बशीर बद्र सर को ख़ुदा दिखाई देते होंगे…
विख्यात शायर बशीर बद्र बीमार हैं, यह पता था. बीच में उनके निधन की झूठी खबर फैली थी, वास्तव में बेहद गंभीर तबीयत है उनकी!
कुछ दिनों पहले इनका एक वीडियो देखा जिसमें उनकी बेगम राहत बद्र शुश्रुषा करतीं, शायर की याददाश्त बनी रहे करके शेरों-शायरी पे बात करतीं दिखीं. बशीर सर डिमेन्शिया अल्झायमर से पीड़ित हैं. अपना माजी भूलते जाते हैं वे. अब अब तो परिचितों तक को भूलने लगे हैं. धीरे धीरे अपना खुद का अस्तित्व भी भूल जाएंगे. प्राणों से प्रिय अपनी शायरी भी स्मरण न रहेगी उन्हें. वे ब्लैंक हो जाएंगे. मंद गति से चलती जाती धड़कनें केवल बच रहेंगीं उनकी!
इनकी पत्नी भलीभांति जानतीं हैं; भूलने की यह प्रक्रिया रोके रहना, इनकी शायरी ही का बूता! यही वजह है कि रोज उनकी शायरी को लेकर वार्तालाप किया करतीं हैं वे…
किसी इनके शेर की पहली लाइन वे सुनातीं हैं और इसे पूरा करने को सर से कहतीं हैं. बशीर साहब तन्हाई के अपने आलम से निकलने का प्रयास करते हैं. इधर उधर शून्य में देखते हुए कभी, तो कभी अपनी पत्नी को देखते…फीकी सी हँसी हँसते हैं, दिमाग पर जोर डालते हैं और फिर टूटे-फूटे शब्द कुछ याद आते हैं कभी, तो कभी पूरा शेर याद आ जाता है. उनके रदीफ़ बयां करते ही राहत मैडम के चेहरे पर सन्तुष्टि दिखती है. जीवनसाथी को खुश देख हल्की मुस्कान आ जाती है सर के चेहरे पर!
वे अब नब्बे बरस के हैं. जाने कितने ही लोग, इनकी शायरी से प्रेम करते बड़े हुए होंगे. जाने कितनों ही को उनके अशआर सुन दिलासा मिला होगा. बशीर साब की ग़ज़ल बनकर रह गयीं हैं उनकी बेगम. जो क्लिप मैंने देखी, इसमें राहत मैम उनका एक शेर सुना रहीं;
“ख़ुदा, ऐसे अहसास का नाम है…”
उक्त पंक्ति को बार बार दोहराते हुए इसे पूरा करने रदीफ़ सुनाने का आग्रह करतीं हैं अपने शौहर से वे. तीन चार बार के बाद लड़खड़ाती जुबान में जवाब आता है बशीर साब का;
“…रहे सामने और दिखाई न दे!”
शेर के पूरा होते ही छोटे बच्चों की मानिंद हंसतीं हैं राहत मैम और वृद्ध बशीर साब के गालों पे हाथ फिराते हुए पूरा शेर पढ़तीं हैं;
“ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है, रहे सामने और दिखाई न दे…!!!”
बशीर साब का ख़ुदा, पत्नी का रूप लिए इनका ध्यान रखता प्रतीत होता है. सर को दिखता सब है, पर महसूस कर पाने की सीमा से बाहर जा चुके हैं वे. लौकिक अर्थों में कहा जाए तो; पानी की लिखावट पढ़ने के सफर पे हैं वह;
“अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना,
हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है!”
एक बात जो यहाँ बतानी है मुझे वह यह कि अनमोल से अनमोल अपना शेर अत्यंत अपनी रसीली आवाज़ में सहजता से पढ़ जाना, खासियत रही है इनकी…
“अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा!”
इस शेर को पढ़कर सुनातीं हैं जब राहत मैम, अपनी पत्नी के प्रेम को ख़ूब समझते से लगते हैं डॉक्टर साहब और कभी कभी तो लगता है वे लौटा लाएंगीं अपने शौहर को…
– समीर गायकवाड
[अपने मराठी इस आलेख में कुछ फुटनोट्स भी लिखें हैं समीरजी ने. मुझे ऐसा भाया यह आलेख कि बिना उनकी अनुमति अनुवाद कर, शेयर कर रहा आप सबसे इसे मैं…]
नोट 1 : इकलौता इनका पत्र नुसरत, बालपन से कविता का शौक था इसे. मेरठ अग्निकाण्ड में सर्वस्व लुटाने के बाद बेचैन हो चुके बशीर साब नहीं चाहते थे कि बेटा कविता-शायरी करे. नुसरत की शायरी सरपरस्ती न पा सकी सर की. व्यवसायिक यश प्राप्त करनेको मुश्किलें पेश आयीं नुसरत को. बशीर साब को कोई शिकवा न था. उनकी नज़र में सब ठीक हो रहा था, पर वास्तविकता अलग थी. प्रारब्ध को कुछ और ही मंजूर था. दसेक बरस की बीमारी के बाद 2020 में चल बसे नुसरत और बद्र दंपति दुख की गर्त में धंस गए. अपने शौहर को स्मृतिभंश का शिकार होते देख राहतजी ने कमर कसी कि जिंदा रहनेको जरूरी था ये. एकांत जीवन बिताने लगे बशीर सर की शायरी में…पत्नी के लाख प्रयासों के बावजूद…जाने अनजाने उदासी झलकने लगी. कहीं लिखते हैं वे;
“कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँ ही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता..!!”
नोट 2 :
1987 मार्च से जून…लगातार चार महीने…दंगाग्रस्त शहर रहा मेरठ. हजारों आशियाने इस दरमियान जला डाले गए. तीन-चार सौ के लगभग संख्या रही हताहतों की. आधिकारिक आंकड़ें ये. शहर के हाशिमपुरा इलाके से चालीस के लगभग युवा मुसलमानों को गंगा के किनारे पॉइंट-ब्लैंक शूट कर डाला गया पुलिस द्वारा. इनमे से बच रहे एक ने एफआईआर दर्ज करवाई. क्रूर न्यायिक प्रक्रिया तीस बरस जारी रही. न्याय के नाम पर 2015 में कुछ पीड़ितों को भरपाई मिल पाई, इसपर से अंदाज लगा लें आप. खैर, इस पोस्ट का मुद्दा नहीं यह. बशीर साब का घर इसी दुर्घटना में जला दिया गया था. इस अग्निकाण्ड में हस्तलिखित इनकी रचनाएं और डायरियां भस्म हो गयीं. व्यथित डॉक्टर बशीर बद्र मेरठ से भोपाल शिफ्ट हो गए. इन्हीं दिनों लिखा यह शेर पहचान बन गया इनकी;
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में!”
मराठी में हम कहते हैं; ‘ज्याचं जळतं त्यालाच ते कळतं’, मतलब जिसकी जलती है, वही जानता है…बाकी लोग सहानुभूति जताने से इतर और कुछ नहीं कर सकते. इतना सब हो चुकने के बाद भी जिन्हें द्वेष जारी रखना होता है, रखते ही हैं…रखें!
नोट 3 : वैसे तो कहते हैं अपने ख़ुदा से उम्र के चालीसवें बरस ही में कैफियत कर रखी थी डॉक्टर साहब ने जिसकी व्यथा कलेजा चीर देने की क्षमता रखती है;
“ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है..!”
डॉक्टर साहब को आखिरी अपनी जद्दोजहद का पूर्वानुमान हो चुका था शायद…
अतिसंवेदनशीलता, त्रासदायक तो होती ही है न!
मूल पोस्ट : Sameer Gaikwad
अनुवाद : सत्येन भंडारी