अबूझ पहेली को बूझता व्यंग्य उपन्यास
विश्वेन्द्र ठाकुर के उपन्यास ‘किस्सा बहराम चोट्टे का’ के बारे में सुना करते थे. हमारे पुरोधा साहित्यकार हरि ठाकुर ने इस कृति के बारे में तब बताया था जब मुझे अपने व्यंग्य-उपन्यास ‘चुनाव’ पर वर्ष १९९७ में लखनऊ में पुरस्कार मिला था. तब अख़बारों में समाचार पढ़कर हरि ठाकुर जी का आशीर्वाद सहित बधाई पत्र प्राप्त हुआ था. उसी समय उनके समकालीन लेखकों राजनांदगांव के शरद कोठारी और राजिम के पुरुषोत्तम अनासक्त के व्यंग्य उपन्यासों के बारे में भी सुना करते थे पर वे मेरे देखने पढने में नहीं आए. विश्वेन्द्र जी के इस गुम हो चुके उपन्यास को फेसबुक में चर्चा कर खोजा गया और यह लतीफ़ घोंघी के शहर महासमुंद में मिल गया जहाँ कभी विश्वेन्द्र जी भी शासकीय सेवा में थे. उनके तीसरे सुपुत्र संकेत ठाकुर और बहू शुभ्रा ने हमें घर आकर इसे भेंट किया. जिज्ञासा और उत्साह में इस लघु-उपन्यास को मैंने कुछ दिनों में ही पढ़ लिया था. इन सब व्यंग्य उपन्यासों सहित मेरे उपन्यास ‘चुनाव’ पर सहा.प्राध्यापक अभिनेष सुराना ने शोध कर अपना पी.एच.डी.किया था. डॉ. अभिनेष सुराना अभी दुर्ग शासकीय महाविद्याल में हिंदी विभागाध्यक्ष हैं.
विश्वेन्द्र जी का उपन्यास वर्ष दिसम्बर १९६२ में प्रकाशित हुआ है. हरिशंकर परसाई का चर्चित व्यंग्य-उपन्यास ‘रानी नागफणी की कहानी’ भी १९६२ में प्रकाशित हुआ था. इस मायने में ये दोनों उपन्यास १९६८ में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल के कालजयी व्यंग्य-उपन्यास ‘रागदरबारी’ से पहले प्रकाशित हुए थे. अत्यंत प्रयोगधर्मी कृति ‘रागदरबारी’ चार सौ पृष्ठों का एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है जिसने कई मायनों में उपन्यास लेखन के प्रतिमानों को तोडा और उनका यह अनुपम लेखन व्यंग्य-उपन्यास लेखन के लिए ‘मॉडल’ बना तब इसके प्रभाव में परवर्ती लेखकों द्वारा भारी संख्या में व्यंग्य-उपन्यास लिखे जाने लगे. जैसे परसाई का लिखा सब व्यंग्य कहलाने लगा वैसे ही श्रीलाल शुक्ल का लिखा ‘रागदरबारी’ को बड़े जोरशोर से व्यंग्य-उपन्यास कहे जाने की दरकार होने लगी. साहित्य में कई चीजों को आलोचक नहीं पाठक स्थापित कर देते हैं. वैसे ही परसाई और श्रीलाल शुक्ल के लेखन के साथ हुआ. इन्हें आलोचकों ने नहीं पाठकों ने उठाया और तब इनकी कृतियों ने आलोचकों को उठाया
विश्वेन्द्र ठाकुर की यह लघु-कृति है पर इसके ध्यानाकर्षण बड़े हैं. यह बात विश्वेन्द्र जी के व्यक्तित्व में भी शामिल थी. वे जब बोलते थे तब छोटी बातें भी बड़ी बनकर सामने आती थीं. मैं उन्हें छुटपन से जानता हूँ जब हमारे पिता अर्जुनसिंह साव पाटन में प्राचार्य थे तब विश्वेन्द्र ठाकुर वहां ए.डी.आई.एस. यानि स्कूल इंस्पेक्टर नियुक्त थे. अपने मझोले कद में वे पेंट में शर्ट खोंचकर पहनते थे. उनके सिर के फुरफुरे बाल बिखरे हुए से होते थे और घनी मूंछें थीं. एकबारगी उन्हें देखने से वे कोई थियेट्रिकल पर्सन लगते थे. वे उचक कर बोलते थे और लोगों को खूब हंसाते थे. तब उनके खुद के ठहाके भी गूंजते थे और वे महफ़िलों में छा जाते थे. आगे चलकर वे भी प्राचार्य हो गए थे. और मजेदार बात यह कि अपनी सेवा के आरंभ में वे हमारे पिताजी के साथ पाटन में थे और सेवा के अंत में मेरी ससुराल हथबंद के स्कूल में प्राचार्य हो गए थे. उनकी बिटिया अनीता बेटे सुनील, सरल और संकेत हम सबके बचपन के साथी थे. उनके घर में विनोदपूर्ण वातावरण होता था. चाची जी भी निश्छल और स्नेही थीं.
विश्वेन्द्र जी पुस्तक में ‘अपनी बात’ में लिखते हैं कि “इस उपन्यास की धारावाहिक किश्तें साप्ताहिक ‘विचार और समाचार’ में प्रकाशित होती रहीं. वर्ष-१९६२ में छपी इस पुस्तिका के प्रकाशक का नाम छपा है – विश्वनाथ वैशम्पायन, श्रमजीवी प्रकाशन, रायपुर जो उस समय रायपुर से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र ‘विचार और समाचार’ के संपादक भी थे. किताब के मुद्रक थे आजाद प्रिंटिंग प्रेस, रायपुर. इसके आवरण के चित्रकार थे श्री काठोते, भारतीय चित्र मंदिर रायपुर. १९३० में सकलोर (रायपुर) में मैथिल ब्राम्हण परिवार में जन्मे विश्वेन्द्र ठाकुर का तब का युवा चित्र लेखक परिचय के साथ छपा है… और यह लेखक परिचय तब के यशस्वी साहित्यकार धमतरी के नारायण लाल परमार ने लिखकर एक नयी पहल की है. परमार जी लिखते हैं कि “नई पीढ़ी के इस कवि एवं व्यंग रचनाकार ने विषाक्त सामाजिक व राजनीतिक जीवन का जो रूप कस्बों व अर्द्ध-विकसित नगरों में देखा है, उसका सफल चित्रण बहराम चोट्टे के माध्यम से किया है. कटु एवं व्यंग के वातावरण में जिया गया जीवन ही मानो उनकी सहज उपलब्धियां हैं. तरुण साहित्यकार इस माने में मौलिक प्रतिभा के धनी हैं.” .
जाहिर है कि विश्वेन्द्र जी का कवि-ह्रदय, उनका समुचित ज्ञान, सामयिकता की पकड़, जिन्दगी की जिन्दादिली और लेखन का विनोदिपन – इन तमाम तकनीकों से उपन्यास के नैरेटर (सूत्रधार) ‘बहराम चोट्टे’ के कार्य-कलापों को किस्से-कथानक के रूप में यहां विस्तारित कर दिखाया है सत्तर पृष्ठों के रचना संसार में. इसके सूत्रधार के चरित्र और विकास में ऐसा बेतुका, हास्यास्पद, असंगत या मूर्खतापूर्ण कार्यों की निरंतरता है कि इसे हम ‘अब्सर्ड’ (absurd) भी कह सकते हैं. विशेषकर उपन्यास लेखन में ऐसी कितनी ही कृतियाँ रची गई हैं जिस पर अब्सर्ड होने का आरोप लगता तो है फिर भी उसका सरोकार युक्त लेखन अपने महत्व को दर्शा जाता है और व्यंग्य लेखन में तो ऐसी कृतियों (ऐसे अब्सर्डों) की भरमार है. अब्सर्ड ऐसी चीज को दर्शाता है जो सामान्य तर्क, सामान्य ज्ञान या विवेक के विपरीत हो और इसका सूत्रधार बहराम चोट्टा इस तरह की विवेकहीनता का मास्टर-पीस है.
ठीक इसी आकार प्रकार का लघु-उपन्यास नरेन्द्र कोहली का उपन्यास ‘अस्पताल’ है जिसे अब्सर्ड कहा गया और जिसमें अब्सर्ड के वे सारे लक्षण हैं जो अब्सर्ड की खूबियाँ कही जा सकती है. जिनमें अस्पताली व्यवस्था का बेढब पन अपनी तमाम विसंगतियों को लेकर आता है और विद्रूपताओं को उजागर करता है. ऐसा ही शरद जोशी का लघु-उपन्यास है ‘मैं, मैं और मैं कमलमुख बी.ए.‘ इसमें कमलमुख नामक एक आत्ममुग्ध और स्वनामधन्य लेखक हैं जिनके द्वारा पत्र समीक्षक/आलोचक को लिखे गए हैं जो बड़ी रोचक शैली में हैं. शरद जोशी और नरेन्द्र कोहली के ये दोनों अब्सर्ड उपन्यास विश्वेन्द्र ठाकुर के ‘किस्सा बहराम चोट्टे का’ के बाद ही आए हैं.
इस उपन्यास के प्रमुख चरित्र का नाम ‘बहराम’ है. इसमें राम शब्द जुड़ा होने से यह हिन्दू हिन्दी नाम का आभास कराता है या हमारे लोकजीवन से रचाबसा कोई नाम लगता है पर यह फारसी शब्द है. तेरवीं सदी में दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश का एक नवाब हुआ था रजिया सुल्तान का सौतेला भाई जिसका नाम बहराम शाह था. इस फारसी मूल के शब्द का अर्थ बाधाओं या प्रतिरोध पर विजय प्राप्त कर लेना है. उपन्यास की कथा में खल भूमिका निभाने वाला पात्र ‘बहराम’ ऐसे ही प्रतिरोधों से बना प्रतिनायक हैं..
उपन्यास के कथानक में एक ऐसे चरित्र को रचा गया है जिसमें हमारे लोकतंत्र की विद्रूपताएँ सामने आती हैं. लेखक के अनुसार “बहराम चोट्टे का जन्म प्रजातंत्र की बाढ़ में हुआ. इस नाते उसका विधार्थी जीवन राजनीति शास्त्र, नीति शास्त्र और समाज शास्त्र के अध्ययन में बीता. वह प्रायः प्रश्नपत्र के उत्तर में “प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है का उदाहरण देता है. बहराम के लखपति पिता ने उसे ‘बिजनेस टैक्ट’ सिखाना चाहा वह छः महीने के कॉलेज जीवन से सकुशल लौट आया. बस यही उसकी शिक्षा-दीक्षा.”(पृष्ठ-३). ऐसे माहौल में राज्य के नागरिकों के बीच कोई बहराम चोट्टा जैसा प्राणी हमारी व्यवस्था में उभर सकता है. यह अजूबा प्राणी एक साथ मूर्ख और महत्वकांक्षी दोनों होता है. इन स्थितियों में व्यवस्था की शक्ति बन्दर के हाथ में तलवार जैसी हो सकती है. तब ऐसे लोग जब किसी राज्य में महाबली के रूप में उभरते है तब जनता और उसके हुक्मरानों की दशा क्या होगी! ऐसी राजनीति में विपक्ष की भूमिका से क्या और कितनी आशाएं की जा सकती हैं? विश्वेन्द्र जी की दूरदृष्टि को १९६२ में लिखी इस कृति के माध्यम से आज के तथाकथित महानायकों के रूप में हम देख सकते हैं.
महानायक बनने तक बहराम की यात्रा के कई पड़ाव हैं- शादी, ब्याह में अंगूठी बनाने का काम, उसने व्यापार में कुछ ताम्बा मिलाकर सोने को पीटना और तार तार करना शुरू किया, साहूकारी कर माल गिरवी ऐसे रखा कि यह मुहावरा चल गया ‘चोर का माल बहराम खाए.’ फिर माइक लाउडस्पीकर की दुकान क्या खोली वहां माइक टेस्टिंग करते करते कार्यक्रम संचालक के हाथ से पर्ची छीनकर खुद संचालक बन बैठता है. स्कूल में पालक दिवस में एंट्री मारकर प्राचार्य, गुरूजी, बहनजी सबको हलाकान किया, उसने विद्यार्थियों के बीच व्याख्यान दिया “वाल्मीकि हत्यारा था लेकिन मुनि के रूप में वह इतिहास में अमर हो गया. सूरदास भी वेश्या प्रसंग करता था लेकिन उसकी सगुन भावना ने उसे महाकवि बनाया… लेकिन बहराम ने ऐसा कौन सा कमाल कर दिखाया… देखते नहीं वह प्रवेश द्वार. इसे बनाने में बहराम ने मुक्तहस्त से दान दिया(पृष्ठ-14).” आयोजन के सारे खरचे बहराम झांसा देकर शाला विकास समिति से वसूल लेता. राजनीति में पांव पसारे तो नेतागिरी ट्रेनिंग के लिए बार बार जुलुस निकलवाना, प्रभात फेरी कराना, छाती और दोनों कंधे पर झंडे चिपकाना, जय, बन्दे माताराम का नारा बुलंद करना. तात्पर्य यह कि बहराम चोट्टा बहुमुखी प्रतिभा का घोर पक्षपाती रहा. वह धीरे धीरे नशे की तरह बस्ती की देह में चढ़ने लगा. मगर इस हस्ती को रोकने की ताकत किसी की नहीं हुई. सभी नागरिक, अफसर-चपरासी, पुलिस-दरोगा रूपी चूहों के सामने समस्या थी कि बहराम रूपी बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे(पृष्ठ-५).” अब बहराम हर किसम की ठेकेदारी में हाथ डालने लगा. नेताओं अधिकारियों को मुख्य अतिथि बनाकर उन्हें धार्मिक कार्यक्रमों से जोड़ता. कवि-सम्मलेन का संयोजक बन जाता(पृष्ठ-२१). इन सबमें गाहे बगाहे इतिहास और परंपरा पर उसके भ्रमित करने वाले त्रुटिपूर्ण वक्तव्य वैसे ही होते जिससे धीरे धीरे कोई आदमी नेता में तब्दील हो जाता है.
इस कृति की रचना में मुद्रण संबंधी कुछ प्रयोग किए गए हैं. इसके अनुक्रम में जो अध्याय दिए गए हैं उन्हें अध्याय के बदले में पहेलियाँ कहा गया है. पहेली का अर्थ एक ऐसा प्रश्न या कथन है जिसका दोहरा या गूढ़ अर्थ होता है, जिसे समझने के लिए सोच-विचार और चतुराई की आवश्यकता होती है. यह अस्पष्ट और उलझाऊ होता है ताकि उत्तर खोजने में चुनौती आए. इस उपन्यास में लेखक ने प्रमुख पात्र बहराम के चरित्र को ऐसे निर्मित किया है कि वह आदमी नहीं पहेली जान पड़ता है. एक भ्रष्ट और चरमराती व्यवस्था को साधकर सड़क चौराहे की होल्डिंग में खड़ा यह चोट्टा-चरित्र समाज के लिए और यहाँ पाठकों के लिए बड़ा अबूझ पहेली है जिसका हल खोजना आसान नहीं है भले ही उसका दुश्चरित्र विषम परिस्थियों के भंवर जाल में फंसकर स्वमेव उद्घाटित हो जाए.
उसके क्रॉसवर्ड (वर्ग) पहेली के आरंभ में जो पृष्ठ संकेत दिए गए हैं उसमें प्रारंभ के आठ अध्याय को ‘बांयें से दांयें’ निरुपित किया गया है. शेष सात अध्यायों को ‘ऊपर से नीचे’ कहा गया है. इसका आशय है कि पहले निरूपण में सूत्रधार बहराम चोट्टे के किस्से में उसे आगे बढ़ाते हुए उन्नति करते हुए उसे येन केन प्रकारेण शक्तिमान होते हुए दिखाया गया है. इसके दूसरे निरूपण में महाबली हो चुके बहराम का पतन (ऊपर से नीचे यानि उसका डाउनफाल) होते दिखाया गया है. जब जनता, अधिकारी, कर्मचारी, मीडिया सब बहराम की झूठ बोलने की आदतों और उसकी अवसरवादिता से त्रस्त होकर उसके विरोध में उतर आते हैं तब बहराम भी पस्त होकर अपने द्वारा बसाए गए नगर ‘बाहराज’ के निवासियों को संबोधित करते हुए आत्म-समर्पण में कहता है कि “मैं झूठ नहीं बोलता हूँ अब तो मेरा नारा है –
झूठ बोलना पाप है
गढ़हे में सांप है
आस्तीन का सांप है
बचके रहो भाइयो
बाहराज के वासियों.
पुस्तक की प्रस्तावना में साहित्य मनीषी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखते हैं कि “मध्यप्रदेश(अविभाजित) के तरुण साहित्यकारों में विश्वेन्द्र जी ने अपना एक विशेष स्थान बना लिया है. उनमें एक कवि की प्रतिभा है और एक प्रख्यायिक लेखक की रचनाशक्ति. उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जीवन के मार्मिक प्रसंगों को अपनी रचनाओं में बड़ी कुशलता से उपस्थित करते हैं. उनमें व्यंग और मृदु परिहास भी है. अपनी सूक्ष्म दृष्टि से वे जीवन की यथार्थता को अच्छी तरह देख लेते हैं. इसीलिए साधारण घटनाओं का समावेश करके भी वे अपनी कहानियों को सरस बना डालते हैं. यही विशेषता उनकी इस रचना में भी लक्षित होती है.”
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विनोद साव
(आज कृति के विमोचन पर शोध पत्रिका के लिए लिखा आलेख)