वयोवृद्ध नौजवान जयलाल प्रसाद निर्मलकर
वे अब हमारे बीच इस भौतिक संसार में नहीं हैं, लेकिन उनका मुस्कुराता हुआ सौम्य चेहरा हमेशा याद आता है.उनके बारे में यह मेरा छह साल पुराना आलेख है, जिसे मैंने 17अक्टूबर 2019 को पोस्ट किया था. कल फेसबुक ने भी मुझे इस पोस्ट की याद दिलाई थी.
इस पोस्ट को लिखने के कुछ वर्ष बाद पता चला कि उनका निधन हो गया है. पुरानी पीढ़ी की बेहद सक्रिय शख्सियत को याद करते हुए और उन्हें विनम्र नमन करते हुए उन पर केंद्रित अपना छह साल पहले का यह आलेख आज पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ.
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वयोवृद्ध नौजवान जयलाल प्रसाद निर्मलकर
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उम्र के इस लम्बे सफ़र में क़रीब -क़रीब नब्बे की दहलीज़ पर दस्तक दे रहे जयलाल प्रसाद निर्मलकर के चेहरे पर आज भी वही निर्मल मुस्कान देखी जा सकती है , जो मैं और मेरे सहपाठी मित्र वर्षों पहले कभी अपने बचपन के दिनों में देखा करते थे। वह लोगों से हमेशा मुस्कुरा कर मिलते हैं । खादी का कुर्ता -पायजामा उनका पसंदीदा परिधान है। उनकी कदकाठी देखकर लालबहादुर शास्त्री की याद आती है । आस-पास के गाँवों या कस्बों में इस उम्र में भी वह अक्सर अपनी हल्की -फुल्की बाइक से ही आना -जाना करते हैं।
जनकल्याण के कार्यों में उनके जोश और जुनून को देखकर अगर हम उन्हें ‘वयोवृद्ध नौजवान’ कहें तो शायद गलत नहीं होगा । इस उम्र में भी उनके बत्तीस में से चौबीस दांत बिल्कुल सही -सलामत हैं । उनके मस्त -मौला व्यक्तित्व का राज पूछने पर वो मुस्कुरा कर कहते हैं -शाकाहार ,सादा भोजन और व्यस्त दिनचर्या ।
पहले वह अध्यापक थे ।अब एक सजग और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में हैं ।श्री निर्मलकर छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले के अंतर्गत ग्राम कौहाकुड़ा (विकासखण्ड -पिथौरा, ) के निवासी हैं । उनका यह गाँव मेरे गाँव से सिर्फ़ पांच किलोमीटर की दूरी पर है । कुछ दिनों पहले उनसे मुलाकात हुई तो बड़ी आत्मीयता से अपने घर ले गए । फलाहार करवाया और बाड़ी में की गयी बागवानी भी दिखायी । बातचीत में उन्होंने अपनी पुरानी यादों को भी साझा किया ।
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों को और पण्डित रविशंकर शुक्ल , यति यतन लाल और महंत लक्ष्मीनारायण दास जैसे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों को और उनकी गतिविधियों को उन्होंने नजदीक से देखा है । श्री निर्मलकर बताते हैं – ब्रितानी हुकूमत के उन दिनों में ‘वंदेमातरम और जयहिंद जैसे देशभक्तिपूर्ण नारों पर भी सरकारी प्रतिबंध था ,फिर भी उस पाबंदी की परवाह किए बिना लोग पूरे जोश और जज़्बे के साथ ये नारे बुलन्द करते थे । गिरफ्तारियाँ भी होती थी ,फिर भी जनता का हौसला कम नहीं होता था ।
श्री निर्मलकर ने अपने जीवन के चार दशकों से कुछ अधिक समय एक अनुशासन प्रिय और कर्त्तव्यनिष्ठ अध्यापक के रूप में विद्यादान के पुनीत कार्य में अर्पित कर दिया । देश को आज़ादी 15 अगस्त 1947 को मिली । इस ऐतिहासिक घटना के लगभग चार महीने बाद 10 दिसम्बर 1947 को रायपुर जिला परिषद के अध्यापक के रूप में श्री निर्मलकर को पहली नियुक्ति मिली । तब न तो मध्यप्रदेश बना था और न ही छत्तीसगढ़ । उन दिनों छत्तीसगढ़ भी सेंट्रल प्रॉविंस एंड बरार (सीपी एंड बरार प्रान्त ) प्रशासन का हिस्सा था । मस्तिष्क -कम्प्यूटर की मेमोरी में दर्ज यादों के पन्ने पलटते हुए उन्होंने बताया कि डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के उस जमाने में उनकी पहली पोस्टिंग रायपुर जिले में पलारी के पास ग्राम कोसरंगी की प्राथमिक शाला में हुई थी ।
बतौर अध्यापक अपने स्कूल में काम करते हुए उन्हें मात्र डेढ़ महीने ही हुए थे कि तभी 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या का हृदयविदारक समाचार मिला । श्री निर्मलकर याद करते हैं -गाँधीजी की हत्या से देश के साथ -साथ छत्तीसगढ़ अंचल के लोग भी स्तब्ध रह गए थे । माहौल में एक गहरी उदासी और ख़ामोशी छा गयी थी । मैं जिस गाँव में काम कर रहा था ,वहाँ भी माहौल गमगीन हो गया । उनकी हत्या की निन्दा करते हुए जनता ने विरोध स्वरूप जगह -जगह रैलियों और शोक सभाओं का आयोजन किया ।
श्री निर्मलकर 10 दिसम्बर 1947 से क़रीब 9 साल तक सीपी एंड बरार प्रान्त के कर्मचारी रहे । एक नवम्बर 1956 को जब मध्यप्रदेश बना तो छत्तीसगढ़ भी उस नये राज्य का हिस्सा बन गया । तब श्री निर्मलकर मध्यप्रदेश के अध्यापक हुए । छत्तीसगढ़ राज्य का गठन एक नवम्बर 2000 को हुआ ,लेकिन श्री निर्मलकर इसके क़रीब दस वर्ष पहले अपनी 43 वर्ष लम्बी नौकरी के बाद 10 दिसम्बर 1990 को सेवानिवृत्त हो चुके थे । बहरहाल अध्यापक के रूप में उन्होंने दो राज्यों -सीपी एंड बरार और मध्यप्रदेश सरकारों के अधीन काम किया और उस समय छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर जिले के विभिन्न विकासखंडों में अपनी सेवाएं देते रहे। उन्होंने अपने सुदीर्घ अध्यापकीय जीवन में मुझ जैसे हज़ारों बच्चों का भविष्य संवारा ।
इन दिनों वह अपने गृहग्राम कौहाकुड़ा में खेती -किसानी में व्यस्त रहते हैं ।साथ ही पिथौरा क्षेत्र में समाज सेवा के कार्यो में भी ख़ूब समय देते हैं । उनका कहना है कि हर मनुष्य को चाहिए कि वह अपना कुछ समय समाज को भी दे । स्वयं के लिए और परिवार के लिए जीने के साथ -साथ हर इंसान को समाज के लिए भी जीना चाहिए ,क्योंकि आज हम जो कुछ भी हैं , जहाँ भी और जिस मुकाम पर भी हैं , उसमें समाज का भी बहुत बड़ा योगदान है । समाज के इस उपकार का प्रतिदान हमें परोपकार के जरिए करने का प्रयास करना चाहिए ।
इसी पवित्र भावना से उन्होने पिथौरा के सेवाभावी नागरिकों के साथ मिलकर ‘सेवाधाम कल्याण समिति का गठन किया है । वर्ष 2004 में गठित और पंजीकृत यह समिति जनकल्याण के कार्यो में विगत पन्द्रह वर्षों से लगातार सक्रिय है । छत्तीसगढ़ शासन की कन्या विवाह योजना के तहत कुछ समय पहले जब पिथौरा में सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन हुआ ,तब नवविवाहित दम्पत्तियों को सेवा धाम कल्याण समिति द्वारा आशीर्वाद स्वरूप एक हज़ार एक सौ ग्यारह स्टील के बर्तनों के सेट दिए गए। समिति ने विकासखण्ड के हर गाँव में बर्तन बैंक बनाने की भी योजना बनायी है । प्रत्येक गाँव में विवाह जैसे मांगलिक कार्यो में भोजन बनाने के लिए बड़े बर्तनों की जरूरत होती है। कई बार खोजने पर भी स्थानीय स्तर पर ऐसे बर्तन नहीं मिल पाते । ऐसे में गरीब परिवारों को बहुत परेशानी होती है। बर्तन बैंक उनकी इस परेशानी को दूर करेगा ।
श्री निर्मलकर ने बताया कि उनकी समिति हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर विकास खण्ड स्तरीय समारोह में अंचल के दसवीं और बारहवीं बोर्ड उत्तीर्ण मेधावी बच्चों को रजत पदक और प्रशस्ति पत्र भेंटकर सम्मानित करती है । इसके अलावा वह और उनकी समिति के सदस्य हर हफ्ते पिथौरा के सरकारी अस्पताल में मरीजों को फल भी वितरित करते हैं । प्लास्टिक प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी समिति ने जनजागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया है । इस अभियान के तहत गाँवों में कपड़े के एक हज़ार थैले बाँटे जाएंगे। वयोवृद्ध नौजवान जयलाल जी को उनके स्वस्थ सुदीर्घ , मस्त और व्यस्त जीवन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं ।
–,स्वराज करुण