March 6, 2026

“दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी-गोंदा की कथावस्तु”

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दाऊ रामचंद्र देशमुख कृत चंदैनी गोंदा का प्रथम प्रदर्शन 07 नवम्बर 1971 को हुआ था। चंदैनी गोंदा की आज 55 वीं वर्षगाँठ है। छत्तीसगढ़ के कला-प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ –

उद्घोषक – मूल कार्यक्रम प्रारंभ करने के पहले हम यह बतला देना आवश्यक समझते हैं कि चंदैनी गोंदा कोई नाटक गम्मत या तमाशा नहीं है। चंदैनी गोंदा एक दर्शन है, एक विचार है जो कि एक औसत भारतीय किसान के इर्द-गिर्द घूमता है। यह हमारी मान्यता है कि छत्तीसगढ़ का कोई भी औसत किसान अपने सारे परिवेश में भारत के किसी भी शोषित, पीड़ित और उपेक्षित क्षेत्र का किसान हो सकता है। इस दृष्टिकोण से चंदैनी गोंदा प्रतीकात्मक ढंग से एक भारतीय किसान के जीवन के चित्रण का प्रयास है।

कृषक जीवन को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करने के लिए हमने प्रधानतः छत्तीसगढ़ी लोक गीतों और कवियों की रचनाओं का आश्रय लिया है जो धरती और धरतीपुत्र से संबंधित हैं। इन गीतों को किसी कथानक के सूत्र में न गूँथते हुए हमने इसे ऐसी क्रमबद्धता प्रदान कर दी है कि यही क्रमबद्धता आपको कथानक का आनंद देने लगती है। साथ ही छत्तीसगढ़ की अंतर-वेदना को भी साकार करती है और अंत में एक व्यथा, कथा का रूप ले लेती है । गीतों को प्रतिभाशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हमने दृश्यों, प्रतीकों, संवादों आदि का आश्रय अवश्य लिया है किंतु हमारा पुनः अनुरोध है कि इसके कारण आप चंदैनी गोंदा को नाटक की दृष्टि से न देखें। हम अभिनय की उच्चता का कोई दावा नहीं करते। नाटकीयता से दूर रहने के कारण हम रूप-सज्जा, वस्त्र परिवर्तन, मंच व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान नहीं देते। इसका कारण है कि हमें स्वाभाविक और प्रतीकात्मक रूप से एक औसत किसान को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करना है।

आपके मन में सहज ही एक जिज्ञासा उठती होगी कि इस कार्यक्रम का नाम चंदैनी गोंदा क्यों रखा गया है? दरअसल गेंदे दो प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार बड़े गेंदे का होता है जो प्रधानतः श्रृंगार के काम आता है। गेंदे का दूसरा प्रकार छत्तीसगढ़ में चंदैनी गोंदा कहा जाता है जो आकार में छोटा होने के कारण ग्रामीण युवतियों के जुड़े की शोभा तो नहीं बन सकता किंतु देवी देवताओं के चरणों में चढ़ने का श्रेय उसे अवश्य प्राप्त है।

छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक अज्ञात कलाकार भी पड़े हैं जो चंदैनी गोंदा की तरह आकार में छोटे तो अवश्य हैं किंतु उनमें प्रतिभा है, लगन है, कला की ऊंचाई है। इनकी कला से वास्तव में सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए किंतु ऐसा हो नहीं पाता। हमने भागीरथ प्रयास करके छत्तीसगढ़ की माटी से कुछ कलाकार रूपी चंदैनी गोंदा चुनकर एक सूत्र में पिरोया है। इस सूत्रबद्ध पुष्पमाला को हम चंदैनी गोंदा के नाम से संबोधित करते हैं और यही कारण है कि परिवार द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को “चंदैनी गोंदा” की संज्ञा दी है। इस तरह चंदैनी गोंदा, गीतों की माला है और छोटे-छोटे कलाकारों की माल्य है।

लोग रत्नों की खोज में छत्तीसगढ़ आते हैं और प्राप्त कर लेने पर भोपाल, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, आगरा के बाजारों में भुना लेते हैं। श्री रामचंद्र देशमुख ने कुछ रत्न पाए हैं। परखने के लिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

फूल खिलते हैं, मुरझाते हैं और धूल में मिल जाते हैं किंतु 7 नवंबर 1971 को जिस चंदैनी गोंदा के पौधे को दुर्ग के निकटस्थ ग्राम बघेरा में रोपा गया है उसे न मुरझाने देने का संकल्प छत्तीसगढ़ की जनता ने कर लिया है। इस लंबी भूमिका के बाद अपने परिवार की इष्ट देवी सरस्वती की वंदना, भारत माता को समर्पण और दर्शकों के अभिनंदन के साथ अपना कार्यक्रम प्रारंभ करते हैं

सुमन का प्रवेश:

कमेंट्री: मन की बात जानने वाला केवल मन है
सबसे अच्छा फूल की जिसका नाम सुमन है

दुखित का प्रवेश:

कमेंट्री: हँसमुख प्रसून सिखलाते पल भर जो हँस पाओ
अपने उर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ

गीत: देखव फूलगे –
चंदैनी गोंदा फूलगे

कमेंट्री: गांव में फूल घलो गोठियाथे, जब सब किसान सो जाथे। आज भारत-वासियों की आत्मा स्वतंत्रता के पवित्र पर्व में प्रकाशित है परंतु 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में दिन में भी अंधियारी रात थी। 1857 में स्वतंत्रता आंदोलन की जो ज्योति हमारे पूर्वजों ने प्रज्वलित की वह 1942 में विकराल रूप धारण कर ब्रिटिश शासन को जलाने पर तुल गई थी। भारत का आकाश करो या मरो, अंग्रेजों भारत छोड़ो, इंकलाब जिंदाबाद, महात्मा गांधी की जय, तिरंगे झंडे की जय से गूंज उठा था। वंदे मातरम की एक आवाज पर गोलियों की बौछारों को रोकने के लिए हजारों सीने अड़ जाते थे।

गीत: वंदे मातरम

कमेंट्री: फिर आया 15 अगस्त 1947, अंधियारा छटा। स्वतंत्रता का सूरज उदित हुआ। पूर्वजों का बलिदान सार्थक हुआ। तिरंगा भारत के स्वतंत्र आकाश में लहराने लगा। झूम गया सारा भारत, झूम गया सारा गाँव।

गीत: आगे सुराज के दिन रे संगी

कमेंट्री: नवजात स्वतंत्रता के साथ जिन बच्चों ने जन्म लिया था वह एक अर्थ में बहुत भाग्यशाली थे। उनके माथे पर गुलामी का कलंक नहीं था। इन्हीं के हाथों में आगे चलकर भारत की बागडोर सौंपी जानी थी इसलिए माताओं ने उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।
गीत : सोहर गीत
देवार गीत

कमेंट्री: नवजात शिशु की उम्र थोड़ी बढ़ी, साथ ही नई पीढ़ी की उम्र भी। उसी समय दंगों की आग से भारत माता का आँचल जल रहा था। रो पड़ी आजादी, रो पड़ा नई पीढ़ी का बचपन, उसकी आँच सहन न कर सकने के कारण। माताओं को उनका रोना सहन नहीं हुआ। लोरियां फूट पड़ी कंठ से।

गीत: लागे झन काकरो नजर

कमेंट्री: आजाद भारत में जन्मी नई पीढ़ी ने अभी होश भी नहीं संभाला था। उसके दूध के दाँत टूटे भी नहीं थे कि आई 30 जनवरी 1948 की काली संध्या। कहीं से तीन गोलियां आई और धँस गई बापू के कलेजे में। मानवता कराह उठी। भारत मां की आंखों से बहुत गंगा जमुना की धाराएं।

गीत: ओ पापी ओ बइरी

कमेंट्री: गांधी जी की मौत के साथ गांधी के सपनों के भारत की भी हत्या हो गई। दिन पर दिन बीते गए। आजाद पूरी जवान हो चली उसकी जवानी गांव में बसने वाले भारत की ओर नहीं, शहर में बसने वाले भारत की ओर आकर्षित हो गई। काश कि तुलसी के अनगढ़ बिरवे उसे गांव की ओर आकर्षित कर पाते। काश, बहन की राखी उसे गांव में रोक पाती ।

गीत: चल शहर जातेन

कमेंट्री: आजादी के बाद योजना, परियोजना बनती गई मगर गांधी के सपनों का रामराज्य नहीं आया। गाँवों में जाने वाला भारत, अन्न के लिए दूसरे के सामने झोली फैलाता रहा क्योंकि औसत भारतीय किसान दुखित रहा।

दुखित का प्रवेश –

कमेंट्री: लोग यह क्यों नहीं सोचते कि भारत हमारी माता है, यदि भारत का कोई भी भाग शोषण से कमजोर होता है तो भारत माँ का ही कोई अंग तो कमजोर होता है।

हाँ, यही तो है हमारा छत्तीसगढ़, भारत माँ के पेट के पास। इसका शोषण भारत माँ के उदर का शोषण है।

हर आँख यूं तो बहुत रोती है
हर बूँद मगर अश्क नहीं होती है
पर देखकर जो रो दे जमाने का गम
उस आँख से आँसू जो गिरे मोती है।

दुखित इन मोती के दानों को यूं ना बह जाने दो, सहेजो इन्हें, निराश होकर बैठो मत। उठो अपनी शक्ति को पहचानो। यदि तुम्हारे भोलेपन के बदले तुम्हें तिरस्कार पूर्ण संबोधन मिलता है तो तुम भयानक विषधर भी बन सकते हो मगर शायद तुम विषधर बनना पसंद नहीं करोगे

गीत: मैं छत्तीसगढ़िया अँव
मोर संग चलो रे

कमेंट्री: भारत भर में आपको छत्तीसगढ़ के इस दुखित की तरह अनेक दुखित मिलेंगे जिन्हें किसी भी प्रकार का शोषण उत्पीड़न और तिरस्कार कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकता। माटी के प्रति उसके आकर्षण को कम नहीं कर सकता। जेठ की दुपहरी में जब गाँव में मरघट जैसा सन्नाटा छाया रहता है, तब भी किसान की कर्तव्य पथ की यात्रा निर्बाध गति से चलती रहती है।

गीत: रेंगव रेंगव रे रेंगइया

कमेंट्री: जेठ के बाद आषाढ़ में जैसे ही काले काले मेघा मंडराते हैं, किसान का मन मयूर नाच उठता है। वर्षा की बूँदों से जब धरती गूंजती है तो किसान का तन मन धन सब खुशी से भींज उठता है। धरती से उठती माटी की सोंधी गंध उसे खेतों की ओर आकर्षित करती है। होठों पर गीत थिरक उठते हैं और किसान कंधे पर हर रखे चल पड़ता है खेतों की ओर, जो उसका कर्म क्षेत्र है

गीत: चल चल गा किसान बोए चली धान

कमेंट्री: किसी समर्थ पुरुष ने यह तो माना कि धान के क्षेत्र में हरित क्रांति आना बाकी है। तो वह कौन सी फाइल में दबी पड़ी है ? लो वह स्वयं आ रही है अपनी व्यथा कहते –

हरित क्रांति बाई का एक-पात्रीय अभिनय:

कमेंट्री: प्यासी धरती जब सावन में पूरी तरह तृप्त हो जाती है तब हरे भरे खेत किसान के कठोर श्रम की मांग करते हैं। किसान की जिंदगी एक अंतहीन श्रम की कथा है। श्रम की कठोरता में घिरा हुआ किसान का मन उल्लास और नवीन स्फूर्ति पाने के लिए लोकगीतों के लालित्य की ओर मुड़ पड़ता है। श्रम की घुमड़ती हुई घटनाओं के बीच जब ददरिया की तान छिड़ती है तब चारों ओर संगीत झरने लगता है और किसान का थका मन श्रृंगार-पूरित हो उठता है।

गीत: मोर खेती खार रुमझुम

कमेंट्री: सावन के बाद आता है भादो। भादो का महीना छत्तीसगढ़ में औरतों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। तीज त्यौहार के कारण किसान की पत्नियों के मन में मायके जाने की ललक, पति से नई साड़ी लाने का अनुरोध और पति पत्नी की नोक झोंक से सिक्त भादो।

गीत: मोला मइके देखे के साध, धनी मोर बर लुगरा ले दे

कमेंट्री: कभी-कभी ऐसा होता है कि तीज में मायके जाने की किसानिन की साध मन में ही रह जाती है। उसे कोई लिवाने नहीं आता। मायके से केवल साड़ी भेज दी जाती है। वह साड़ी उसके अतीत के पृष्ठों को एक-एक करके सामने रखने लगती है।

गीत: दाई के दया दादा के मया

कमेंट्री: भादो में ही आता है गणेश पक्ष। गांव में गणेश की प्रतिमा जहां स्थापित हो जाती है वहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ जाती है इसी बाढ़ में प्रायः चंदैनी नाच भी देखने को मिलता है। सतनामियों के नाचने की अपनी विशिष्ट शैली, अमर्यादित मस्ती और अक्खड़पन इसकी विशेषता होती है।

चंदैनी नाच:

कमेंट्री: तीज त्यौहार के बीच भादो बीतने लगता है किंतु कृषक समुदाय अपने कर्तव्य को भूलता नहीं है। निंदाई का दूसरा दौर भादो में चलता है। खड़े हो जाइए आप खेतों की मेड़ पर ददरिया की तान आपके मन को आल्हादित कर देगी।

गीत: झन आंजबे टूरी आँखी म काजर

कमेंट्री: कुंवार निंदाई के तीसरे दौर का महीना। जुआर फूलने लगता है। ह्रदय के भाव गीत बनकर बिजली की तरह कौंध जाते हैं ।

गीत: चिरई चले आबे

कमेंट्री: दीपावली अपनी समस्त प्रभाव के साथ कार्तिक में आती है।बच्चों बूढ़ों सब में एक अपूर्व उल्लास भर जाता है। लक्ष्मी पूजा की रात छत्तीसगढ़ के गांव में शिव के रूप में गौरा की पूजा होती है। घर घर से कलश एकत्रित कर गांव में किसी सार्वजनिक स्थान पर रखे जाते हैं, फिर गौरा की सेवा की जाती है। गौरा गीत से वातावरण मुखरित हो जाता है।

गीत: जोहर जोहर मोर

कमेंट्री: दिन बीतते जाते हैं, बीतते जाते हैं। अगहन आता है किसान के श्रम की पूजा स्वीकार होती है। महीनों के कठिन परिश्रम की कमाई खेतों में धान के रूप में खड़ी है। पीले पीले धान के खेत जब हवा में लहराते हैं तब किसान को ऐसा लगता है कि मानो उसे शीघ्र आने का इशारा कर रहे हैं। वह आतुर हो उठता है, उसे खलिहान में लाने के लिए

गीत: भैया का किसान हो जा तैयार
छन्नर छन्नर पैरी बाजय

कमेंट्री: जब भी मौका मिलता है गांव की अल्हड़ किशोर बालाएं बड़े बूढ़ों से मजाक और छेड़खानी करने से नहीं चूकती।

गीत: हर चांदी हर चांदी

कमेंट्री: फसल कट चुकी है। दुखित और मरही भारा लिए खेतों की ओर से आ रहे हैं। दुखित जलोदर का मरीज है और मरही दमा की मरीज है किंतु भरपूर फसल को देखकर दोनों अपनी पीड़ा भूल चुके हैं।

गीत: तोला देखे रहेंव गा

कमेंट्री: दुखित की फसल खलिहान में पहुंच चुकी है।धान की मिंजाई होने वाली है। दुखित अपनी संतान-हीनता के दुख को गांव के बच्चों को देखकर भूल जाता है। गांव के बच्चे भी छुट्टी का घंटा बजते ही उसके खलिहान की ओर दौड़ पड़ते हैं।

गीत: चंदा बनके जीबो हम

कमेंट्री: यह कैसा अनर्थ है, किसने इन मासूम बच्चों के मन में सांप्रदायिक घृणा का विष बो दिया है। इस भावना को लेकर यदि बच्चे जवान होंगे तो देश का भविष्य क्या होगा?

गीत: धरती के अंगना मा

कमेंट्री: दौरी में जुते सात लड़के सात दिनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो दुखित के जीवन के यथार्थ से संबंधित है। सात लड़कियां इंद्रधनुष के सात रंगों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो मरही के जीवन का स्वप्न है। मेड़वार कानून और गर्दन में फंसी रस्सी नियति का प्रतीक है। किसान का यथार्थ और किसानिन का स्वप्न वर्ष भर इस कानून के डंडे के चारों ओर घूमता रहता है।

गीत: आज दौरी मा बइला मन घूमत हें

जुच्छ गरजे मां बने नहीं

कमेंट्री: छत्तीसगढ़ में यह मान्यता है कि जब तक औरत के शरीर में गोदने का निशान नहीं होता तब तक उसे मुक्ति नहीं मिलती। भागवती एक संतान-हीन विधवा औरत है, जिसे दुखित ने चाँद-बी को सौंप दिया है। वह चाँद-बी को गोदना गुदवाना चाहती है।

गीत: तोला का गोदना ला गोदँव

कमेंट्री: इधर शिव की पत्नी विरह वेदना से पीड़ित है कर्तव्य बोध तो उसे है किंतु पति से दूर रहने का दुख भी तो उसे है। बगैर शिव के उसे गांव, घर, खलिहान सब सूने लगते हैं।

गीत: मोर कोरिया सुन्ना रे

कमेंट्री: उधर शिव मोर्चे पर घायल हो जाने के कारण शिविर में भेज दिया जाता है।वहां उसे पत्नी का पत्र प्राप्त होता है और अक्षर, पत्नी की छवि में परिणित होते जाते हैं।

गीत: वा रे मोर पड़की मैना

कमेंट्री: फागुन का महीना, नगाड़े की आवाज और उल्लास का महीना। खरीफ की फसल तो मिली पर रबी की नहीं मिल पाई
।गांव के अधिकांश लोग रोजी रोटी की चिंता से, दूर चले गए मगर दुखित ने गांव नहीं छोड़ने का निश्चय किया।

गीत: नरवा के तीर मोर गांव

कमेंट्री: दूसरे साल और भी भयानक अकाल पड़ गया। धरती की छाती फट गई। प्यासी धरती की पीड़ा उसके हृदय की पीड़ा बन गई। आज पौष-पूर्णिमा है। दान दक्षिणा का पुण्य-पर्व।

गीत:

कमेंट्री: दुखित की बची शक्ति नष्ट हो जाती है। दुखित जेब से डिब्बा निकालता है। मिट्टी खाता है। मिट्टी का चंदन लगाता है। ईमान की तिजोरी भर चुकी थी। काँटों से डिब्बा भर चुका था। अब कोई जगह शेष नहीं थी। काँटों से मुक्ति का अवसर था। उसने मिट्टी का महाप्रसाद खाया। आँसुओं का गंगाजल पिया। मस्तक पर मिट्टी का चंदन खुद अपने हाथों लगा लिया। सन्यास की अवस्था में उसे बच्चे रूपी चंदैनी गोंदा दिखाई देते हैं। वर्षा का आह्वान करते हुए।

गीत: घानी मुनी घोर दे

कमेंट्री:; बटोरन लाल की बद्दुआ सच हो रही है। अंतिम समय, दुखित के पास ना मरही है , न शिव, न गंगा, न भागवती और न चांद-बी। केवल उसका मन उस पर न्योछावर है। सुमन, सुंदर मन।

कमेंट्री: अरे ! यह कौन आ रहा है दुखित की लाश के पास ? गिद्ध की नाईं बटोरन लाल। बटोरन लाल ! अकाल की काली छाया ने तुम्हें भी नहीं बख्शा? अब क्या लेने आए हो यहां? सब कुछ खत्म हो गया। दुखित के तन को बटोरन लाल ने अपने सीने से लगा लिया। काश! बटोरन लाल का यह भाव सर्वव्यापक हो पाता। वह गिद्ध की नाईं आया और राजहंस की भांति जा रहा है। दुखित की पीड़ा व्यर्थ नहीं गई। उसने बटोरन लाल का हृदय परिवर्तन कर दिया। अब बटोरन लाल को दूसरा नाम देना होगा। कौन कहता है कि दुखित मर गया है? मरता वह है जो जिंदगी के टूटे, थके हारे या जो पराए दर्द के काँटे न बुहारे । दुखित मानवता है । प्रदीप्त है। अटूट है। अतीत है। बेशक तुमने देखा है उसको, उसकी जिंदगी को हिम्मत और मस्ती को, तुम अवाक रह गए हो कि वह असाधारण रूप से साधारण है। एक औसत भारतीय किसान का उदाहरण है। आओ तुम्हें आमंत्रित करता हूँ, दुखित जैसा बनो, कुछ माटी में सनो, फिर चाहो तो कह देना कि दुखित मर गया। किंतु मुझे अमरत्व पर विश्वास है क्योंकि उसका अहिंसक बलिदान बटोरन लाल को अपना सुमन सौंपने का संदेश देकर गया है। कौन कहता है दुखित मर गया ? मानवता की मिसाल लिए माटी का बेटा सदा के लिए सो चुका है। उसकी चिता की अग्नि मशाल बन गई ऐसा लगता है।

छत्तीसगढ़ महतारी इस वियोग की बेला में फफक-फफक कर रो पड़ी है। अपनी निराशा बेबसी और एकाकीपन के बीच वह अपने सोए हुए बेटों की ओर ताकते हुए इधर ही आ रही है। उनकी तंद्रा भंग करने।

जीवन की लहर-लहर से हँस खेल खेल रे नाविक
जीवन के अंतस्थल में नित बूड़-बूड़ रे नाविक
हँसमुख प्रसून इकलौते, पल भर है जो हाथ पाओ
अपने डर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ।

उपर्युक्त संपूर्ण कथानक के साथ लोक धुनों में आबद्ध छत्तीसगढ़ी के अनेक गीतों छत्तीसगढ़ के नयनाभिराम दृश्यों और ग्रामीणों तथा नागर संस्कृति के लोक-नाट्यों के मिश्रित स्वरूप में प्रस्तुत चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ में एक वैचारिक क्रांति उत्पन्न की। दाऊ रामचंद्र जी देशमुख अपने श्रम को सार्थक स्वरूप प्रदान कर पाने में पूरी तरह सफल रहे।

“चंदैनी-गोंदा के जन्म का इतिहास”

दाऊ रामचंद्र देशमुख के मन में चंदैनी-गोंदा के बीज ने कब जन्म लिया ? इस प्रश्न का उत्तर तो शायद दाऊ जी के पास भी नहीं रहा होगा। उनके उद्गारों तथा साक्षात्कार में कही गयी बातों से हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं। उन्हीं के शब्दों में : “बात स्वराज के दिनों की है – 1948 की जब मुझे पृथ्वीराज कपूर का नाटक दीवार देखने का मौका मिला। उसके पहले ही दृश्य में एक लोकनृत्य था, बड़ा सुरुचिपूर्ण। मैंने अपने यहाँ प्रचलित लोकनृत्य से उसका मिलान किया तो पाया कि अपने यहाँ नाचा में हल्कापन, फूहड़पन का पूरा पूरा बोलबाला था। और तो और उसमें उद्देश्यहीनता घर कर गयी थी। दीवार नाटक से नाचा को परिष्कृत करने, राष्ट्रीयता से जोड़ने और सार्थक बनाने की दृष्टि और दिशा मिली मुझे”। परिणामस्वरूप ‘छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल’ अस्तित्व में आया।

एक श्रावणी रात में मैले-कुचैले वस्त्रों में घर के दरवाजे पर हाथ में कटोरा और अधरों पर सिसकियाँ लिए चाँद बी नामक नन्हीं सी बच्ची में दाऊ जी को छत्तीसगढ़ के दर्शन हो गए और इस दयनीयता को मिटाने का संकल्प मन में जाग उठा।

दिनांक 22 फरवरी 1969 को छत्तीसगढ़ के स्वप्नदृष्टा और दाऊ रामचंद्र देशमुख के श्वसुर जी डॉ. खूबचन्द बघेल का अपनी मृत्यु के कुछ क्षण पूर्व लिखा उनके नाम लिखा गया पत्र “हमको हर हाल में छत्तीसगढ़ को जगाना है और आपकी नाटकीय प्रतिभा की बहुत जरूरत है”। डॉक्टर साहब के ये पंक्तियां दाऊ जी को सतत झकझोरते रहीं और वे छत्तीसगढ़ में जागरण लाने के विषय में निरंतर चिन्तन करते रहे।

आकाशवाणी द्वारा लिए गए एक साक्षात्कार के दौरान चंदैनी गोंदा के लिए प्रेरणा कहाँ से मिली, प्रश्न के प्रत्युत्तर में दाऊ जी के शब्द थे – “आपको स्मरण होगा कि भारतीय स्वतंत्रता की चौबीसवीं वर्षगाँठ पर 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति महोदय ने देश के नाम अपने संदेश में कहा था कि गेहूँ के इलाकों में तो हरित क्रांति हो चुकी लेकिन धान के इलाकों में नहीं हो पायी। यह एक बहुत बड़ा सत्य है और भारत का धान उपजाने वाला हर औसत किसान इसकी पुष्टि करेगा। गेहूँ और धान के इलाकों के भूगोल पर मैं नहीं जाता। उपलब्ध सुविधाओं पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन इतना तो अवश्य है कि स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात धान के इलाकों का किसान जहाँ का तहाँ है। अभी भी उसके शोषण का चक्र जारी है। उसके अनेक अवतार हैं। चंदैनी गोंदा में यदा-कदा प्रसंगवश हरित क्रांति के उद्घोषकों के स्वार्थ, कुचक्र और अदूरदर्शिता पर व्यंग्य किया गया है। इसके पीछे एक औसत किसान की व्यथा ही कर्मशील है। तो, राष्ट्रपति के भाषण का अंश के चंदैनी गोंदा की प्रेरणा भूमि है”।

महावीर अग्रवाल को दिए गए एक साक्षात्कार में दाऊ जी ने कहा था – “1950 में हमने छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल की स्थापना की। मैंने 1951 में नरक अउ सरग, 1952 में जनम अउ मरन, 1953 में काली माटी का मंचन किया। रायपुर में श्री हबीब तनवीर ने कहा, “दाऊ जी मैं इन कलाकारों को दिल्ली ले जाना चाहता हूँ “। तब अधिकांश कलाकार ठाकुरराम, भुलवा और लालू के साथ दिल्ली चले गए और प्रसिद्ध हुए। मैं मजबूर हो गया। 1971 में कुछ कलाकार वापस आ गए तब ‘नाचा’ को राष्ट्रीय धारा से जोड़ते हुए “चंदैनी गोंदा” की प्रस्तुति तैयार की गई”।

इन समवेत कारणों का ही प्रतिफल है “चंदैनी गोंदा”। दिल्ली से कलाकारों के वापसी ने नया उत्साह भर दिया। दाऊ जी अकेले ही अपने ड्राइवर को लेकर गाँव, शहर और कस्बों में गीत, संगीत के सिद्धहस्त कलाकारों को ढूँढने निकल जाया करते थे। उन्होंने वरिष्ठ कवियों के घर जाकर गीत इकट्ठे किये। लोक कलाकारों की आवाज अपने टेपरिकार्डर में सुरक्षित की, पारंपरिक लोकगीतों को इकट्ठा किया, वादकों की खोज की और सभी को बघेरा ग्राम में बुलाकर अपने घर में उनके ठहरने, भोजन करने और रिहर्सल करने की व्यवस्था की। कलाकारों के बघेरा पहुँचने पर उनका घर में स्वागत किया जाता था। इस कार्य में दाऊ जी की धर्मपत्नी श्रीमती राधा देवी जी ने कंधे से कंधा मिला कर भरपूर सहयोग दिया। दाऊ जी ने चूँकि सिद्धहस्त कलाकारों की खोज की थी अतः अल्प समय में ही उत्कृष्ट तैयारियाँ हुईं और 07 नवम्बर 1971 को ग्राम बघेरा में चंदैनी गोंदा का प्रथम और ऐतिहासिक मंचन सफलतापूर्वक हो गया। प्रथम प्रदर्शन के लीडिंग गायक और गीतकार रविशंकर शुक्ल थे।

इस प्रदर्शन के बाद एक दिन दाऊ जी ने आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित कविसम्मेलन में मैं छत्तीसगढ़िया अंव कविता का प्रसारण सुना। कविता के शब्द और कवि की आवाज, दाऊ जी को अपने विजन के अनुरूप लगी उन्होंने आकाशवाणी में संपर्क करके पता किया कि यह कविता कौन सुना रहा था ? आकाशवाणी ने बताया कि इसके कवि लक्ष्मण मस्तुरिया हैं और वर्तमान में राजिम में रहते हैं। दाऊ जी ने मस्तुरिया जी को बघेरा आकर मिलने का संदेश दिया। मस्तुरिया जी के बघेरा आकर दाऊ जी से मिलने के बाद चंदैनी गोंदा का दूसरा प्रदर्शन 29 जनवरी 1972 को ग्राम पैरी में हुआ। पैरी का यह प्रदर्शन अत्यंत ही विराट प्रदर्शन रहा। लक्ष्मण मस्तुरिया के काफी गीत सम्मिलित हुए थे। इसके साथ ही लक्ष्मण मस्तुरिया चंदैनी गोंदा के विसर्जन तक मुख्य गायक और गीतकार बने रहे। उद्देश्य पूर्ण होने के बाद 22 फरवरी 1983 को दाऊ जी ने ग्राम पथरी (डॉ. खूबचन्द बघेल जी के गृहग्राम) में चंदैनी गोंदा का 99 वाँ मंचन करते हुए विसर्जन की घोषणा कर दी।

गाँव गाँव जाकर कलाकारों की खोज, छतीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवियों की कविताओं का संकलन, 63 कलाकारों को एक सूत्र में बाँधे रखना, लोकगीतों का संकलन, इतने कलाकारों को अपने घर में ठहराना, उनके भोजन की व्यवस्था करना कितना कठिन काम रहा होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। दाऊ जी ने तमाम परेशानियों के बावजूद धैर्य के साथअपने मिशन को पूरा करने में सफलता प्राप्त की।

“छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा” स्मारिका का एक अंश

चंदैनी गोंदा की स्मारिका के मुख-पृष्ठ की हालत जर्जर हो गई है। स्मृतियां भी धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं। ऐसे में नई पीढ़ी तक चंदैनी गोंदा की जानकारी को स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया है। आज की श्रृंखला में डॉ हनुमंत नायडू (हिन्दी के प्रोफेसर और प्रथम छत्तीसगढ़ी फ़िल्म “कहि देबे संदेश” के गीतकार) के आलेख के कुछ अंश प्रस्तुत हैं, जिन्हें पढ़कर नई पीढ़ी को कुछ और नई जानकारियां मिलेंगी। श्रृंखला-1 में कुछ पात्रों के नाम का उल्लेख किया गया था। उन पात्रों की भूमिका, इस आलेख को पढ़ने के बाद कुछ और अधिक स्पष्ट होगी। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि चंदैनी गोंदा के पात्र, महज पात्र नहीं बल्कि प्रतीक हैं। तो लीजिए! डॉ. हनुमंत नायडू के आलेख – “छत्तीसगढ़ी लोक मंच-एक नया सांस्कृतिक संदर्भ”, “छत्तीसगढ़ी आंसुओं का विद्रोह-चंदैनी गोंदा”, इस शीर्षक से स्मारिका में प्रकाशित आलेख के कुछ अंश –

“चंदैनी गोंदा”

चंदैनी गोंदा यथार्थ में एक विशेष प्रकार के नन्हे नन्हे गेंदे के फूलों का नाम है जो छत्तीसगढ़ में बहुतायत पाए जाते हैं। चंदैनी गोंदा भी धरती की पूजा का फूल है। श्री देशमुख के ही शब्दों में चंदैनी गोंदा पूजा का फूल है। चंदैनी गोंदा छोटे-छोटे कलाकारों का संगम है। चंदैनी गोंदा, लोकगीतों पर एक नया प्रयोग है। दृश्यों, प्रतीकों और संवादों द्वारा गीतों को गद्द देकर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से एक संदेश पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण — यही चंदैनी गोंदा है। जिन्होंने इसे नाटक, नौटंकी या नाचासमझकर देखा होगा वह अवश्य ही निराश हुए होंगे लेकिन जिन्होंने इसे लोकगीतों पर एक नए प्रयोग के रूप में देखा होगा वह अवश्य ही हर्षित हुए होंगे।

गेहूं के क्षेत्रों में तो हरित क्रांति हो चुकी है परंतु धान के क्षेत्रों में नहीं हो पाई। यही तथ्य चंदैनी गोंदा के प्रस्तुतीकरण की प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है। चंदैनी गोंदा का सर्वप्रथम प्रदर्शन बघेरा गांव के एक खलिहान में सन 1971 को हुआ था इसके बाद तो पैरी, भिलाई, राजनाँदगाँव, धमधा, नंदिनी, धमतरी, झोला, टेमरी, जंजगिरी आदि अनेक स्थानों में पचास-पचास हजार दर्शकों के समक्ष यह सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। चंदैनी गोंदा में छत्तीसगढ़ी जीवन के जन्म से मरण तक के सभी सांस्कृतिक पक्षों को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इन सब तथ्यों को गूँथने के लिए कथा का एक झीना-सा तन्तु लिया गया है।

प्रमुख पात्र दुखित और मरही किसान दंपत्ति, भारत के किसानों के प्रतीक हैं। गंगा, गांव की बेटी है जो गांव की पवित्रता को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती है। शिव, गांव का बेटा है जो गांव की आस्था का प्रतीक है। चांद-बी, शोषित का प्रतीक ही नहीं भावनात्मक एकता की अभिव्यंजना भी है। बटोरन लाल, एक शोषक है जो छत्तीसगढ़ में ही नहीं, देश के किसी भी कोने में पैदा हो सकता है। “किसान ही भारत की आत्मा है” – इस तथ्य की व्यंजना, दुखित के इस संवाद से बड़े ही सशक्त ढंग से होती है – “मैं रोहूं तो मरही रो देही, मरही रो देही तो गांव रो देही गांव रो देही तो भारत रो देही। भारत माता ला मैं रोते नहीं देख सकंव। (मैं रो दूंगा तो मरही (पत्नी) रो देगी। मरही रो देगी तो गांव रो देगा और गांव रो देगा तो भारत रो देगा और भारत-माता को रोते मैं नहीं देख सकता)

शिव, युवक है अतः वह सब पहले भोपाल और दिल्ली में प्रजातांत्रिक ढंग से शोषितों की समस्या को हल करना चाहता है परंतु असफल होने पर तेलंगाना (साम्यवाद का प्रतीक) जाने की धमकी देता है परंतु छत्तीसगढ़ी धरती का प्रेम, त्याग और बलिदान उसके कदम सेना की ओर मोड़ देते हैं। वह देश की रक्षा करते हुए युद्ध में मारा जाता है। दुखित भी इस आघात को सहन नहीं पाता। शिव के रूप में गांव की आस्था मरती नहीं बल्कि देश के लिए बलिदान होकर अमर हो जाती है, परंतु हरित क्रांति और शोषकों पर किए गए तीखे व्यंग हृदय को चीरते चले जाते हैं। चंदैनी गोंदा की एक विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ छत्तीसगढ़ी के साहित्यकारों के सम्मान से प्रारंभ होता है। इसके अनेक दृश्यों में “दौरी” ( बैलों से धान के सूखे पौधों को खुंदवा कर धान अलग करना) हरित-क्रांति, गोरा पूजा (पार्वती पूजन) गम्मत तथा फौज आदि प्रमुख हैं। अभिनेताओं में दुखित के रूप में श्री रामचंद्र देशमुख और शिव के रूप में छत्तीसगढ़ी फिल्मों और रंगमंच के कलाकार शिव कुमार एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। शिवकुमार के “हरित क्रांति” लमसेना (घर जवाई) जैसे बहु-प्रशंसित, एक पात्रीय लघु नाटकों को चंदैनी गोंदा में गूँथ दिया गया है। “रविशंकर शुक्ल” तथा “लक्ष्मण मस्तूरिया” आदि के गीत और खुमान साव का संगीत, चंदैनी गोंदा की एक प्रमुख विशेषता है — उसमें मानो प्राण फूंक देते है।

विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि दाऊ जी ने यह कार्य स्वयं किया, स्थानीय साहित्यकारों तथा कलाकारों का उन्हें भरपूर सहयोग मिला। चंदैनी गोंदा के वे अकेले ही संस्थापक थे। उन्होंने किसी तरह के फाउंडर मेम्बर्स की टीम नहीं बनायी थी। हाँ, लोक कलाकारों के आपसी सामंजस्य व समर्पण के कारण चंदैनी गोंदा एक बड़ा परिवार बन गया था और सारे कलाकार उस परिवार के सदस्य बन गए थे। अनुशासन देखते ही बनता था। यह देख कर बड़ा दुख होता है कि कुछ लोग अपनेआप को चंदैनी गोंदा का संस्थापक और फॉउंडर मेम्बर बताकर अनावश्यक श्रेय लेने का प्रयास करते हैं। चंदैनी गोंदा का जन्म 1971 में ही हुआ था और प्रथम प्रदर्शन 07 नवम्बर को हुआ था। दाऊ रामचंद्र देशमुख चंदैनी गोंदा के एकमात्र संस्थापक थे, हैं और रहेंगे।

चंदैनी गोंदा की जर्जर हो चुकी मूल स्मारिका को नयी पीढ़ी तक पहुँचाने का बीड़ा उठाते हुए डॉ. सुरेश देशमुख एक ग्रंथ का रूप दिया जिसमें स्मारिका की सम्पूर्ण सामग्री के अलावा अनेक संस्मरण, कलाकारों के परिचय और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी साझा की गई हैं। इस अनमोल ग्रंथ के बारे में भी जानें –

“चंदैनी गोंदा छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा दाऊ रामचंद्र देशमुख व्यक्तित्व एवं कृतित्व संपादक डॉक्टर (प्रो.) सुरेश देशमुख, धमतरी”

उपर्युक्त शीर्षक से प्रकाशित बहु-प्रतीक्षित ग्रंथ मेरे सामने है। यह ग्रंथ मुझे 25 मई को ही सुरेश देशमुख जी के सौजन्य से वैभव प्रकाशन द्वारा प्राप्त हो गया था और कुछ लिखने की उत्कंठा मन में जाग गयी थी किन्तु पृष्ठ दर पृष्ठ पढ़ने के मोह को संवरण नहीं कर पाया। पढ़ता गया, पढ़ता गया और ग्रंथ के पृष्ठों के साथ साथ अतीत के स्वर्णिम पृष्ठों में खोता चला गया। यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि अपना आलेख कहाँ से शुरू करूँ ? कैसे शुरू करूँ। चंदैनी गोंदा को इस तरह से जिया है कि हर पल की स्मृति स्वयं से शुरुआत चाहती है। टुकड़ों-टुकड़ों में लिखता गया और अब संपादित कर अंतिम आकार देते हुए अपने विचार प्रकट कर पा रहा हूँ।

“इतिहास व कलेवर”

“छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा” – चंदैनी गोंदा नामक स्मारिका का विमोचन 07 दिसंबर 1976 को देवार-डेरा” के मंचन के पूर्व हुआ था। स्मारिका के संपादक-द्वय नारायण लाल परमार व त्रिभुवन पांडे तथा प्रेरणा स्रोत दाऊ रामचंद्र देशमुख थे। इसी स्मारिका को प्रथम संस्करण निरूपित करते हुए, डॉ. (प्रो.) सुरेश देशमुख ने द्वितीय संस्करण के तौर पर संशोधित एवं परिवर्द्धित करते हुए “चंदैनी गोंदा : छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा… दाऊ रामचंद्र देशमुख (व्यक्तित्व एवं कृतित्व)” नाम देते हुए इस ऐतिहासिक ग्रंथ का संपादन किया है। इसके ग्रंथ के प्रकाशक, राजधानी संपदा न्यास राजनाँदगाँव, छत्तीसगढ़ हैं। मुद्रक थॉमसन प्रेस इंडिया लिमिटेड है। आकर्षक आवरण प्रमोद यादव दुर्ग एवं कमलेश कुमार साहू राजनाँदगाँव ने तैयार किया है। कृति स्वाम्य, डॉ. (प्रो.) सुरेश देशमुख का है। प्रथम संस्करण 1976 और द्वितीय संस्करण 2021 के मध्य, चंदैनी गोंदा पर केंद्रित दो किताबें और प्रकाशित हुई हैं।
दोनों ही किताबें दुर्ग के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सन्तराम देशमुख द्वारा लिखी गयी हैं जिनके नाम क्रमशः “लोकमंच के पुरोधा” (1999) तथा “छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के विकास में दाऊ रामचन्द्र देशमुख का योगदान” (2013) हैं। जिनके अलावा मेरी जानकारी में चंदैनी गोंदा पर केंद्रित कोई भी किताब प्रकाशित नहीं हुई है।

“समर्पण”

डॉक्टर सुरेश देशमुख ने इस ग्रंथ को समर्पित किया है – उन कलाकारों को जिन्होंने चंदैनी गोंदा के यज्ञ में अपने कला की आहुतियाँ दीं। उन गीतकारों को जिनकी रचनाओं ने चंदैनी गोंदा को मधुरता प्रदान की। उन साहित्यकारों को जिन्होंने अपनी लेखनी से चंदैनी गोंदा को ऊँचाइयाँ प्रदान की। उन दर्शकों को जिन्होंने चंदैनी गोंदा के संदेश को आत्मसात किया और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

“अनुक्रमणिका”

यह ग्रंथ दो खंडों, सोलह अध्यायों व परिशिष्ट में बँटा है।
प्रथम खंड “कृतित्व दाऊ रामचंद्र देशमुख” शीर्षक से है जिसमें आमुख – प्रथम संस्करण, संपादक मंडल, प्रस्तुति सहायक तथा संपादकीय – “लोक संस्कृति की देहरी पर दो क्षण” सम्मिलित हैं। प्रथम खंड में कुल 9 अध्याय हैं।

“अध्याय”

अध्याय 1 से लेकर अध्याय 7 तक प्रथम संस्करण की सामग्री का पुनर्प्रकाशन है किंतु अध्याय 5 में “थिरकते तन और संवेदी मन” शीर्षक के अंतर्गत कलाकारों का परिचय दिया गया है।

अध्याय 6 चंदैनी गोंदा गीत कुंज के नाम से है। प्रथम संस्करण में इस अध्याय में लक्ष्मण मस्तुरिया के 10 गीत, रविशंकर शुक्ल जी के 2 गीत और 13 कवियों के एक-एक गीत प्रकाशित हुए थे अर्थात कुल 25 गीत प्रकाशित किये गये थे। द्वितीय संस्करण में यह अध्याय परिवर्द्धित है। इसमें कवि रवि शंकर शुक्ला के 8 गीत, राम रतन सारथी के 3 गीत, कोदूराम दलित, प्यारेलाल गुप्ता, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, नारायण लाल परमार, भगवती सेन, हेमनाथ यदु, पवन दीवान, चतुर्भुज देवांगन देव, राम कैलाश तिवारी, बृजेंद्र ठाकुर, धरमलाल कश्यप, लाला फूलचंद श्रीवास्तव, मुकुंद कौशल, डॉक्टर विनय पाठक और रामेश्वर वैष्णव के एक-एक गीत हैं। जिसके पश्चात लक्ष्मण मस्तुरिया के 34 गीत, एक लोकगीत और दीवारों के 4 पारंपरिक गीत हैं। इस प्रकार इस संस्करण में कुल 65 गीत संकलित हैं। प्रत्येक गीतकार की तस्वीर भी उनके गीतों के साथ प्रकाशित की गयी है।

अध्याय 7 भी परिवर्द्धित है जिसमें मूल चंदैनी गोंदा का पूर्ण कथानक है जो स्मारिका में नहीं था। गीतों के उल्लेख सहित पूर्ण कथानक, सुरेश देशमुख जी की लेखनी से उकेरा हुआ ऐसा शब्द चित्र है कि मूल चैंदैनी गोंदा की सम्पूर्ण मंचीय प्रदर्शन आँखों के सामने जीवंत करने में सक्षम और समर्थ है।

अध्याय 8 का शीर्षक दिया गया है “सर्जनाएँ ये भी हैं”। इसमें “एक रात का स्त्री राज्य” का संक्षिप्त कथा संकेत है। “देवार डेरा” का भी कथा संकेत है। कारी का कथासार भी इसमें दिया गया है। इसके साथ ही इन तीनों कार्यक्रमों के कलाकारों के नाम एवं मंचीय प्रस्तुतियों के छाया-चित्र भी है। इसी अध्याय के अंत में “छत्तीसगढ़ी देहाती कला विकास मंडल (1950) की कला-यात्रा का सविस्तार वर्णन है। तत्कालीन सम्माननीय विद्वानों की प्रतिक्रियाएँ, इस वर्णन को बहुमूल्य बना रही हैं। तत्कालीन गीतों व कलाकारों का भी इसमें उल्लेख हुआ है।

अध्याय 9 में “अनसुनी – अधसुनी” शीर्षक से डॉ सुरेश देशमुख ने ऐसे यादगार प्रसंगों का वर्णन किया है जो अभी तक संभवतः किसी की भी जानकारी में नहीं आए हैं। इस अध्याय में सुरेश देशमुख जी ने रोचक प्रसंगों के साथ ही अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया है। यह अध्याय अत्यन्त ही दिलचस्प व चौंका देने वाला है।

“द्वितीय खंड”

अध्याय 10 से द्वितीय खण्ड प्रारंभ होता है। इस अध्याय का शीर्षक “व्यक्तित्व – दाऊ रामचंद्र देशमुख” दिया गया है। इसमें दाऊ रामचंद्र देशमुख जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं संक्षिप्त जीवन परिचय है। इसी अध्याय में कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों द्वारा दाऊ जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर की गयी टिप्पणियों को संकलन है।

अध्याय 11 में “सामाजिक परिवर्तन के संबंध में लोक कला” इस विषय पर दाऊ रामचन्द्र देशमुख के विचार उद्घृत किये गये हैं।

अध्याय 12 में लगभग 19 पत्रों का संकलन हैं जिनमें से कुछ पत्र दाऊजी को लिखे गए हैं और कुछ पत्र ऐसे हैं जिन्हें दाऊ जी ने लिखे गए हैं। साथ ही अन्य महत्वपूर्ण पत्र भी हैं।

अध्याय 13 में का शीर्षक दिया गया है “जैसा हमने उन्हें जाना” इसमें 5 साहित्यकारों के आलेख शामिल हैं।

अध्याय 14 का शीर्षक दिया गया है “बातचीत”, जिसमें विभिन्न व्यक्तियों से लिए गए साक्षात्कार का समावेश है।

अध्याय 15 का शीर्षक दिया गया है “आमने-सामने” इसमें दाऊ रामचंद्र जी से देशमुख जी से ली गई भेंटवार्ताओं का उल्लेख है।

अध्याय 16 उपसंहार के रूप में डॉ सुरेश देशमुख से वीरेंद्र बहादुर सिंह की बातचीत प्रकाशित की गई है। इस ग्रंथ का यह अंतिम अध्याय है।

“परिशिष्ट”

सोलहवें अध्याय के पश्चात “परिशिष्ट” दिया गया है। जिसमें चंदैनी गोंदा का पहला हैंड बिल, प्रथम प्रदर्शन के समय दर्शकों में वितरित पर्चे, रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान, संपादक परिचय आदि को शामिल किया गया है

इस ग्रंथ को पढ़कर मैंने महसूस किया कि डॉ. सुरेश देशमुख ने इस उम्र में भी इस ग्रंथ के सम्पादन के लिए कठिन साधना की है। जहाँ तक मेरी जानकारी है दाऊजी के निधन के बाद चंदैनी गोंदा, एक रात का स्त्री राज्य, देवार डेरा और कारी के समस्त कार्यक्रमों के छायाचित्र, अखबारों की कतरनें, प्रत्येक कार्यक्रम के ऑडियो कैसेट, स्क्रिप्ट और अनेक दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री उनके निवास स्थान से किसी अन्य व्यक्ति को दे दी गई थी और उस व्यक्ति ने इस धरोहर को अपने तक ही समेट करके रख लिया है। ऐसी परिस्थिति में इस ग्रंथ में जितने भी दुर्लभ छायाचित्र प्रस्तुत किए गए हैं, उन्हें संकलित करने में डॉ. सुरेश देशमुख जी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा होगा, कितने कलाकारों से संपर्क करके उनसे चित्र प्राप्त किए गए होंगे, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। मैं सोचता हूँ कि चित्रों का संकलन ही इस ग्रंथ के निर्माण में सबसे कठिन, सबसे दुरूह और सबसे अधिक टाइम टेकिंग काम रहा होगा।

यह द्वितीय संस्करण वास्तव में संशोधित और परिवर्धित रूप में प्रस्तुत किया गया है इसे शोध कहना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि सुरेश देशमुख के जीवन काल के वे सारे अनुभव हैं, जिन्हें उन्होंने उन्होंने जिया है, उन्हें शब्द रूप में प्रस्तुत किया है। डॉ सुरेश देशमुख, चंदैनी गोंदा में केवल उद्घोषक मात्र नहीं थे। वे दाऊ रामचंद्र देशमुख के भतीजे होने के साथ ही चंदैनी गोंदा के प्रत्येक आयोजन के व्यवस्थापक भी रहे। वे हर प्रकार की गतिविधियों में दाऊजी के विशेष सहायक एवं सहयोगी के रूप में भी रहे इसीलिए उनके द्वारा लिखित व संपादित इस ग्रंथ में प्रकाशित समस्त सामग्री अत्यंत ही विश्वसनीय और पूर्वाग्रह से मुक्त है। यह ग्रन्थ दाऊ रामचन्द्र कृत चंदैनी-गोंदा और खुमानलाल साव द्वारा संचालित “चंदैनी गोंदा” के बीच उत्पन्न भ्रम को मिटाने में सफल होगा। यह ग्रंथ उन काल्पनिक दावों को भी एक सिरे से खारिज करेगा जिसमें कतिपय लोगों ने स्वयं को चंदैनी गोंदा का संस्थापक बताने की कोशिश की। चंदैनी गोंदा के एकमात्र संस्थापक दाऊ रामचन्द्र देशमुख जी थे, हैं और रहेंगे। मैं इस ग्रंथ के लेखक व संपादक डॉ.(प्रो.) सुरेश देशमुख सहित श्री विवेक वासनिक,अध्यक्ष – राजधानी संपदा न्यास राजनाँदगाँव छत्तीसगढ़ (प्रकाशक), मुद्रक थॉमसन प्रेस इंडिया लिमिटेड, आवरण निर्माता श्री प्रमोद यादव दुर्ग एवं श्री कमलेश कुमार साहू राजनाँदगाँव तथा डॉ. सुधीर शर्मा (सर्वप्रिय प्रकाशन, दिल्ली) को हृदय से बधाइयाँ देता हूँ जिनके समवेत प्रयासों से यह ऐतिहासिक दस्तावेज रूपी ग्रंथ “चंदैनी गोंदा, छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा…दाऊ रामचन्द्र देशमुख (व्यक्तित्व एवं कृतित्व)” छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर चंदैनी गोंदा पुष्प की ही भाँति लोकार्पित होने जा रहा है।

(चंदैनी गोंदा के चित्रों के फोटोग्राफर : श्री प्रमोद यादव, दुर्ग)

आलेख – अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)
संपर्क – 9907174334

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