July 22, 2026
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वाग्मिता का मतलब होता है बात को बढ़ा -चढा कर कहना , जिससे सुनने या पढ़ने वाला प्रभावित हो सके। इसका उपयोग एक जमाने में जन के बीच दिये जानेवाले भाषणों में होता था। वहीं से वह काव्य की अभिव्यक्ति में आई और एक जमाने में वह कविता का गुण माना जाता था। उसके लिए बाकायदे शास्त्र का निर्माण हुआ था। उसके पांच तत्त्व गिनाए गए थे, जिनको एक तार्किक व्यवस्था में रख कर एक पूरी प्रक्रिया बनाई गयी थी। ये तत्व थे आविष्कार, रखने की व्यवस्था, शैली, स्मृति और प्रदान। परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे वह बकवास और अतिशयोक्ति का रूप लेता गया और तब काव्यदोष माना जाने लगा, विशेषकर तब जब सामयिक जागतिक यथार्थ रचना का विधेय बना। तो भी वह लोक काव्य में, आल्हा, चनैनी, लोरिकायन वगैरह में बना रहा। इधर उसका पुनर्प्रवेश लिखित साहित्य में होने लगा है, विशेषकर जब से विमर्शों का जमाना आया है। इसने अभिव्यक्ति के नये क्षितिज खोले हैं।
निरा वर्णन को भी काव्यदोष माना गया है। गद्य के लिए वह चाहे जितना मुफीद हो, काव्य को सपाट और विस्तारित बना देने के कारण वह दोष बन जाता है, क्योंकि काव्य की मांग होती है संक्षिप्ति और थोड़ा छुपाकर बात कहने की अदा, जिससे कि वह लोगों की जुबान और स्मृति में स्थान बना सके। रस, छंद, अलंकार और औचित्य की जरूरत इसलिए पड़ी। अष्टभुजा शुक्ल अपनी कविता को छंदवत लिखते हैं तो इसीलिए। पर इधर निरा वर्णन भी एक काव्य ढंग के रूप में बहुत तेजी से उभरा है और कविताई के नये क्षितिजों का अन्वेषण किया है, विशेषकर विमर्शप्रणीत काव्य के लिए।
दोनों का एकसाथ और बड़ा सम्यक प्रयोग कर तमाम कविताएं इधर युवा कवि विहाग वैभव ने लिखा है, जिनका संकलन ” मोर्चे पर विदागीत” राजकमल प्रकाशन से मेरे सामने है। उससे कविता का क्या स्वरूप बनता है, बानगीस्वरूप उसका एक अंश प्रस्तुत करता हूं :–

मैं एक रोज भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था
तभी उधर से कुछ सिपाही गुजरे
उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिय
और अपने साथ उठा ले गये

उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया
हत्यारा बनाया
हमला करने का प्रशिक्षण दिया
आततायी बनाया
उन्होंने बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर
उनके धड़ से उतार लूं
पर मेरा मन दया और करुणा से न भरने पाये

उन्होंने मेरे चेहरे पर खून पोत दिया
कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है
मेरे कानों में हृदयविदारक चीखें भर लीं
कहा किया यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज है
मेरी पुतलियों पर टांग दी लाशों से पटी युद्ध -भूमि
और कहा कि यही तुम्हारी आंखों का आदर्श दृश्य है
उन्होंने मेरे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी..

हम दोनों अपने राजा की हवस के लिए लड़ते हैं…
दुनिया का हर सैनिक इसीलिए लड़ता है मेरे भाई

हत्या व हत्यारा का एक दूसरा रूप वे समकालीन राजनीति में देखते हैं । लिखते हैं:–

बच्चों की हत्या करें, चिकित्साधिकारी बनें
स्त्रियों की हत्या करें, सुरक्षाधिकारी बनें
विधर्मियों की लाशें कब्रों से निकालें फिर हत्या करें
मुख्यमंत्री बनें
देश की छाती में धर्म का धुआं भरकर देश की हत्या करें
प्रधानमंत्री बनें

अत्याचार की इंतहा की चर्चा करते हुए जब उन्हें शब्द नहीं मिलता तो फूलन देवी के संदर्भ में वे इस तरह से लिखते हैं:–

कविता में लिखना मुमकिन नहीं कि
कैसे उसकी योनि को बैल की तरह जोता गया
और स्तनों को चमार की तरह खटाया गया

अब जब अय्यास जुबानों के कथकहे
फूलन को हत्यारिन कहते हैं
तब मैं पूछना चाहता हूं गुजरात की नदियों में
जिसने पानी की जगह खून बहाया
वह कहां है
कहीं वह देश का नेतृत्व तो नहीं कर रहा

यह जो साफ – साफ चमार कहना है, उसे रूपक की तरह बांधना है, वह रचनाकार को वही उ ऊंचाई देती है, जो स्वर्गीय हीरालाल को अपने पर हंसने की क्षमता से मिली थी।
उनकी काव्यक्षमता को हम छोटी कविताओं में खूब लख पाते हैं। यथा :–

मैं जीवन को ऐसे जीना चाहता हूं
जैसे मेरे कवि ने जी है भाषा

कोई भी एक शब्द उठाकर
उसे सुंदर वाक्य में बदल दिया
और ध्वनियों को बनाये रखा हमेशा
अर्थवान
न्याय, समानता और प्रेम का पक्षधर

यही उनकी चाहत है। कविता का शीर्षक है “शैली ‘। यह जो किरौना वाली महामारी चली थी, कोरोना। उसे लेकर उस काल में काफी कविताएं लिखीं गई। उन पर विहाग वैभव की कविता शृंखला कुछ बीस ही लगती है। एक कविता देखें:–

कोई ऐसा शब्द कहो
जिसका सचमुच कोई अर्थ हो

कोई ऐसी नदी दिखाओ
जिसमें न बहा हो हमारी आंख का पानी

कोई ऐसा फूल उपहार में दो
जिसकी गंध बाजार में न बिकती हो

अपने प्रेम और घृणा के लिए दलीलें देना बंद करो
ताकि मैं भरोसे पर पुनः भरोसा कर सकूं

अर्थ, रस, गंध और स्पर्श
सब अपनी सवारियों से पलायन कर रहे हैं
और यही इस दौर की सबसे विकराल महामारी है

अगर नहीं तो
एक ऐसे मनुष्य से मिलाओ
जिससे मनुष्य कह कर पुकारूं
और वह पलट कर जवाब भी दे।

कविता का व्यापक अर्थ तब खुलता है जब हम ख्याल करते हैं इसका शीर्षक ‘ प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी ‘। और भी बहुत कुछ है इस संग्रह में। पढ़ कर देखिए।
श्रीप्रकाश मिश्र

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