एक दीया जरूर धरना….
दीवाली के दिन
एक दीया रखवाना कदापि नहीं भूलती थीं माँ
उस कमरे में
जहाँ होते थे मिट्टी से बने गोल-मटोल कुल देवी-देवता
जिनकी
पूजा करती आई थीं तब से
जब से
पग धरी थी सात फेरे लेकर मेरे पिता के साथ वह
इस घर में
जो मिट्टी से बने हैं
दीगर बात है कि
दीवाली के दीये को छोड़कर
रोज एक दीया रखती थी वहाँ डेरउठी के साथ-साथ
घर इतना छोटा था
कि कोई जगह ही नहीं बनता था तुलसी के बिरवे के लिए
जहाँ
रोज दीये धरते देखता था पड़ोस के घरों में
बड़े दाई और काकियों को
हाँ!
कातिक महीने से पहले जरूर लगाती थी
तुलसी का एक पौधा
साल-दर-साल मेरी माँ गमले में
सुरहुती के दिन दीपदान करने आने वाले बच्चों का ध्यान धर
एक दीया रखवाना नहीं भूलती थी वह
‘पटउँहा’ में
जहाँ होती थी धान की कोठी
जो
आज नहीं दिखती कहीं किसी के घर
आड़े वक्त में
काम आते थे कोठी में रखे धान किसी गहने की तरह
पंद्रह-सोलह बरस के बच्चे शायद ही जान पाए
अब कोठी को
एक-एक दीया रखवाना नहीं भूलती थी वह
महामाई, शीतला माई
ठाकुर देव, बावा देवता, नाग देवता सहित
गाँव के सभी देवालयों में
जो
नीम, पीपल या बरगद के छाँव तले
विराजित हैं ‘तब से’
एक दीया भिजवाना कभी नहीं भूलती थी
गाँव के स्कूल में रखने
जहाँ मैं पढ़ा था पाँचवीं तक
भले वह चौथी पढ़ी थी लेकिन जानती थी शिक्षा की महत्ता
बाड़ी-ब्यारा थे नहीं
लेकिन घूरे में भी दीपदान जरूर कराती थी वह मुझसे
क्यों
वह ही जानती थी
मैंने पूछा भी नहीं उससे कभी
बस
इतना सुना था बचपन में लोगों से कि घुरवा के दिन बहुरथे
शायद उसे
लगता रहा हो हमारे दिन भी बहुरेंगे कभी
सच भी है कि दिन बहुरे हैं हमारे
लेकिन
माॅं चली गई है हमारी दुनिया से
दीपदान के लिए
चाँवल पिसान से बने दीये
थाली में गिनकर धरते हुए कहती थी
एक दीया
जरूर बचा कर रखना पुरखौती घर के लिए
जो छूट गया था बँटवारे में
मैं साफ-साफ सुनता हूँ
माला चढ़े उसकी तस्वीर से आती हुई आवाज़
हर दीवाली में
जिसमें
एक स्वर यह भी सुनता हूॅं
कि एक दीया जरूर धरना……बेटा।
०००
पोखन लाल जायसवाल
पलारी (पठारीडीह)
जिला बलौदाबाजार-भाटापारा छग
६२६१८२२४६६