नदियां लौट रही हैं
चारो दिशाओं में फैला हुआ आकाश
नीले रंग को विस्तार-सा दे रहा
पहले से कुछ अधिक साफ हो चला है
धरती पर उतरती हुई
सूरज की किरणें
पहले से कुछ अधिक रक्तिम हैं
चांद का धूसर गोल बिम्ब
कुछ साफ- साफ दिखता है
और उसकी रजत रश्मियां
हो गयी हैं कुछ अधिक चमकदार
फूलों की महक
कुछ अधिक कर रही है
वातावरण को खुशनुमा
धुंध को चीरती हुई हवा
बह रही है कुछ अधिक शीतलता लिए
पक्षी उड़ान भर रहे हैं
बादलों की उचाईयों पर
उनकी चहचाहट कुछ अधिक बढ़ गयी है
वे चौखट पर बेखौफ चुग रहे हैं दाने
दशकों बाद स्रोत के मुहाने रिस रहे हैं
नदियां लौट रहीं हैं अपनी धारा साथ
लहरें कुछ अधिक नर्तन कर रही हैं
खतरनाक हो चुका जल प्रदूषण
खतरे से कुछ अधिक नीचे है
पानी का रंग कुछ उजला-सा
समय की कालिमा को धुल रहा है
मिट्टी कुछ अधिक सोंधापन लिए
बिछा रही है हरीतिमा-दरी
दूब की कोर पर
ढलक आई ओस की बून्द
अपने सौंदर्य को सहेजे लौट रही है
अतीत के विस्मृत पृष्ठों पर
वह उकेरना चाहती है फिर से
मनुष्य के हृदय में अपनी अमिट छाप
प्रकृति अतीत के झरोखों से उतरकर
संवार रही है अपना वर्तमान
जिससे कि वह बचा सके
अपने भविष्य की पीढ़ी का शुक्ल पक्ष..
© डॉ शिव कुशवाहा