पाठ – बारह
“ ख्वाब सा कुछ “ उपन्यास
लेखक – संजय मनहरण सिंह
लोकभारती प्रकाशन – २०२४ ( प्रथम संस्करण )
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उपन्यास “ ख्वाब सा कुछ “ के लेखक संजय मनहरण सिंह की पिछले दो सालों में एक से एक बढ़िया कहानियाँ पक्षधर , कथादेश , वनमाली और हँस जैसी पत्रिकाओं में पढ़ते हुए उनके बारे में और जानने की इच्छा हुई औए इसी सिलसिले में यह उपन्यास मंगाकर एक साँस में पढ़ गया | इस उपन्यास को पढ़ते हुए ही उनसे ई-मेल के जरिये संपर्क स्थापित करने की कोशिश कामयाब हुई दुआ-सलाम हुई |
छत्तीसगढ़ की पहचान सारे देश में कुछ कमियों के साथ ही साथ बहुत सी खूबियों के कारण भी है जिसमें प्रमुख यह नक्सल पीड़ित राज्य के रूप में है | पिछले दो दशकों में यहाँ कुछ दिल दहलाने वाली घटनाएं टीवी और अख़बार माध्यम से और भी ज्यादा मुखर होकर लोगों तक पहुंची | सारे देश में यहाँ के लोग बस्तर प्रदेश के नाम से सहजता से पहचान लिए जाते हैं और व्यवहार का मापदंड कुछ बदल सा जाता है | जंगल की वास्तविक चिंताओं पर साहित्य में काफी कुछ लिखा गया है | उस हिसाब से अपेक्षाकृत यहाँ कम ही लिखा गया और है भी तो चर्चा में कम ही आ पाया | कुछ कवियों ने बखूबी अपनी रचनाओं में प्रभावी रूप से चिंता जाहिर की लेकिन गद्य में छुटपुट कहानियों-उपन्यासों के अलावा कुछ खास नहीं आ पाया | रायगढ़ के लेखक संजय मनहरण सिंह ने इस क्षेत्र विशेष की नक्सल समस्या पर यह सार्थक उपन्यास लिखा है जो २०२४ में लोकभारती प्रकाशन से छपकर आया | इसके पहले उनकी एक कविता संग्रह ही आई है और अब पत्रिकाओं में कुछ कहानियाँ जो बाद में कभी संग्रह के रूप में पढ़ने को मिल पायेगी | अलबत्ता , बहुत कम लिखकर ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखक के रूप में वे कामयाब हो चुके हैं |
लेखक संजय मनहरण सिंह दिल्ली , मुंबई , बेंगलोर में नौकरी करते हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी वि.वि. वर्धा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अब वे रायगढ़ में रहते हुए संजीदगी से साहित्य सेवा कर रहे हैं | प्रायः लेखकों की तरह उनकी भी शुरुआत कविता लेखन से हुई है | निश्चित रूप से उनकी कविता संग्रह ‘ देह की लोरियां ‘ सराही गई होगी | उनकी कहानियों में प्रदेश के अविकसित गाँव-कस्बों और जंगल से जुड़े क्षेत्रों की व्यथा-कथा प्रभावी ढंग से उभरकर आई है | उनकी अपनी मोहक भाषा है जिसने पठनीयता के मापदंड पर अच्छी सफलता पाई है | वे गद्य में संवेदना के तीक्ष्ण आवेग को अपनी आविष्कृत भाषा में मार्मिकता के साथ पेश करते हैं जिसमें कभी-कभी असंतोष और करुणा के साथ क्रोध का स्वर प्रमुखता से उभरकर आता है | वे कथ्य के साथ पाठकों को बहुत जल्दी मूल भाव पर ले आते हैं और एक-एक घटना को पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाते हुए एक प्रश्न भरी आकुलता के साथ समाप्त करते हैं | पाठक सारे भाव-भंवर में ऊभ-चुभ होते खुद भी अंत के विकल्प के बारे में सोचता हुआ देर तक आंदोलित होता है |
उपन्यास की पृष्ठभूमि छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र की है जहाँ के लोग जल और जंगल के स्वाभाविक मालिक तो हैं लेकिन उनसे यह बोध छिनने का षड्यंत्र कई स्तरों पर किया जाता है | सिस्टम के पुर्जे उन्हें महज खिलौना ही तो समझते आये हैं अब तक लेकिन जंगल में भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती संघर्ष चेतना के नायक ‘ बनगिहा ‘ के रूप में सामने आती है जो जंगल में बागियों का उभरता हुआ मुखिया है | उसमें जोश और जज्बा है और समस्या को अपने ढंग से सुलझाने को वह तैयार भी है | १९७१ के बाद कुछ विशेष जंगली क्षेत्र में एक विशेष सिद्धांत के पैरोकार लोग प्रवेश कर गए और वंचित-पीड़ित लोगों को अपने ढंग से जागृत करने की कोशिश में फैलते ही चले गए | भोली-भाली जनता बहुत जल्द आशान्वित होकर अपना भरोसा किसी को सौंपने में देर नहीं लगाती | देश का वनाच्छादित बड़ा भूभाग आजादी के बाद से ही छला जा रहा है जिसे दशकों से विशेष प्रशिक्षित बागियों द्वारा लामबंद किया जाने लगा था | हरिमन , जो एक मास्टर है और अपनी निजी प्रतिबद्धता के चलते सरकार के आँखों की किरकिरी बना हुआ है और दर्जनों स्थानांतरण की पीड़ा झेलते हुए भी अपने तेवर कायम रखे हुए है | उसने दास बाबू की घरेलू लाइब्रेरी से कुछ ऐसी बारूदी किताबे पढ़ ली है जो समूची काया को अलग ढब में बदल देती है | गर्म मसाला और कोफ्ता ( बारूद और बम ) बनाने और इस्तेमाल करने की कला उसने इसी दास बाबू के सानिध्य में सीखी और इसी दरमियान उसकी पढ़ी लिखी बेटी मधुलिका के संपर्क में आकर अपने गृहस्थ जीवन को भी दांव पर लगा बैठा | हालाँकि परिवार में सहजता से इस विवाहेत्तर सम्बन्ध को न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि उससे उपजी नई चेतना के फरमा-बरदार बनगिहा को अपना आदर्श भी माना जो एक मुठभेंड में पुलिस की गोलियाँ से छलनी हुआ |
उस उपन्यास का दूसरा नायक पढ़ा लिखा ऐंठबहार भी है जो मास्टर हरिमन का दूसरा बेटा है और पहली विवाहित पत्नी से है | वह कवि है और कहीं न कहीं उसमें आदर्शवादी पिता और जुझारू दादा का अंश गहरे तक समाया हुआ है | घर की व्यवस्था बड़े भाई घुमनाहा की मक्कारी और नौकरी में दर-बदर घूमते पिता की आत्मघाती मयनोशी के चलते बर्बाद होने लगी है जिससे उबकर ऐंठबहार राजधानी दिल्ली की गलियों में विकल्प की तलाश में भटकता है | रोजगारी के भी अजीब फंदे होते हैं | गाँव-कस्बों में जिस हुनर को फालतू की चीज समझी गई वही महानगर में रोजगार का साधन बनी | एक विवाहित बाल-बच्चेदार सुन्दर आधुनिका स्वयं को सभ्य समाज में कवियत्री के रूप में स्थापित करना चाहती है और उसे स्वाभाविक कवि ऐंठबहार की जरुरत पड़ती है जिसके एवज में वह तन , मन , धन से उसे आपूरित करती है | घर की आन्तरिकता से बेजार उसका उद्योगपति प्रकाशक पति निम्न स्तर के साहित्य छापकर भी लेखकों की कतार खड़ी कर पैसा कमाने को तत्पर है | नायक ने देखा कि दोनों ही जगह यौन सम्बन्ध दोयम दर्जे की चीज समझी जा रही है बल्कि शहर में तो खास पेंचदगियां भी नहीं है मध्यमवर्गीय समाज की तरह | इस मायावी दुनिया से उबा हुआ नायक अंततः स्वयं को आदिम भूभाग में ही सहज पाता है जहाँ उसके पिता की अंतिम साँसे चलकर बंद हो चुकी है और कंकाल में तब्दील हो चुकी माँ की जिंदगी नए सिरे से शुरू होने के इंतजार में है | मास्टर पति के गुजर जाने के बाद भी नई परिस्थितियाँ क्षीण न होकर नए सहारे के रूप में आती है जब नौकरी के संचित धन मरणोपरांत प्राप्त होते हैं और घर में खुशियों की नई इबारत लिखी जाने लगती है |
उपन्यास में बारीक़ से बारीक़ हरकतों को भी सहजता के साथ रूपायित किया गया है जो स्वाभाविकता की कसौटी पर खरा उतरा है | किशोरवय में प्रवेश करते बच्चों की यौनिकता के प्रति जुगुप्सा और उस उम्र में की गई मासूम हरकतों का बड़ा ही जीवंत चित्रण हुआ है | मुझे लगता है उस उम्र में प्रायः हर इंसान ऐसे प्रसंगों से अछूता नहीं रह पाता | उपशीर्षकों में विभाजित इस उपन्यास की कथा आपस में उलझी हुई है जिसे एक सूत्र में पिरोने के लिए पाठक को मेहनत करनी पड़ती है | कई घटनाये एक ही समय में अलग अलग भू-भागों में घटित होती हैं जिसे लेखक ने बिना किसी पाज या संकेत के बढ़ाया है | उन सिलसिलों को हर बार समेटने की कवायद से पढ़ने में कुछ व्यवधान उत्पन्न होता है | इसलिए इसे कुछ अन्तराल के बाद दुबारा पढ़ लेने में सहजता से कई अनदिखी चीजे नए अर्थ में खुलती चली जाती हैं | बहरहाल इस उपन्यास “ ख्वाब सा कुछ “ के चरित्रों के नाम एकदम जीवंत-जुझारू और स्थानिकता में पगी हुई हैं जैसे गोसईंनीन , बुतरू, घुमनाहा , ऐंठबहार , टेंटमेरही , जोजबोलही , घरघोरहिन , सोनपियारी इत्यादि | दिए गए ब्योरे और प्रमाणिक स्थल लेखक की अपनी सघन अनुभूति की खास वजह लगती है |
किसी एक रात राष्ट्रीय राजमार्ग में बारूदी सुरंग बनाने का जीवंत चित्रण हुआ है | छोटे चूहे , बड़े चूहे , कबरबिज्जू , कौव्वे , बाज अपनी सटीक भूमिका निभाते हैं और इंसानों से ज्यादा भरोसेमंद साबित होते हैं | सन १९७५ का समय इस उपन्यास में दर्ज है यानी उपन्यास की पृष्ठभूमि इसी कालखंड की है जब समूचे देश में अजीब सी घटनायें होने लगी थी | छत्तीसगढ़ सहित कई प्रदेशों के वनाच्छादित भू-भागों में हथियारबंद वामपंथियों की घुसपैठ मजबूत हो चुकी थी | असाधारण सिद्धांत , कार्य शैली और अनुशासन से गाँव गाँव में उनकी उपस्थिति को स्वीकार किया गया और जमीनों के साथ दिलों में भी जगह दी गई | लेखक कहता है —-“ जंगल एक कहानी है जिसके हर पृष्ठ पर खरगोश और शेर की भागाभागी है |” एक जगह वन-नायक बनगिहा अपने अघोषित पिता के बारे में कहता है —– “ जिसके लिए गाँव के बच्चे रोने लगें , जिसकी पीड़ा से बारूद में आग लग जाए , जिसके कराहने की गूंज जंगल में कोहराम मचा दे , समझ लो वह कितना शक्तिशाली है | “
मास्टर हरिमन जिसकी जिंदगी जंगल के अलग अलग दर्जनों स्कूलों में बच्चों को शिक्षा देते गुजर गई और जिसने अपने परिवार और समाज में अनगिनत बाधाएँ और विसंगतियां देख-भोगी वह अपने को होश में जिन्दा कैसे रख सकता था | घर के अलावा गांव वाले भी मद्यपान की आदत को गलत नहीं मानते लेकिन उसका एक बेटा ऐंठबहार मानता था कि आदमी सचेत रहने की सीमा तक बेहोश रहे तो समाज और देश के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता | इन व्यसनों से ऐंठबहार भरसक अपने को रोके हुए है और सचेत भी है इसलिए गली से गुजरते रैली को देखकर माँ के मुंह से असमय उठती आवाज को हथेली से ढांपकर विद्रोह को भीतर ही भीतर सुलगने के लिए महफूज रखता है | जुलुस की शक्ल में शामिल हर युवा में माँ को शहीद हुए बागी बेटे बनगिहा की छवि दिखती है | माँ-बेटे दोनों आश्वस्त है कि उपर को उठी हुई मुट्ठियाँ कभी तो कामयाब होगी और सदियों से जमे हुए जबड़े कभी तो मुखरित होकर अपनी भाषा में अपनी बात कहेंगे ही |