मोपासा को पढ़ते हुए
अभी मोपासा को पढने का अवसर मिला है. गाय-दी-मोपासा फ्रेंच कथाकार हैं और वे निर्विवाद रूप से फ़्रांस के महान कथाकार हैं. घने बालों और घनी मूंछों ने उनके व्यक्तित्व को और भी दमकता हुआ बना दिया है और वे दिखने व लिखने दोनों में अदम्य और आधुनिक विचारों के लेखक रहे हैं. उन्होंने फ़्रांस और जर्मनी के युद्ध में भाग लिया था. ग्यारह वर्षों के अपने लेखन के चरम समय में उन्होंने 300 कहानियां, 6 उपन्यास और 3 यात्रा-संस्मरण लिखें हैं और 1 कविता संग्रह भी है.
वे हिंदी के भारतेन्दु हरिश्चंद से दो वर्ष पहले जन्मे थे. रूस की तरह फ़्रांस भी साहित्य और कला से समृद्ध देश रहा है. जहाँ बाल्जाक, वोल्टेयर और विक्टर ह्यूगो जैसे बड़े लेखक विचारक हुए हैं. विक्टर ह्यूगो फ़्रांस के न केवल सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक रहे हैं बल्कि वे एक शक्तिशाली आवाज भी थे. विक्टर ह्यूगो का उपन्यास ‘लेस मिजरेबल्स’ हमारे बी.ए.अंग्रेजी में था. इस उपन्यास का रूपांतरण राजकपूर की एक फिल्म ‘कुंदन’ में हुआ था.
बहरहाल हम मोपासा की कहानियों पर थोड़ी बात करें. उनकी कहानियों का प्रवाह तेज है. वे किसी कलारूप को नहीं आजमाते हैं. उनकी कहानियां बिना किसी कलात्मक या शैलीगत भूमिका के किसी घटना का वृत्तान्त लगती हैं. ऐसा लगता है कि कथाकार हमारे घर आकर आंखन देखी किसी यथार्थ का बयान कर रहे हों और यह किस्सा बिलकुल ठस्स पारिवारिक किस्सा विविध रंगी हो उठता है बिना किसी अतिरेक या बनावट के. अतिरेक कथा की घटनाओं में निहित होता है. वे सीधे अपने विषय पर केन्द्रित होते हैं. उनकी विषयवस्तु इतनी संवेदनाओं से भरी होती है कि पाठक को शीघ्र ही जोड़ लेती हैं. मोपासा की कहानियों का शहर ज्यादाता पेरिस ही रहा है जैसे लन्दन पर ज्यादा कहानियां चार्ल्स डिकेंस की मिलती हैं.
यूरोप के लेखकों में ज्यादातर कहानियां युद्ध या युद्ध के बाद की सामाजिक पारिवारिक दशा पर लिखी होती हैं. ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध यूरोप की धरती पर ही लड़े गए हैं. इसलिए युद्ध से जो भयावह स्थितियां वहां उपजी हैं उसके बाद यूरोप ने लगभग तय कर लिया है कि अब वे यूरोप की धरती पर कोई तीसरा विश्व युद्ध नहीं होने देंगे. इसलिए भी हम देख रहे हैं कि अब ऐसे भयावह युद्ध एशिया के देशों के बीच हो रहे हैं.
मोपासा की एक कहानी ‘दो दोस्त’ युद्ध के दौरान ही नदी पार कर मछली मार रहे दो दोस्तों की कहानी है. जो दुश्मनों द्वारा पकड़ कर और संदेह कर मार दिए जाते हैं. मछली मारते समय तोप के धमाकों की आवाज सुनकर मोरिसाट अपने दोस्त सोवाज से कहता है कि “यह सब तब तक चलता रहेगा जब तक सरकारें हैं.” उसका दोस्त सोवाज कहता है कि “गणतंत्र कभी युद्ध का ऐलान नहीं करता.” मोरिसाट ने उसे बीच में टोका “पर जब गणतंत्र होता है तो गृहयुद्ध शुरू हो जाता है.” एक भविष्यवक्ता कथाकार के इस वक्तव्य को हम आज देख रहे हैं कि हम किस तरह की स्थितियों से घिरे हुए हैं.
००० विनोद साव