March 6, 2026

इंसान मर गए तुम क्यूं नहीं?

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17 अप्रैल लखनऊ
हम मेहमान नवाज़ लोग हैं मेहमान नवाज़ी हमारे खून में है…
इस एक लाइन ने न जाने कितनी औरतों की ज़िन्दगी जहन्नम बना दिया, उन्हें अज़ाब में डाले रख्खा| हम बचपन से ऐसी बेशुमार कहानियां सुनते हुए बड़े हुए| मंझले नाना कहते थे
“अल्लाह मेरे रिज्क की बरकत न चली जाये
दो रोज़ से घर में कोई मेहमान नहीं हैं|”
बाक़ी सुनी सुनाई बातों की तरह दिल इस बात पे भी ईमान ले आया कि वाक़ई हम अच्छे घराने से ताल्लुक रखते हैं और मेहमानों की खातिर तवाज़ो में चेहरे पे शिकन नहीं आना चाहिए| ये तहज़ीब हमारी रवायत है|
मगर.. इन दिनों दिल हर नुक्ते पे अटक जाता है, काई की तरह जमी हुई बाते अब जी को झकझोर रही हैं| दिल दिमाग की लड़ाई में तबियत यूँ हो रही है जैसे बगैर कुछ खाए पिए सारा दिन मितली सी महसूस हो, और पूरे दिन काम में खपे होने के बावजूद दिमाग बार बार एक सुई पे अटक जाता हो कि
“मितली सी महसूस हो रही…
सच बताऊँ तो कभी कभी लगता है इन किताबों ने और जीना दुश्वार कर रखा है, होश संभालते ही अपने आस पास किताबों का ज़खीरा देखा| उस वक्त चूंकि लंबी लंबी धूल उड़ती पत्ते झड़ते मनहूस दुपहरियां होती थीं, माएं अपनी बच्चियों को शैतानों जिन्नो और धोकरकास (बच्चा उठाने वाले) का नाम लेकर इस कदर डराती थीं कि कच्ची उम्र से सिवाय इन किताबों के और किसी का सहारा नहीं था।
जब गर्मी की छुट्टियों में दिन भर आम के बगीचे में कच्चे आम तोड़ने थे, धूप में लकड़ी डंडियां लेकर इमली के पेड़ पे ढेले मार मार इमलियां तोडनी थीं या फिर आम के पेड़ पे चढ़कर ज़रा ढेसर आम की खोज करनी थी भले ही इस चक्कर में गोल दोने की शक्ल के पत्तो में छिपे लाल माटे (चीटियां) पूरा जिस्म छलनी कर देते और हम चीख चिल्ला कर गिरते पड़ते भागते। या फिर प्यास से बेहाल कहीं किसी पुलिया के करीब बैठे छोटी मछली पकड़ने की जुगत में होते या फिर आम के बगीचे में सूखे पत्ते और छोटी टहनियां लकड़ियां इकठ्ठी कर उन्हें सुलगाकर फिर घर से छुपा कर लाए आलू भूनते।
मगर ये सब हो न सका…. एकाध बार की याददाश्त बस रह गई, उस पर भी इतनी मार पड़ी कि ये मज़ेदार खेल दुबारा से यादों की ज़बान पे चढ़ न सका।
“अच्छी बच्चियां घर के अन्दर खेलती हैं बाहर नहीं…”
खैर, घर में गुड्डे गुड़ियों की लंबी कतारें थीं, गुड़िया ज्यादा थीं गुड्डे कम थे। इसलिए अक्सर होता ये था कि एक ही गुड्डे की शादी अलग अलग गुड़िया से होती , मजबूरी थी क्या करते? बस हर बार साफे का रंग बदल जाता, बाकी कपड़े और चेहरा मोहरा वही होता।
सोचती हूं कि कच्चे ज़ेहन ने कहाँ से सीख लिया होगा कि एक गुड्डे से अदल बदल कई गुड़ियाओं की शादी हो सकती है? कहां से ख्याल पुख्ता हुआ होगा? क्या छोटे बच्चे भी अपने आसपास के रीति रिवाजों को समझ पाते हैं ध्यान देते हैं?
पता नहीं!!

छोटी उम्र में बच्चो को सहेजने के लिए उन्हें अपनी निगाहों के सामने रखने के लिए या फिर उन्हें अक्लमंद ज़हीन बनाने के लिए किताबें थमा दी गईं।
प्रेमचंद शरतचंद शिवानी और रूसी साहित्य पढ़ते हुए जब बड़े हुए तो आज ख्याल आता है कि मेरी अपनी सोच क्या है? अगर किताबें न पढ़ी होती इतनी तो क्या पता ज़िंदगी खुशगवार रही होती? यूं हर एक बात पे दिल जूझता नहीं, दिमाग दलीलें नहीं मांगता!
शायद….
बहरहाल मैं अभी जब लैपटॉप लेकर बैठी थी तो अचानक जाने कहाँ से ट्रेन की सीटी जैसी कुछ आवाज़ आई, मैं चौंक कर उस आवाज़ को दुबारा सुनने लगी| अब कोई आवाज़ नहीं, ग़ायब…वहम था क्या?
कई बार मेरे साथ ऐसा होता है जैसे कुछ आवाज़ें और कुछ ख़ास किस्म की महक ज़ेहन के किसी खाने में क़ैद हो गयीं और रह रह कर सर उभारा करती हैं…
खैर, उसी सीटी से मुझे मेहमान नवाज़ी का ख्याल आया, और फिर मैं बरसों बरस पीछे चली गई जब पढ़ाई लिखाई के लिए हम गांव से नज़दीकी कस्बे में आ गए थे। किस्मत से या बदकिस्मती से हमारा घर रेलवे स्टेशन से पांच मिनट की दूरी पे था।
घर के सामने से रेल गुजरती थी और उस वक्त वो दोमंजिला घर जो बेहद पुराना लकड़ियों और आधी मिट्टी आधी ईंटो की दीवार पे मुश्तमिल था यूं धड़कने लगता जैसे अभी भरभरा कर गिर जाएगा। ये खयाल अक्सर रात के सन्नाटे में आता जब लोहे की छड़ लगी लंबी खिड़की बुरी तरह हिलने लगती और लकड़ी की छत ऐसे कांप उठती जैसे कोई जवान लड़की मुहब्बत करने का जुर्म कर बैठे…
वो ज़माना ऐसा था जब रात आठ बजे तक सब खाना खा कर फ़ारिग हो चुके होते, घर के मर्द दिल बहलाने के लिए बिस्तर पर लेटे लेटे रेडियो सुन रहे होते और साथ ही पान की गिलौरियां सिरहाने रखी मनोरंजन के सीमित साधनों में ज़रा सा इज़ाफा करतीं| दूसरी तरफ बच्चे चारपाई तख़्त जहाँ जगह मिलती वहीँ पसर कर सोने लगते, दिन भर की थकान का कैसा बेहतर सिला था! अलबत्ता औरतें सब धरते उठाते समेटते बावर्ची खाने को झाड़ते पोंछते रात के दस बजा देतीं और जब वो टेढ़ी कमर को सीधी करने के लिए बिस्तर पे गिर जातीं ठीक उसी टाइम ट्रेन की सीटी की आवाज़ आती….
औरतों का दिल एकबारगी सन्न हो जाता, वो पांच दस मिनट जैसे पूरे के पूरे इंतज़ार में तब्दील हो जाते और दिल ख़दशे में रहता कि अभी…दरवाज़े की ज़ंजीर ज़ोर ज़ोर से खड़केगी और अभी सूटकेस होल्डाल लिए कुछ चेहरे दरवाज़े से अन्दर आयेंगे और अभी…
अंगीठी कब की बुझ चुकी है, बुरादे भर भर कर घंटे भर लगा कर उसे सुलगाने वाला नौकर गहरी नींद सो चुका है , उसे उठाना यानी मुनकिर नकीर का बिना पूछताछ किये क़ब्र से वापस लौट जाना…
फिर? मेहमान होंगे तो खातिर तो करनी होगी, अंडे भी शायद ख़त्म हो गये हैं, चलो इस वक़्त सब्ज़ियाँ बन जाएँगी साथ में अरहर की दाल और चावल…या ख़ुदा!
इस सोच विचार में दस मिनट बीत चुके हैं, लोहे की छड वाला गेट खडखडाया नहीं और न ही लोहे की भारी ज़ंजीर को हिलाया गया| इसका मतलब है आज सुकून से सो सकते हैं!
मगर सुकून से सोना कभी कभार नसीब था, अक्सर बेशतर लोग दवा दारु या शादी ब्याह की ख़रीददारी के सिलसिले में गोरखपुर जाया करते और रात वाली ट्रेन से वापस लौटते|
रात बिरात गाँव जाने के लिए साधन नहीं मिलता, इसीलिए सबसे आसान उपाय स्टेशन के क़रीब वाले रिश्तेदार के यहाँ रुक जाना था|
सुनी सुनाई बातों की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि इन्सान मरते दम तक उससे पार नहीं पाता| दस्तरख्वान की इज्ज़त, अपने दरवाज़े की इज्ज़त , बुजुर्गो के नाम की इज्ज़त,….ये सारी इज्ज़त मान मर्यादा की टोकरी औरतों के सर पे पटक दी गयीं|
औरतें बेचारी दिल में आये कुढ़न को चिढ को दबा देतीं कि “हमारा खानदान मेहमान नवाज़ी में आला है मशहूर है, हम कैसे इस बात को भूल सकते हैं?
आह! मैंने कहा न सुनी सुनाई बातों ने हम औरतों का बड़ा नुकसान किया!
पसीने से लथपथ, कमज़ोरी से जूझती, सातवां आठवां महीना चल रहा है मगर चूल्हे की आग पूरे दिन जलती रहती है| सर दर्द से तड़पती औरतें रात भर कराहतीं, सुबह सूजी आँखें लिए वापस काम पे लग जातीं
“हाँ बताओ किस को क्या खाना है?
तरह तरह के खाने की फ़रमाइश लज्ज़तदार ज़ायके वाले अलग, परहेज़ वाले अलग और मर मेहमान वाले अलग… मगर फिर भी खाने वाले लम्बी डकारें लेते, तले भुने खाने की शिकायत करते
“गैस बन रही है , जाहिलों की तरह तेल मसाला उंडेल देती हो|”
औरतें बेदाम गुलाम की तरह चुपचाप वापस बावर्ची खाने में घुस जातीं, आग की लपटें, उबलता कमरा जैसे उन्हें जाय पनाह लगने लगता|
सितम ये है कि उस घर की छोटी बच्चियों ने अपने माओं की बुरी हालत देखी तो गुस्से से भर कर उन्हें देखा, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने की नसीहतें दी और फिर जब अपना वक़्त आया तो उन्ही पुरानी औरतों के नक़्शे क़दम पे चलने लगीं, उन्ही सुनी सुनाई बातों पे ईमान लाती रहीं…
आख़िर ये सिलसिला कब तक चलेगा?
सुनी हुई बेज़ायका बकवास बातें कब तक ज़िन्दा रहेंगी? इन्सान मर मर गये तुम क्यूँ नहीं….

सबाहत आफरीन
#डायरी

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