March 6, 2026

हिंदी लोक साहित्य और परंपरा

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छत्तीसगढ़ के अद्भुत शब्दवेत्ता मुकुंद कौशल की जयंती 7 नवंबर पर विशेष

“अनोखा अपनापन”

बहुत बरस बीते हमारी उस पहली मुलाकात को ,जब दुर्ग रेलवे स्टेशन से इंदिरा मार्केट केवल अठन्नी में टांगे में आया जा सकता था। नायब तहसीलदार होकर मैं दुर्ग आया था और अनेक गली मोहल्लों को अपनी किराएदारी से नवाजता हुआ गंजपारा के एक मकान में मुकीम था । यहीं मेरा परिचय शांतिलाल मेहता से हुआ । अब आप पूछेंगे भाई यह शांतिलाल कौन ? वही शांतिलाल मेहता जिन्होंने मुकुंद कौशल से मेरा परिचय कराया।
मार्केटिंग फेडरेशन में कार्यरत शांतिलाल मेहता से दोस्ती के चलते तत्कालीन मनोरंजन स्थल मीना बाजार में अक्सर हम अपनी शामें गुजारा करते थे । मल्टीपरपज स्कूल के पीछे वाले मैदान में लगे इसी मीना बाजार में एक दिन मेहता जी ने मेरी मुलाकात मुकुंद भाई से कराई। मुकुंद भाई अकेले नहीं थे साथ में उनकी पत्नी भी थी। छापेदार बुशशर्ट, बड़े बॉटम की पेंट ,गले में सोने की चेन और उंगलियों के बीच विदेशी किंग साइज सिगरेट , बप्पी लहरी टाइप के इस अलमस्त व्यक्ति के साथ करीने से सजी संवरी उनकी पत्नी का प्रभाव दुर्ग जैसे शहर में भी मुझे मुंबई का आभास करा गया । पहली मुलाकात में मालूम हुआ कि मुकुंद भाई में बहुत सी बेसिक चीजों का मेल है अत: उन्हें जानने की तमन्ना बढ़ती गई।
बिल्कुल कस्तूरबा जैसी बा के बेटे मुकुंद भाई का आधार ही इस बात से शुरू होता है कि वह एक ऐसी करुणामई मां के बेटे हैं जिन्होंने अपने पति के साथ जीवन का एक लंबा समय महात्मा गांधी के सानिध्य में बिताया था। मेरा सौभाग्य रहा कि भाई मुकुंद के कारण मां के नजदीक हो सका और बापू के संबंध में अपनी स्वभाव उचित जिज्ञासाओं को पूछ सका । बा की आंखें हंसती थीं। बा के सामने पड़ने पर उनमें सचमुच एक वात्सल्यमई आद्रता आ जाती थी और उन आंखों के मुस्कुराने का बोध होता था। बोलने में और खिलाने पिलाने में बा इतनी उदार थीं कि मुकुंद और हम लोगों के बीच में वह कोई सीमा रेखा नहीं रखती थी ।
उन दोनों हीरा भाभी में भी एक गर्वोक्त संतुष्टि पूर्ण लालित्य बसता था । उन्होंने अपने समिति सेवक के पद पर सहकारी बैंक में कार्य कर रहे पति को न केवल सतह से ऊपर उठते देखा था बल्कि वह उनके संघर्ष की सहभागिनी भी बनी थी । मैंने बिरली ही औरतों को पति की साहित्यिक अभिरुचि में इतना साथ देते देखा है और कवि की पत्नी को इतना आश्वस्त । संभवत: यही वह विश्वास था जिसने मुकुंद को अपने शब्द क्षेत्र में स्थापित होकर मुकुंद कौशल होने देने का प्रमुख कार्य किया ।
सतह से ऊपर उठने के प्रयास में मुकुंद भाई विदेश भी गए। कुछ साल रहे भी । किंतु भारत की धरती से उनका जुड़ाव कम ना हो सका । वे श्वदेश लौट आए । दो पुत्रों दिशांत एवं अक्षत के जन्म के बाद में निरंतर प्रगति के सोपान गढ़ते रहे और साहित्य की सीढ़ियां चढ़ते रहे । जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने म्यूजिको नाम से एक ऑडियो कैसे रिकॉर्डिंग का व्यवसाय भी आरंभ किया और सन 1982 में छत्तीसगढ़ी की पहली ऑडियो कैसेट “केदार यादव के गीत” का निर्माण किया । कालांतर में उन्हें जवाहर चौक स्थित वह किराए की दुकान छोड़नी पड़ी । उन्होंने पदमनाभपुर स्थित अपने घर में ही दुकान डाल दी, किंतु अधिक दिनों तक यह भी न चल सकी मुकुंद भाई के पास नए पुराने गीतों का नायाब खजाना था । मुझे याद है जब मनु नायक जी स्वयं कहि देबे संदेश के गानों की री -रिकॉर्डिंग के लिए उनके पास आया करते थे । उन दिनों कुर्सी पर कब्जा जमा कर मैं और सामने स्टूल पर भाई महावीर अग्रवाल बैठा करते थे ।
पता नहीं क्या था कि मैंने मुकुंद भाई की दुकान को कभी पराया नहीं समझा । मन में यह कभी नहीं आया कि मैं बैठा हूं और वह खड़े हैं। शायद यह अपनापन भी उन्हीं का दिया हुआ था । महावीर उन दिनों “सापेक्ष” के प्रारंभिक अंक निकाला करते थे । मेरी साहित्यिक रुचि के फेर में पड़कर मुकुंद भाई ने मुझे प्रगतिशील लेखक संघ का उपाध्यक्ष बना दिया था । मुकुंद भाई को मुझमें उस समय अनंत संभावनाएं नजर आती थीं । मेरा आरंभिक गद्य स्वर्गीय नारायण लाल परमार जी ने तथा पद्य भाई मुकुंद कौशल ने जांच कर मेरी स्लेट पर सही का चिन्ह लगाया था , किंतु जीवन की आपाधापी में वह सब स्लेट पर ही रह गया । छत्तीसगढ़ी गीतों में मुकुंद भाई का माटी प्रेम स्पष्ट झलकता है मैंने उन्हें निरंतर संघर्षशील देखा है किंतु कभी हारते या परेशान होते नहीं देखा ,जबकि अन्य व्यक्तियों की तरह उन पर भी अनेक हादसे गुजरे हैं । अनेक स्थापित व्यक्तियों को मैंने साहित्य व संगीत का शौक फर्माते देखा है। किंतु मुकुंद भाई को साहित्य ,संगीत में जीते हुए बल्कि स्थापित होते हुए देखा है। यह मुकुंद का कौशल ही है जो उसे वहां तक ले गया जहां वे पहुंच पाए।
(मेरा यह आलेख उन पर केंद्रित संकलन महत्व मुकुंद कौशल से)
दुर्भाग्य की बात कि कोरोना काल में मुकुंद भाई और उनके छोटे बेटे कॉल की भेंट चढ़ गए। यद्यपि राज्य शासन ने अंत में उन्हें सम्मानित किया था किंतु मैं अभी भी बड़े दुख के साथ कह सकता हूं कि मुकुंद भाई को जो सम्मान मिलना था , जो स्थान मिलना था जिसके वे प्रबल हकदार थे, वह उन्हें नहीं मिल पाया । आज भी मुकुंद भाई के गाए गीत हजारों रिकॉर्डों में बसते हैं और मुकुंद भाई अपने फ़िल्मी गीतों के लिए छत्तीसगढ़ी की सेवा के लिए तथा छत्तीसगढ़ में लिखे गए अपने साहित्य के लिए सदा छत्तीसगढ़ के हृदय में जीते रहेंगे। मेरा सरकार और संगीत व साहित्य प्रेमियों से अनुरोध है कि मुकुंद भाई के मरने के बाद ही सही किंतु उन्हें राज्य के एक महाकवि , मूर्धन्य साहित्यकार और छत्तीसगढ़ी भाषा के एक अनन्य सेवक का दर्जा दिया जाए । हीरा भाभी उनके जाने के बाद और एक पुत्र के गुजर जाने के बाद अकेली है उन्हें भी सरकार द्वारा सम्मान और हो सके तो आवश्यक आर्थिक मदद भी करनी चाहिए ।
डॉ० किशोर अग्रवाल , रिटायर्ड डीआईजी पुलिस , रायपुर छत्तीसगढ

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