March 7, 2026
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जूतों के भीतर जो अंधेरा है
उसमें सिर्फ पैर रास्ता देख पाते हैं

पैरों के उनमें से निकल जाने के बाद
पुराने घिसे हुए फटे हुए
सूख कर आंकड़े हुए फफूंद लगे हुए
जूतों में रहनेवाले अंधेरे गरीब होते जाते हैं

सड़क पर लाश हो गये
उस आदमी का एक जूता कहीं दिखाई नहीं देता
दूसरा कुछ दूर सड़क पर पड़ा है
और उसमें एक सभ्यता का अंधेरा है

सिर्फ एक जूता हमें बेचैनियों से भर देता है
उसमें अंधेरे का अकथ अकेलापन है
हमें पता नहीं
वह किस तरह अपने साथी को याद करता है

हम उसे फेंक देंगे
किसी अंधेरे कोने में
—-आशुतोश दुबे
यह बहुत महीन कताई की कविता है। इसे पढ़ कर लगता है कि जब हम बहुत महीन कताई करने लगते हैं तो कविता बुझौवल बन जाती है। बुझौवल का भी एक अर्थ होता है। उसी के लिए हम बुझौवल समझनेवाले अटकलपच्चू प्रयास करते रहते हैं। बूझ जाने पर क्षण भर खुश हो कर उसे भूल ही जाते हैं या फिर दूसरों को बुझाने के लिए याद रख लेते हैं। उसकी भूमिका हमारे जीवन में बस इतनी सी होती है।
वही प्रयास जब कविता के लिए करना पड़े, तो कई सवाल उठने लगते हैं। एक यही कि क्या कविता क्षणिक मनोरंजन के लिए होती है? क्या मनोरंजन होता भी है?क्या कविता अभिव्यक्ति की चतुराई के लिए होती है? क्या काव्य संवेदना का काम हमारे मन में क्षणिक स्फुरण पैदा कर तिरोहित हो जाना है? तब हम कविता क्यों पढ़ें?
दर असल जब शिल्प हावी हो जाता है — और भारतीय कविता में अतियथार्थ और जादुई यथार्थ के प्रवेश से ऐसा हुआ भी है — तब कविता में पच्चीकारी का बोलबाला बढ़ जाता है, जिसमें सोना – चांदी, यानी कथ्य छिपता – दबता गौड़ हो जाता है। एक सीमित दायरे और समय की अनुभूति के पीछे हम ऐसे पढ़ जाते हैं कि वही सब कुछ होजाती है और उसके आगे तमाम दूरगामी परिणाम के माथाकूट यथार्थ पर पर्दा पड़ जाता है। कुंअर नारायण तक लिखने लगते हैं कि ” गाड़ी खड़ी थी/प्लेटफार्म चल रहा था”। इस पर सफाई देते हुए एक मेरे मित्र ने कहा कि शमशेर भी तो लिखते हैं ” आ फूल से लग जा, टूट कर गिरी ओ पंखुड़ी” । पर दोनों में अंतर है। कुंअर नारायण की बात मन के भ्रम की देन है, शमशेर की बात एक आकांक्षा, बीते दिनों की सुखद अनुभूतियों की वापसी का। वहां कोई पच्चीकारी नहीं है।
दर असल इस शिल्प को लेकर नाम तो हुआ बर्खेस का, पर शुरुआत हुई थी पूर्वी यूरोप की भाषाओं में, जहां रूस का वर्चस्व था, और सामान्य जन उसका खुला विरोध डर के मारे नहीं कर पा रहा था, इसलिए इस महीन कताई के लिए उन्मुख हुआ था। भारत में वह स्थिति नहीं रही है, भले आगे होने की संभावना बनने लगी है। लेकिन तब विरोध तभी कारगर होता है जब मुखर हो।
फिर यह शिल्प ऐसा है कि वह आत्मगत अनुभूतियों पर ही टिकता है, सामाजिक अनुभूति की बात मुक्तिबोध ने अपनी कविता में रखी थी, पर वह चल नहीं पाई।
इतना कुछ कहने के बाद कहना यह है कि आशुतोष दुबे की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है क्या? जिस तरह की बारीक और नयी अनुभूतियां और अनुभव वे अपनी कविता के माध्यम से हमारे सामने रखते हैं , वह हमारी संवेदना को तराशती भी है और चुभलाने के लिए एक नया स्वाद भी रख देती है, वस पाठक को इतनी मेहनत जरूर करनी पड़ेगी कि उनके साथ वह अपना स्थान छोड़कर तालमेल बिठाए। आखिर रचना का काम ही होता है पाठक को एलेवेट करना। पर क्या हमारा पाठक इतनी मेहनत करता है आज काव्यानंद प्राप्त करने के लिए विशेषतः जब सुलभ हों आसानी से समझ में आ जानेवाली जनोन्मुखी कविताएं।
लेकिन जब एक बार पाठक आशुतोष दुबे की कविताओं से तालमेल बिठा लेता है तब ऐसा काव्यलोक उसके सामने पसर जाता है कि बिना उसका पूरा रस लिए बाहर नहीं आना चाहता है। और यही कवि की उपलब्धि है। पहले वह अपना काव्यलोक बनाता है, उसे दिखा कर आपको आकर्षित करता है, आपको पैठाता है, फिर बांधकर रख देता है उसी दुनिया में विचरण करने के लिए। वहां आप पाते हैं कि कुत्ते की नींद में भी स्वप्न है, ऐसी शक्ति है जो अधीन को अपमानित न करना उसके नियमों के खिलाफ जाना है, सीख लेना है तुम्हारे बिना न रहना, और तस्वीरों में दिखने वाले सुख की उम्र सुख से बहुत ज्यादे होता है।
और भी बहुत कुछ है उनकी कविता में । पढ़ कर देखिए।
श्रीप्रकाश मिश्र

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