
उनमें से एक
संतरी की तरह टहलता था
दूसरा वार्डेन की तरह देता था हिदायतें
कविता के सख़्त कायदों-क़ानूनों के बारे में
और
तीसरे को
दोनों ऐसे देखते थे
जैसे देखा जाता है
कोई क़ैदी ।
(रात में हारमोनियम संग्रह से एक कविता। प्रकाशक वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली। आवरण : मनोज कुलकर्णी।
अमेजोन फ्लिपकार्ट तथा अन्य ऑनलाइन माध्यमों में उपलब्ध)