सत्य का मुंह विज्ञापनों से भरा है, फिर भी बंद नहीं किया जा सकता!
शंभूनाथ
सत्य का मुंह विज्ञापनों से भरा है, फिर भी बंद नहीं किया जा सकता! कोलकाता से 30 मई 1826 को प्रकाशित प्रथम हिंदी समाचार पत्र ‘उदंत मार्त्तण्ड’ का यह द्वि-शताब्दी वर्ष है। निश्चय ही देश की संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता के लिए यह एक गौरवमय अवसर है जब हम थोड़ा आत्मनिरीक्षण भी कर सकते हैं। 19वीं सदी में कलकत्ता अंग्रेजों की राजधानी होने के कारण हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा केेंद्र था।
‘उदंत मार्त्तण्ड’ का अर्थ है समाचार का सूर्य, जो वर्तमान युग में ग्रहण का शिकार है। मार्शल मैक्लुहान ने कहा था, ‘माध्यम ही संदेश है’। यह बदल कर हो गया है, ‘शक्ति ही संदेश है’। आज ‘माध्यम’ शक्तिशाली व्यक्तियों के कब्जे में है, उसकी स्वायत्तता का अंत हो चुका है। नियंत्रण प्रत्यक्ष से अधिक अप्रत्यक्ष है।
हर पाठक और दर्शक को सही खबर पाने का मानवीय अधिकार है, जबकि आज का मीडिया पाठक और दर्शक के मानस को भ्रांतियों से भरता है और उसका बौद्धिक सतहीकरण करता है। यह एजेंडा-आधारित खबरों का प्रसारण करके होता है, सूचनाओं को रोक करके भी। इन दिनों एंबुलेंस से ही आदमी कुचला जा रहा है। फायर ब्रिगेड की गाड़ियां ही आग लगा रही हैं। इसका अर्थ है, सूचना समाज का निर्माण करते-करते हमारी यात्रा ‘अज्ञानता से भरा समाज’ बनाने की दिशा में है।
ऐसे समाज के लोगों में तकनीकी प्रवीणता बढ़ती है, पर संदेह और तर्क करने की क्षमता का ह्रास होने लगता है। इसका असर लोगों के लोकतांत्रिक मिजाज पर पड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि लोकतंत्र और तर्क परस्परनिर्भर हैं। इन दिनों शिक्षित मध्यवर्गीय लोग ही निर्बुद्धिपरक सूचनाओं तथा ‘डिसइन्फार्मेशन’ के प्रमुख निर्माता हैं। वर्तमान युग में लोकप्रिय टीवी चैनलों के अलावा नि:शुल्क रील्स, वीडियो, यू ट्यूब, पॉडकास्ट, वेबकास्ट, पॉप म्युजिक, एनिमेशन, गेमिंग आदि कई स्ट्रीमिंग सेवाएं उपलब्ध हैं जो पाठक-दर्शक की रुचियों को इस तरह मोड़ देती हैं कि सचाई की भूख ही मिट जाए।
इधर विज्ञापनदाता कंपनियां समाचार पत्रों तथा टीवी से खिसक कर मोबाइल पर मौजूद नए मीडिया की तरफ मुड़ी हैं। हमारे देश में टीवी की आय को पछाड़कर 2024 में डिजिटल मीडिया ने 80,200 करोड़ रुपयों की आमदनी की, जो चौंकाने वाली है। पत्रकारों से एक अधिक ऊंची श्रेणी बन गई कमाऊ ‘मीडियाकारों’ की। अज्ञानता निर्माण की हजारों लैपटॉप फैक्टरियां खुल गईं।
अब करोड़ों लोग हाथ में अखबार रखने से कई गुना अधिक समय, बल्कि रात-दिन डिजिटल मीडिया पर बिताते हैं। इससे सूचनांधता बढ़ रही है। परंपरागत मीडिया से नए मीडिया की तरफ मुड़ना ज्ञान से प्रस्थान करके मनोरंजन की तरफ बढ़ना है। इन दिनों प्रतिवाद भी मनोरंजन की शक्ल ले रहा है।
एक अन्य गंभीर समस्या है, बच्चे हाथ से मोबाइल छोड़ना नहीं चाहते। परिवार में चार जन चार कोने में मोबाइल लेकर बैठे रहते हैं। इस परिघटना का एक नतीजा यह है कि समाचार पत्र और न्यूज चैनल उत्तेजक होकर भी व्यावसायिक प्रतियोगिता से बाहर होते जा रहे हैं। वे अस्तित्वगत संघर्ष से गुजरते हुए सत्ताधारी राजनेताओं के लाउडस्पीकर बनते जा रहे हैं। वे सचाई के आराधक नहीं हैं, जनहित के प्रति जिम्मेदार भी नहीं हैं।
समग्रत: ‘सूचना समाज’ गहरे संकट में है, अंधकार में है और एक मायावी जाल में फँसता जा रहा है। समस्त क्रांतियों के सूचना क्रांति में सीमित हो जाने के बाद यही हाल है।