निहाल सिंह की पांच कविताएं
1. शीर्षक – पुस्तकालय
पुस्तकालय की
अलमारियों में
रखी हुई है
किताबें मोटी-मोटी
बच्चें पन्ने उथल
रहें है
ढूंढ रहें है उसमें
चिड़ियों के सुनहरे पंख,
भंवरों की गुंजन,
जुगनूओ की टिमटिमाती
दो ऑंखें,
युवा ढूंढ रहे
है उसमें
अच्छी सी नौकरी,
बड़ा सा निकेतन,
सुन्दर सी भार्या
बुजुर्ग ढूंढ रहे
है उसमें
बुढ़ापे की पेंशन,
बड़ा सा अखबार,
समाचार वाले चैनल
2. शीर्षक – बुग्याल के लोग
बुग्याल के लोग
उष्ण के दिन आते
ही पलायन कर लेते
हैं ऊंचे पहाड़ों पर
बिछा लेते है
बयारों से बिखरे
पल्लवों के म्हीन – म्हीन
टुकड़ो को
ओढ़ लेते है
ऊंचे देवधर के पेड़ो
से छनकर निकली
गुनगुनी धूॅंप को
महिलाएं माथे पर
रेशमी डूपटे
बांधकर घास- फूंस
काटती फिरती है
दिन ढ़लने तक
टेढ़ी-मेढ़ी कठोर
पत्थरों की क्यारियों से
3. पहाड़ो की लड़कियां
पहाड़ की लड़कियाॅं
छोड़ देती है
सेब की बगीचीं में
अपने गालों की लालिमा
धूॅंप की किरणें जब
पड़ती है तो चमचमाते
है सेब के बग़ीचे
समूची वादियों में
गोरी-गोरी लड़कियों
के मुलायम अधरों
की ज्यूॅं
नाज़ुक हस्तों की
अंगुलियों से हरी
पत्तेदार चाय की
पंखुड़ियों को
होले – होले से
छुकर निकल
जाती है सभी
एक लम्बी कतार में
4. शीर्षक – सांझ ढ़ल रही है
सांझ ढ़ल रही है
संग अपने ले
जा रही है
धूल से सनी
बयारों को,
परिंदों की लम्बी
कतारों को,
खिलती हुई
मुरमुरी किरणों को,
मोटी-मोटी वाहनों
के शोरगुल को,
कारखानों से
उड़ती काली
धुंआ से भरे
गुब्बारों को
छोड़े जा रही है
उंजली स्वच्छ
ज्योत्सना को,
अम्बर में टिमटिमाते
सितारों को,
ऑंगन में चमचमाते
जुगनूओ को,
हरे-भरे पल्लवों पे
बिखरे शबनम के
म्हीन मोतियों के
टुकड़ो को,
दिनभर के काम
में व्यस्त लोगों
की थकी ऑंखों में
मीठी सी नींद को
5. शीर्षक – पुरानी हवेलियां
पुरानी हवेलियों की
मोटी- मोटी दिवारो
से चिपके रहते है
काले चिमगादड़
उल्टे पांव
जर्जर मुंडेर पिघलने
लगी है जल की
टुकड़ियों में बिगकर
देखकर लगता है कि
गिर न जाए
सर के बल
काया के ऊपर
खंडहर भीत्तो में
मोटे-मोटे सुराग
पड़े हुए है
चलचित्र दिखाई
पड़ता है सम्पूर्ण
बाहर की दुनिया का
– निहाल सिंह
झुंझुनूं, राजस्थान
ये रचनाएं मौलिक एवं स्वरचित है।
परिचय –
नाम- निहाल सिंह
जनपद – झुंझुनूं
राज्य – राजस्थान
आपको अच्छी लगे तो
इनको एक साथ
प्रकाशित कर दीजिए आदरणीय
आपका बड़ा उपकार होगा हम पर