March 6, 2026

महारानी वासटा के प्रेम का प्रतीक लक्ष्मण मंदिर

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प्राचीन दक्षिण कोसल में सातवीं शताब्दी में निर्मित ईंटों का मंदिर अपने कलात्मक वैभव को संजोए हुए है। सिरपुर का ईंटों से बना लक्ष्मण मंदिर अपने कलात्मक सौंदर्य से परिपूर्ण है। पाण्डुवशीं राजा हर्षगुप्त की स्मृति में महारानी वासटा देवी का बनवाया हरि मंदिर जो अब लक्ष्मण मंदिर के नाम से चर्चित है। 635-640 ईस्वी में शैव नगरी श्रीपुर में बना मंदिर अपनी बेजोड़ कलाकृति एवं स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण है।

ईंट निर्मित मंदिर –
ईंटों से निर्मित
विश्व का एकलौता मंदिर18 सौ साल से अविचल खड़ा है। महारानी वासटा देवी और हर्षगुप्त की प्रेमकथा का जीवन्त प्रतीक है, सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर। ताजमहल से अधिक सच्ची अनूठी प्रेम कहानी को संजोए, नाज़ है मंदिर की अद्‌भुत संरचना पर। गुप्तकाल में निर्मित ‘प्रेम का स्मारक’ जो संगमरमर या पत्थरों से नहीं मिट्टी को गूंथ गूंथकर ईंटों से बनाया गया है। जिसमें महारानी वासटा का अप्रतिम प्रेम और समर्पण भी रचा बसा है।
महारानी वासटा देवी की प्रेमकहानी का उल्लेख चीनी यात्री सुयेनचांग ने अपने यात्रा वृतांत में किया है। परन्तु महारानी के उत्कट प्रेम का खुलासा लक्ष्मण मंदिर में मिले तथ्यों से हुआ। 635 से 640 ईस्वी सन के दौरान महारानी वासटा ने राजा हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद अपने पुत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन के कार्यकाल में मंदिर का निर्माण कराया। महारानी वासटा मगध नरेश सूर्य वर्मा की पुत्री वैष्णव धर्मावलंबी थीं जिन्होंने हरि विष्णु का अपूर्व मंदिर बनवाया।

लक्ष्मण मंदिर –
ईंटों से बना लक्ष्मण भारत के सर्वोत्कृष्ट मंदिर से एक है।मंदिर अपने कलात्मक सौन्दर्य से परिपूर्ण है जिसके निर्माण में अदभुत कला कौशल दृष्टिगोचर होता है। ईंट निर्मित मंदिर की ऐसी कलाकृति व स्थापत्य दुनिया में और कहीं नहीं मिलता। “इतिहासकार कनिंघम ने बनारस की गुप्त शैली व एरण के तोरण द्वार जैसी अनूठी शिल्पकला से लक्ष्मण मंदिर की तुलना की है।”
मंदिर सात फीट ऊंचे पाषाण निर्मित जगती पर स्थित अपनी भव्यता लिए हुए है। पंचरथ शैली से युक्त इसमें गर्भगृह और उसके सामने मंडप है, दोनों के बीच अंतराल है। “गर्भ गृह योजना में पंचरथ है और रथ शिखर की ऊंचाई तक निरंतर चले गए हैं। बाहरी दीवारों में अनेक उभार हैं जो धीरे- धीरे उभरने के कारण धूप छांव का दृश्य उपस्थित
करते हैं और ऊपर तक जाने के कारण ऊंचाई को भी भव्यता प्रदान करते हैं । इसकी बाढ़ को पाभाग, जंघा और वरण्ड, तीन भागों में बांटा गया है। सिरपुर के इस मंदिर की अन्य उल्लेखनीय बात है कि सामने द्वार के ऊपर एक त्रिकोण खिड़की है। इस मंदिर में अलंकरण हेतु गवाक्ष रूपों का प्रयोग हुआ है।बीच- बीच में एवं कोनों पर आमलक बने हैं। इस मंदिर में चिनाई का कार्य अत्यन्त सुघड़ता के साथ किया गया है। तल और जोड़ को घिसकर चिकना कर दिया गया है और तब उसके ऊपर मनोरम अलंकरण किए गए हैं। इस देवालय की जंघा की तीनों दिवारों में जालीदार खिड़कियों का अलंकरण भारतीय शिल्प का अनुपम उदाहरण है जहां ईंट की वास्तुकला काष्ठकला के प्रभाव का सूचक प्रतीत होती है।
मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति पांचफन वाले सर्प पर अधिष्ठित है। कटि में मेंखला, यज्ञोपवीत, कर्ण कुण्डल, बाजूबन्द और मस्तक पर लपेटी हुई-जटा वाली श्रीहरि प्रतिमा 26×16 इंच की है। इस प्रतिमा को लक्ष्मण की प्रतिमा कहा जाता है किन्तु विद्वान गण इस कथन को नहीं स्वीकारते हैं ।
“मंदिर का चौखट पाषाण निर्मित 6×6 फुट का तोरण पांच शाखा में विभाजित है। भीतर से प्रथम तथा द्वितीय शाखा के ललाट बिम्ब पर शेषशायी विष्णु प्रदर्शित है जिनकी नाभि से निकले हुये सनाल युक्त कमल पर ब्रम्हा आरूढ़ित हैं। इसके एक कोने पर सरस्वती एवं दूसरे कोने पर लक्ष्मी प्रदर्शित की गई हैं। पार्श्व की पट्टियों पर मिथुन युगल प्रदर्शित हैं।चौथी शाखा पर पुनः लतावल्लरियां एवं पांचवीं शाखा में विष्णु के विभिन्न अवतारों को प्रदर्शित किया गया है। ललाट बिम्ब पर एवं विष्णु की प्रतिमा से विदित होता है यह मंदिर मूलतः विष्णु को समर्पित था।”

तोरणद्वार –
मंदिर के तोरण द्वार पर गंगा यमुना नदी देवियों की अनुपस्थिति और वहाँ कृष्णलीला व पौराणिक कथाओं को उत्कीर्ण किया गया है। यह गुप्तकाल की शैली से हटकर निर्माण परंपरा का यह प्रथम सोपान है। गुप्तकाीन मंदिरों में अंतिम देवगढ़ स्थित दशावतार मंदिर में परिलक्षित होता है कि वह लक्ष्मण मंदिर के बाद के काल का है। कारण यह लक्ष्मण मंदिर के तोरण द्वार पर उत्कीर्ण वराह मूर्ति उदयगिरी के वराह के समान है। वहीं दोनों में विभिन्नता भी है। लक्ष्मण मंदिर की वराह मूर्ति अष्टभुजी है और उद‌यगिरी की द्विभुजी है। लक्ष्मण मंदिर की वराह कृति उदयगिरी की वराहकृति से दो शताब्दी बाद की है। मंदिर के तोरण व्दार पर कृष्ण लीला के दृश्य प्राचीन गुफाओं की कलाकृति से मिलते हैं।
“राजिम के राजीव लोचन मंदिर का पश्चिमी तोरण द्वार मी महारानी वासटा देवी द्वारा बनवाया गया था। जिस पर सिरपुर के मंदिर की भांति विष्णु की शेषशयी मुद्रा अंकित है। इस तोरण में गज लक्ष्मी का अंकन भी है‌।”
महारानी वासटा देवी द्वारा निर्मित अद्वितीय मंदिर के संदर्भ में पुरा संस्कृति के जानकारो के परस्पर विरोधी मान्यताओं के साथ सिरपुर उत्खनन के निर्देशक अरुण कुमार शर्मा कहते हैं, “सिरपुर का विनाश 12वीं सदी में भूकंप तथा उसके बाद महानदी की विनाशकारी बाढ़ से हुआ। प्रकृति की विनाश लीला के बावजूद महारानी के प्रेम का प्रतीक मंदिर आज भी अपनी पूरी शान से खड़ा हुआ है। जारी 3…..
रविन्द्र गिन्नौरे

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