March 6, 2026

मैं एक बूँद हासिल नहीं कर पाया

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* विष्णु नागर

[ शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक की पांडुलिपि ‘मैं और मेरी पसंद’ से आज हम चलते हैं देश के प्रतिष्ठित कवि, व्यंग्यकार व पत्रकार श्री विष्णु नागर जी से बतियाने….. ]

ठीक-ठाक लेखक बनने का मतलब
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“न मै अपने आपको इतनी अच्छी तरह जानता हूँ (आध्यात्मिक अर्थ में नहीं) और न मैं जो भी, जितना भी हूँ, उसकी पसंद कभी-कहीं एक जगह जाकर स्थिर हुई है कभी । मेरी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता जाता है। मैं साहित्य से बाहर की भी कुछेक चीज़ों में थोड़ी दिलचस्पी रखता रहा हूँ-ख़ासकर समकालीन जीवन, समाज और राजनीति से जुड़े विषयों में तो उनमें भी बहुत कुछ पसद आता रहता है और कई बार ऐसा भी होता है कि वह किसी कविता-कहानी से ज़्यादा रचनात्मक उत्तेजन देता है।

मै यह भी मानता हूँ कि कोई लेखक सिर्फ़ साहित्य पढ़-पढ़कर, उसी में जी-जीकर ठीक-ठाक लेखक भी नहीं बन सकता, औसत अच्छे लेखक को भी बहुत सी चीज़ें बनाती -बिगाड़ती हैं । बहरहाल यहाँ साहित्य तक सीमित रहने की कोशिश करता हूँ।

मैं उसे दोबारा पढ़ना नहीं चाहा
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किशोरवय में मैंने जब धर्मवीर भारती का लोकप्रिय उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ा था (और उस समय कौन साहित्य पढ़नेवाला ऐसा रहा होगा, जिसने इसे नहीं पढ़ा होगा?) तो मैं इसके अलग तरह के रोमांस में फँस गया था, विशेष रूप से उसकी भाषा के रोमांस में । ऐसा चमत्कृत हो गया था कि तब लगा था कि क्या कोई मनुष्य ऐसी चमत्कारी भाषा लिख सकता है, क्या यह उसके बस में है, यह तो देवता ही कर सकता है ? आज यह सोचना हास्यास्पद लगता है लेकिन यह जादू ज़्यादा समय तक टिक नहीं सका और मैंने कभी उसे दुबारा पढ़ना नहीं चाहा मगर आज उस उपन्यास के कथानक की नहीं, उसकी भाषा के उस जादू की स्मृति बाक़ी है । तो उम्र का भी पसंद-नापसंद से बहुत गहरा रिश्ता होता है । शायद आज जो मुझे पढ़ना अच्छा लगता है, वह शेष जीवन में भी अब लगता रहेगा ।

नाम तो बहुत से याद आ रहे हैं अपनी पसंद के लेखकों के, जिनमें विदेशी लेखकों में तोल्सतोय, चेखव, गोर्की, ब्रेख्त, रसूल हमजातोव आदि कुछ बड़े नाम हैं और कई ऐसे नाम हैं, जिनके नाम याद नहीं मगर रचना चमत्कृत करती है। विश्व कविता में पाब्लो नेरूदा,ताद्युश रोजेविच, शिम्बोर्स्का, ब्रेख्त आदि नाम तुरंत याद आ रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि सिर्फ़ यही नाम हैं और इस छोटी सी टिप्पणी को नामों की माला बना देने का कोई अर्थ है।

उर्दू में कौन ग़ालिब और फ़ैज़ के बगैर कोई बात क्या शुरू कर सकता है? उर्दू गद्य में मंटो, इस्मत चुगताई और इब्ने इंशा ये तीन ही नाम लेकर आगे बढ़ता हूँ ।

हिंदी में प्रेमचंद,महादेवी(गद्य) रेणु, परसाई, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय से लेकर विनोद कुमार शुक्ल, ऋतुराज, तुलसीराम तक अनेक नाम हैं और बहुत से नाम छोड़ रहा हूँ क्योंकि एक को याद करूँ और दूसरे को भूल जाऊँ, यह फिलहाल ठीक नहीं।

ग़ैरहिंदी भारतीय साहित्य में बांग्ला, मराठी,कन्नड़, मलयाली आदि के कई बड़े नाम हैं। मराठी दलित लेखक दया पवार के अछूत उपन्यास ने जैसे मुझे हिलाकर रख दिया था। उनसे नवभारत टाइम्स, मुंबई के दफ़्तर में मिलने की हल्की सी स्मृति भी है।

मैं एक बूँद हासिल नहीं कर पाया
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विचारधाराओं के अध्ययन के मामले में मैं खुद को बहुत कोरा मानता हूँ मगर आज जब भारत में हर तरफ़ से मार्क्सवाद को लतियाने का संगठित-असंगठित अभियान चल रहा है, तब भी मैं खुद को इस विचारधारा के नजदीक पाता हूँ हालाँकि मार्क्सवाद विचारों का इतना बड़ा समुद्र है कि मैं तो उसकी एक बूँद तक हासिल नहीं कर पाया हूँ ।

लोहिया का भी प्रभाव रहा है, इधर अंबेडकर को कुछ पढ़ा है और मेरे मत में भारत के जातिवाद का जैसा गहरा विश्लेषण उन्होंने किया है, वैसे शायद ही कहीं और हो। उसमें स्वानुभव और गहरे अध्ययन का अदुभुत मेल है ।

गाँधी से भी अप्रभावित नहीं हूँ और भगत सिंह से प्रभावित हूँ। रघुवीर सहाय की कविताओं से तो लगभग सब प्रभावित हैं मगर मुझे लगता है उनकी गद्यभाषा की जटिलता के बावजूद दो ही ऐसे हिंदी लेखक हैं जिनके विचार की दुनिया बहुत बड़ी है, दूसरा नाम निश्चय ही मुक्तिबोध का है।

कच्चे घर को लीपने- पोतने का उत्साह
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बचपन में बहुत कुछ अच्छा लगता था, त्योहारों का इंतजार रहता था। क़रीब डेढ़-दो दशक पहले तक होली मनाना अच्चा लगता था, चूँकि हम कुछ मित्रों के परिवार मिलकर खूब मनाते थे। बाद में सब कई कारणों से बिखरता चला गया।

बचपन में दीपावली से पहले अपने कच्चे घर को लीपने- पोतने का बेहद उत्साह रहता था और माँ के द्वारा बनाये गये पकवानों को खाने का भी, जो बहुत नहीं होते थे मगर होते थे। साल मे एक बार दशहरे पर नये जूते पहनते थे तो उसका भी बहुत इंतजार रहता था। अब ठीक है, मनते सब त्योहार हैं पर उत्साह कम औपचारिकता ज्यादा रह गई है । नया साल भी अब नया नहीं लगता, पुराना साल चला गया है, ऐसा नहीं लगता।

अब तो जब से केंद्र में यह सरकार आई है, वे लोग ज़्यादा सौभाग्यवान लगते हैं जो इसके पहले या इसके ठीक बाद गुज़र गए। यू. अनंतमूर्ति ने कहा था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो यह देश छोड़ दूँगा और मोदीजी की सरकार बनने के बाद उन्हें कितना अपमानित किया संघ-भाजपा के लोगों ने। उनकी मौत का कारण उनका बिगड़ता स्वास्थ्य ही रहा होगा मगर वह इस सरकार के बाद ज़्यादा ज़िंदा नहीं रह पाए।
सपने में अगर वे दीख जाएँ, जिससे आप जिंदगी में कभी न कभी बहुत ज़्यादा लगाव रखते थे और जो अब या तो नहीं है या हैं तो बहुत दूर से हो गए हैं और वे अगर सपने में दिख जाएँ क्योंकि सपना जब आता है तो वह सपना नहीं होता, यथार्थ होता है जो सुकून जागने पर भी मिलता है, उसके क्या कहने?

मैं 32 साल की उम्र में पहली बार हवाई जहाज पर चढ़ा था लेकिन अपने क़स्बे के आकाश में कई बार मैंने हवाई जहाजों को उड़कर जाते देखा था और तब हवाई जहाज में बैठने का क्या आनंद होता होगा, इसकी कई कल्पनाएँ करता था।उस कल्पना में की गई हवाई जहाज में यात्रा में जो अद्भुत आनंद आया था, वह वास्तविक हवाई जहाज में कभी नहीं आ सका। इसका क्या करें? क्या वह काल्पनिक आनंद, आनंद नहीं था? क्या जो आनंद कल्पना की उड़ान में है, वह निर्रथक था?

बचपन में तो बस कंडक्टर के भाग्य से भी बड़ा रश्क होता था कि कितनी बढ़िया नौकरी है, गाड़ी चलाने का झंझट नहीं, बस टिकट काटो-बाँटो और रोज़ सफ़र का सुख लो, यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ जाओ और ऊपर से सरकार से इसकी तनख़्वाह मुफ़्त में लो। वाह! बचपन में हम ऐसी ही फैंटेसियों में जीते हैं और उनमें जीना आनंददायक होता है। किस तरह की फैंटेसी में आप जीते हैं, वह आपके वर्ग, देश और शायद जिस धर्म में जन्म लेते हैं, उस पर भी निर्भर होता है। आज जो बच्चे सौभाग्यशाली हैं, जिन्होंने बचपन से हवाई सफ़र किया है लेकिन उन्हें मेरीवाली फैंटेसी में जीने का मौक़ा नहीं मिला लेकिन उनकी भी अपनी फैटेंसियाँ हैं क्योंकि बच्चे इनके बगैर रह नहीं सकते।

किसे अपने कुछ परिजन बेहद पसंद नहीं होते मगर आप उनमें से किसी को जानते नहीं, उनके बारे में जानने का कोई फ़ायदा भी नहीं,इसलिए यह विषय छोड़ता हूँ।

जीवन में दोस्तियाँ बनती-टूटती रहती हैं लेकिन जो दोस्तियाँ दशकों से चल रही हैं, वे कम होती हैं लेकिन बहुत सुखद होती हैं। मेरे बच्चे दिल्ली से बाहर हैं मगर दो ऐसे बच्चे इस निर्मम कहे जानेवाले शहर में भी रहते हैं, जो उस अभाव को अपनी तरह पूरा करते हैं-सबसे ज़्यादा अपनत्व का सुख चाहिए होता है, जिसकी ज़रूरत बढ़ती उम्र के साथ बहुत महसूस होती है। वह उनसे मिलता है। पांरपरिक रीति से जाति की सीमा में विवाह हुआ और संयोग कि पत्नी ने मेरे जीवन को आसान और सुखद बनाया। कई काम आज भी उनकी उपेक्षा की क़ीमत पर ही कर पाता हूँ।

पैदल चलना और भटकना
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पैदल चलना और भटकना मुझे प्रिय रहा है और अब भी है।भीड़भाड़ देखकर मैं घबराता नहीं,उसका हिस्सा बनकर अच्छा लगता है। अच्छा शाकाहारी भोजन अच्छा लगता है और कभी-कभी शराबनोशी भी।

जीवन से इस मायने में बहुत खुश हूँ कि लोगों ने मुझे मेरी काबिलियत से ज़्यादा सम्मान दिया है क्योंकि अपनी कमज़ोरियाँ छिपाने में मैं अपनी समझ से बहुत हद तक कामयाब रहा हूँ। कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सा आता है, इससे मुझे डर लगता है और शर्म आती है।

मुझे बहुत से ऐसे लोग मिले हैं या जिन्हें देखा है, जो हर पैमाने पर मुझसे बहुत बड़े हैं। यह सौभाग्य भी कम है क्या? बहुत तो नहीं अच्छा भारतीय शास्त्रीय संगीत सुना है और अच्छे फ़िल्मी गीत भी।

समय कम है मगर बहुत पढ़ना-देखना-खोजना जानने की इच्छा बाकी है। इति !”
प्रस्तुति – जयप्रकाश मानस
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