March 6, 2026

उवत सुरुज के अगोरा (लघु उपन्यास, भाषा – छत्तीसगढ़ी)

0
WhatsApp Image 2025-10-13 at 10.51.38 AM

लेखक – डॉ. विनोद कुमार वर्मा, सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य व कहानीकार, बिलासपुर
पाठकीय प्रतिक्रिया – कुबेर

उवत सुरुज के अगोरा सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य व कहानीकार, डा. विनोद कुमार वर्मा द्वारा छŸासगढ़ी भाषा में लिखित व सद्य प्रकाशित लघु उपन्यास है। बस्तर में व्याप्त नक्सलवाद की समस्या को उपन्यास का विषयवस्तु बनाया गया है। इसके पूर्व बस्तर में व्याप्त नक्सलवाद की समस्या पर सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार श्री लोक बाबू ने बस्तर बस्तर उपन्यास लिखा है। यह उपन्यास हिंदी भाषा में लिखा गया है। हिंदी साहित्य जगत में इस उपन्यास ने पर्याप्त यश अर्जित किया है। अपने विषयवस्तु के कारण छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य में ये दोनों उपन्यास अनूठे और महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। नक्सलवाद की समस्या पर इसके पूर्व हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में कविताएँ तो खूब लिखी गई हैं पर गद्य साहित्य, विशेष रूप से छत्तीसगढ़ी गद्य साहित्य, सूना था। उपन्यास के मुख्य पात्र और कथानक इस प्रकार है –

निर्मला – 23 वर्षीय डॉक्टर निर्मला इस उपन्यास की मुख्य पात्र है और रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल रायपुर में तदर्थ नियुक्ति पर कार्यरत है। वह पी. जी. के लिए चयनित हो चुकी है पर फीस की रकम चुकाने में उसके मध्यम वर्गीय किसान पिता सक्षम नहीं है। नवोदय विद्यालय मल्हार में अध्ययन के दिनों के सहपाठी झिंटू राम से उसे प्रेम है। झिंटू राम भी निर्मला से प्रेम करता है। स्कूल की पढ़ाई पूरी कर विदा लेते समय निर्मला ने उसे अपने प्यार की निशानी के रूप में अपने सोने की अंगूठी को देती है। स्कूल के बाद निर्मला मेडिकल की पढ़ाई करती है और झिंटु राम किसी तरह ग्रेजुएट होकर अर्ध सैनिक बल में भर्ती हो जाता है। उसकी पोस्टिंग दण्डकारण्य में नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत होती है। एक दिन समाचारों के माध्यम से निर्मला को पता चलता है कि नक्सलियों ने दो अन्य जवानों के साथ झिंटू राम का अपहरण कर लिया है। वह उसे छुड़ाने के लिए केशकाल के लिए बस से निकल पड़ती है। संयोग से बस में उसकी मुलाकात कामरेड बालेन्दु बाबू से होती है। बालेन्दु बाबू उसे अपने फार्म हाउस में शरण देता है। वह उसके परिवार के सदस्य की तरह हो जाती है।

झिंटू राम – झिंटू राम अत्यंत गरीबी में पला-बढ़ा युवक है। वह अपनी बहादुरी के बल पर आउट आफ टर्न प्रमोशन पाकर अधिकारी के पद तक पहुँचना चाहता है ताकि निर्मला के साथ विवाह कर सके। जब नक्सलियों ने दो अन्य जवानों के साथ उसका अपहरण कर लिया था तब वह अपनी बहादुरी से नक्सलियों के चंगुल से छूट जाता है परंतु नक्सिलयों से घिर भी जाता है और घायल हो जाता है। घटनाक्रम आगे बढ़ती है। अब वह पदोन्नत होकर सब इंस्पेक्टर हो गया है। एक दिन सर्चिंग के दौरान नक्सलियों के आई. ई. डी. विस्फोट में उसका वाहन उड़ जाता है। अपनी सूझबूझ और बहादुरी के बल पर वह एक करोड़ के इनामी नक्सली कमाण्डर शेखर रामन्ना सहित बारह नक्सिलियों को मार गिराता है और स्वयं भी शहीद हो जाता है। इस वीरता के लिए उन्हें सरकार द्वारा मरणोपरांत कीर्ति चक्रप्रदान किया जाता है।

कामरेड बालेन्दु – कामरेड बालेन्दु साम्यवादी विचारधारा को मानने वाला एक सामाजिक कार्यकर्ता है। बस्तर के आदिवासियों को सामाजिक न्याय दिलाने के मुहिम में वह केसकाल के समीप विश्रामपुरी में एक फार्म हाऊस में अपनी पत्नी और दस वर्षीय पुत्र अंकुश के साथ हता है। बाद में उसे एक पुत्री, पल्लवी होती है। कामरेड बालेन्दु के प्रयासों से ही निर्मला अपना पी. जी. की पढ़ाई पूरा कर पाती है। पी. जी. करने के बाद अब वह रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल रायपुर में सर्जन नियुक्त हो जाती है। कामरेड बालेन्दु से मिलने निर्मला अक्सर आया करती है। कामरेड बालेन्दु आम जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इस लोकप्रियता का फायदा सरकार और नक्सली दोनों ही उठाते हैं। इसी क्रम में उसे नक्सलियों और सरकार दोनों के ही कोप का भाजन भी बनना पड़ता है। अंत में वह पत्नी सहित नक्सली कमांडर शुभमन और उसके साथियों द्वारा अपने ही फार्म हाऊस में मारा जाता है। इस हिंसा में पुत्र अंकुश छिपकर बच जाता है। पल्लवी घायल हो जाती है। वह अपनी बहन पललवी को बचाकर बाहर ले आता है और घर के दरवाजों को बंद करके उसे आग के हवाले कर देता है। आग के चपेट में आकर हमलावर नक्सली मारे जाते हैं। अंकुश और पल्लवी निर्मला के साथ रहने लगते है।

कामरेड शुभमन – कामरेड शुभमन दण्डकारण्य जोनल कमेटी का नक्सली कमांडर है। वह काफी शातिर, क्रूर, शराबी और अय्याश व्यक्ति है। छŸासगढ़ सरकार ने उस पर एक करोड़ रुपयों का इनाम घोषित किया हुआ है। इस आशंका में कि कामरेड बालेन्दु पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर उसे मरवाने की योजना बना रहा है, एक रात उसके फार्म हाऊस में धावा बोलकर उसकी और उसके पत्नी की हत्या कर देता है।

उपन्यास रोचक और पठनीय है। घटनाएँ तेजी से घटित होती है इसलिए कही किसी प्रकार का ठहराव भी नहीं है। यह सर्वविदित तथ्य है कि बस्तर के आदिवासी नक्सली और नक्सली उन्मूलन में लगे अर्धसैनिक बलों के बीच घुन की तरह पीसे जा रहे हैं। लेखक ने इस तथ्य को अपने इस उपन्यास में प्रमुखता के साथ रेखांकित किया है। लेखक ने झिंटू राम की बहादुरी को उसके आऊट आफ टर्न प्रमोशन के लालच के साथ संदर्भित करके उसकी बहादुरी के साथ न्याय नहीं किया है। इस उपन्यास में नक्सलवाद की समस्या का उल्लेख जरूर है परंतु यह नक्सल विचारधारा पर आधारित उपन्यास नहीं है बल्कि इसके केन्द्र में विशुद्ध मानवीय प्रेम की स्थापना ही है। यह कृति लेखक की सुप्रसिद्ध कहानी मछुआरे की लड़क की तरह एक लंबी कहानी ही है। इसे एक लघु उपन्यास भी कहा जा सकता है।
000। कुबेर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *