जहाँ हर दसवाँ नागरिक लेखक है
आइसलैंडिक भाषा में एक कहावत है : “हर किसी के पेट में एक किताब होती है।”
यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं, बल्कि एक सच है जो वहाँ की हवा में घुला हुआ है।
तीन लाख से थोड़ी ज़्यादा आबादी वाले इस छोटे-से देश में, हर दसवाँ नागरिक किसी न किसी रूप में लेखक है। यहाँ किताबें न सिर्फ़ छपती हैं – वे जन्म लेती हैं। गली-मोहल्लों में, कॉफ़ीहाउस में, टैक्सी में बैठकर, समुद्र किनारे पत्थरों पर टिककर… और कभी-कभी तो बर्फ़ में ढकी ख़ामोशी के बीच भी।
यहाँ लेखन कोई ‘पेशा’ नहीं – एक साँस की तरह है। राजधानी रेक्याविक में आप चाहें तो हर मोड़ पर एक लेखक से टकरा सकते हैं।
कभी कोई गाइड अपनी यात्राओं की कविता सुनाएगा, कभी टैक्सी ड्राइवर अपने दादा की आत्मकथा का ज़िक्र करेगा बेंचों पर लगे बारकोड से आप स्मार्टफ़ोन पर एक कहानी सुन सकते हैं – जैसे शहर की हर दीवार पर कोई वाक्य लिखा हो, जो बस पढ़े जाने का इंतज़ार कर रहा हो।
शायद इसकी वजह है – इस देश की प्राकृतिक कविता।
ज्वालामुखी जो धरती के भीतर से कहानी बनकर फूटते हैं,
झीलें जो परीकथाओं जैसी लगती हैं, और आसमान जो हर शाम रंग बदलकर कोई उपन्यास रच देता है।
यही कारण है कि यूनेस्को ने रेक्याविक को ‘साहित्य का शहर’ घोषित किया।
यहाँ किताबें महज़ दुकानों में नहीं बिकतीं, वे हवा में बहती हैं,
बारिश में भीगती हैं, और लोगों की बातचीत में धीरे-धीरे खुलती हैं।
यह एक ऐसा देश है जहाँ कहानी कहना सांस्कृतिक अभ्यास नहीं – जीवन जीने का एक कोमल और गहरा तरीक़ा है।
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[ ‘नवनीत’ में प्रकाशित मेरे एक लेख से साभार]
जयप्रकाश मानस