डॉ. रामविलास शर्मा की किताब निराला…
डॉ. रामविलास शर्मा की किताब निराला की साहित्य साधना की आरम्भिक पंक्तियां हैं – कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का लोक मांगल्य और रवींद्र के सौंदर्यबोध की त्रयी निराला में न केवल विलीन होती है बल्कि उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को ऐसी ऊंचाइयां प्रदान करती है जिसका उदाहरण हिंदी साहित्य में विरल है ।
इस कथन के आलोक में हम समझ सकते हैं कि हिन्दी साहित्य में निराला जी कितनी अहमियत रखते हैं । आज उनकी पुण्यतिथि पर हम स्मरण करें कि छायावाद के सुदृढ़ स्तम्भ होते हुए भी उन्होंने कैसे लोक को अपनी कविताओं में जगह दी ,स्थापित छंद विधान को तोड़ा दुख ही जीवन की कथा रही कहने के बावजूद जीवन भर रचनात्मक ताप से दहकते रहे ।
आज ही के दिन 15 अक्तूबर 1961 में दिवंगत हुए निराला आधुनिक हिंदी कविता के सबसे बड़े कवियों में से एक हैं । हालांकि अपने जीवनकाल में अनेक विपत्तियों, संघर्षों, उपेक्षाओं से जूझते रहे लेकिन कालांतर में उनके हिंदी साहित्य में योगदान को मुक्त मन से स्वीकारा गया । निधन के छः दशक बीतने के बाद भी निराला हिंदी कविता के केंद्र में हैं और आधुनिक हिन्दी कविता का कोई भी विमर्श उनके बिना अधूरा है ।
निराला का पूरा जीवन त्रासदी, दुःख और पीड़ा का दीर्घ कथानक है और सब कठिनाइयों के बाद भी उनका रचनात्मक बने रहना उनकी जिजीवषा का प्रमाण है ।
निराला ने बहुत श्रम, निष्ठा और धैर्य के साथ लेखन किया और बहुत लिखा । भावों को शब्द रूप देने में वे बहुत श्रम करते थे और घंटो की मेहनत के बाद तीन चार पंक्तियां लिखते थे । निराला की साहित्य साधना में डा . रामविलास शर्मा लिखते हैं कि निराला लिखने में जल्दबाज़ी कभी नही करते थे । पंडित नरेंद्र शर्मा की ये पंक्तियां निराला जी पर भी लागू होती है – ” वह हिंदी का लेखक था खून सुखाकर लिखता था ।”
मैं अकेला
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मैं अकेला
देखता हूँ आ रही
मेरे दिवस की सांध्य बेला !
पके आधे बाल मेरे
हुए निष्प्रभ गाल मेरे
चाल मेरी मंद होती आ रही
हट रहा मेला !
जानता हूँ नदी झरने
जो मुझे थे पार करने
कर चुका हूँ, हँस रहा यह देख
कोई नहीं भेला !
मैं अकेला !!!
—सूर्यकांत त्रिपाठी निराला