धूमिल का दिन: एक विद्रोह का जन्म
जयप्रकाश मानस
आज का दिन सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, हिंदी साहित्य में एक ऐसे कवि के आगमन का दिन है जिसने शब्दों को हथियार बनाया। 09 नवंबर, 1936 को वाराणसी के पास एक गाँव में जन्मे सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ ने कविता की दुनिया में एक भूकंप ला दिया।
वे साठोत्तरी कविता के वह सशक्त स्वर थे, जिन्होंने यथास्थिति के मोहभंग को सबसे बेबाक और तीखे अंदाज़ में व्यक्त किया। उनकी कविता परंपरा के खोखले आदर्शवाद, ‘सभ्य’ समाज की पोल और ‘शालीनता’ के ढोंग के खिलाफ एक साहसिक विद्रोह है।
उनकी कविता केवल शब्द नहीं, एक सामाजिक यथार्थ का क्रूर दस्तावेज़ है। इसे पढ़िए और महसूस कीजिए धूमिल की वह क्रोध और पीड़ा, जो आज भी प्रासंगिक है:
वह स्त्री
एक संपूर्ण स्त्री होने के पहले ही
गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुए
उसने जाना
कि प्यार
घनी आबादी वाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिश में भीगते हुए
उसने जाना
कि हर लड़की
तीसरे गर्भपात के बाद
धर्मशाला हो जाती है
और कविता
हर तीसरे पाठ के बाद।