देह कुठरिया (उपन्यास )
पाठ – तेरह
लेखिका – जया जादवानी
सेतु प्रकाशन ( २०२१ ) प्रथम संस्करण
——————————-
यह सिर्फ एक पाठकीय प्रतिक्रिया है , इसे समीक्षा या आलोचना समझने की भूल कतई न करें |
*
“ एक हिजड़े से ज्यादा अकेला कोई नहीं होता | न कोई आगे न कोई पीछे | हमारे पास सिर्फ पीड़ित वर्तमान है | हम कुछ छोड़कर नहीं जाते लेकिन हमें सबसे पहले छोड़ा जाता है और हमारे अंत के साथ सबकुछ खत्म हो जाता है | हमारे लिए कोई नहीं रोता | “
एक ट्रांसजेंडर की यह कातर आत्मस्वीकृति कितनी सान्द्र करुणा समेटे हुए है अपने-आप में | जया जादवानी के विलक्षण उपन्यास ‘ देह कुठरिया ‘ में एक अहम पात्र का यह कथन काफी कुछ बयां कर देता है इस निष्ठुर कथित सभ्य समाज की संरचना के बारे में | सेतु प्रकाशन से २०२१ में प्रकाशित होकर आये इस उपन्यास को अभी तीसरी बार पढ़ते हुए भी भीतर तक वही सनसनाहट महसूस होती है जैसे पहली और दूसरी बार पढ़ने में हुई थी | ट्रांसजेंडर के बारे में अरुधंती राय के चर्चित उपन्यास “ अपार ख़ुशी का घराना “ पढ़कर इस बहिष्कृत समुदाय के बारे में कुछ जानने-समझने का मौका मिला था और अब जया जादवानी के इस उपन्यास ने इस समुदाय के विभिन्न आयामों और परतों को ऐसे सामने रखा है कि भीतर तक सम्पूर्ण हिला कर ही रख दिया |
२०१५ में जब सुप्रीम कोर्ट के नालसा जजमेंट से थर्ड जेंडर समाज के अधिकारों को मान्यता मिली तब समाचार और अन्य माध्यमों गवारा इसकी वृह्त चर्चा हुई और तब लोगों ने इस बारे में गम्भीरता से सोचा वरना छक्का , हिजड़ा , सिक्सर , किन्नर या मामू जैसे शब्दों से लगभग गाली के रूप में ही इन्हें पुकारने का रिवाज चला आया था लेकिन इस उपन्यास को पढकर पाठक जरुर उनकी दुनिया में स्वयं की उपस्थिति दर्ज कराकर मनन करने का उपक्रम करेंगे | जया जादवानी की अपनी मोहक दार्शनिक – मनोवैज्ञानिक भाषा है जिससे वे दुरूह से दुरूह विषयों और गुत्थियों को असरकारक ढंग से पाठकों के साथ साझा करती हैं | वे कवियत्री भी हैं तो उनकी भाषा में कोमलता और सम्वेदना की सघनता का विशिष्ट गुण होना लाजिमी है लेकिन इसके अलावा इनकी विशिष्ट शैली-शिल्प भी पाठकों को बांधे रखने में कारगर होती है | उनकी कहानियाँ और कवितायें भी भाषा के वैभव को प्रस्तुत करती हुई अपनी बात सम्पूर्णता में कहने में समर्थ होती हैं |
इस उपन्यास को पच्चीस उप-शीर्षकों में बाँटा गया है और हर एक शीर्षक एक नए वितान को खोलने का जरिया है | हमारी अपनी जानी-पहचानी पृष्ठभूमि में ऐसी भी एक अनूठी दुनिया है इसका अहसास् इस उपन्यास को पढ़ने के बाद हो पाया वरना आत्ममुग्धता की स्थिति में जीते हुए अपने आसपास की विलक्षण दुनिया से अंजान ही तो थे अब तक | फिल्मों के जरिये कुछ सतही जानकारी ही मिल पाती है मानों वे सिर्फ मनोरंजन की साधन मात्र हों जबकि इस वर्ग के साथ कितनी ज्यादती होती आई है यह जान पाने का कोई जरिया ही कहाँ उपलब्ध हो पाता है | इस उपन्यास की एक पात्र निकिता बजाज , जो एक ट्रांसजेंडर है , कहती हैं –‘ अगर आपको रोटी चाहिए , कपड़ा चाहिए , सुरक्षा चाहिए तो परिवार से बेहतर कुछ नहीं है लेकिन अगर आपको आजादी चाहिए तो परिवार से बदतर कोई नहीं है | हिजड़ा कोई पैदा नहीं होता , हिजड़ा बनता है | ‘ यह विज्ञापित सुखी परिवार की नब्ज टटोलती टिप्पणी कितनी भयावह है | अपने ही लोगों द्वारा दुत्कारे जाने के बाद इस नैसर्गिक जीव का कहाँ कोई ठिकाना बचा रह पाता है भला ?
२८० पेज के उपन्यास की खासियत यह भी है कि प्रत्येक खंड में एक नया अनूठा वास्तविक चरित्र अपने को उधेड़ता हुआ प्रस्तुत होता है , दिल दहला देने वाली किसी घटना का जिक्र होता है , किसी एक नए सांघातिक जगह का जिक्र होता है जहाँ किसी एक नई व्यथा को शिद्दत से रेखांकित किया गया है | एक खंड है ‘ लाक डाउन जीवन ‘ , इसमें उस भयावह महामारी के दौर का ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण और वार्तालाप प्रसंग है कि सजीव उपस्थित दृश्य की विभीषिका से ऑंखें फटी रह जाती है और पीड़ा के आँसू झरने लगते हैं | जब सभी छोटे-बड़े रोजगार खत्म होने की कगार पर थे और पेट भरना ही किसी महायज्ञ से कम बात नहीं थी तब इस तिरस्कृत समुदाय ने कितनी यातना झेली इसका वास्तविक ब्यौरा प्रस्तुत है | बहुत रोचक अनूठी शब्दावली वाली बातचीत में उनकी दिनचर्या से सम्बंधित कई ऐसे पद आते हैं जिसके बारे में जानना तो क्या सुना भी नहीं गया है | जैसे नाद (घर ),खौड़ी बाज ( झूठी ), बड़मा ( सौ ), बड़े बदमा ( हजार ),चिस्सा ( बढ़िया ), घिड़की ( ट्रेन ), थपड़े ( पैसा ), पिलमा ( सोना ), कोड़गी ( पागल ), टेपना ( देना ), पत ( भाग ),पंथी ( आदमी ), निहारन ( औरत ), गिरिया ( स्ट्रेट ), धुराना ( सेक्स करना ),पन ( धंधा ) ,खोबड़ ( चेहरा ), चामना ( पहचानना ), भपका ( मेक अप ) इत्यादि |
इतनी जद्दोजहद के बाद अब समर्थन में उठे कुछ हाथों के बीच इन्हें एक्टिविस्ट की तरह काम करते हुए कुछ सहयोगी फाउन्डेशन से जुड़कर हल निकलने की युक्ति के रूप में मितवा संकल्प समिति सामने आई है जिसमें विकास से विद्या में कायांतरण होने वाली एक पात्र ने अपने आसपास के पीड़ितों को एक छतरी तले एकत्र कर रोजगार-साधन , मनोवैज्ञानिक संबल , नये उपयुक्त साथी की तलाश में मददगार होने की युक्ति करते दिखाई देते हैं | शरीर से लड़का हूँ पर मन से लड़की या शरीर से लड़की हूँ पर मन से लड़का , इस दर्द भरे अहसास को जब भी किसी हमदर्द जैसे दिखने वाले साथी के सामने वह रखता या रखती है तभी किसी त्रासदी की तरह रिश्ता सुखद अंत के पहले ही बेवफा कांच की तरह तिड़क जाता है , न जाने क्यों ? क्या इन्सान सिर्फ मांस का लोथड़ा है ? क्या शरीर में सिर्फ लिकम , एनस , वैजाइना , पेनिस , आकर्षक छातियाँ और नर्म नाजुक कुल्हे भर ही होते हैं ? क्या वह अपेक्षित अदाओं का पुतला भर ही है ? आखिर श्रेष्ठ जीव में बारीक़ संवेदना की बुनावट और करुण भावों की तरावट कहाँ तिरोहित हो जाती है , यह सोचते हुए बेतरह जमाने भर से छला हुआ अंत में अपने को लुटा हुआ ही पाता है वह |
“ औरत से जितना लो वह उतनी ही समृद्ध होती जाती है | उसके पास से कुछ भी कम नहीं होता | “
यह एक ऐसी विरोधाभास स्वीकारोक्ति है जो पाठक के विवेक और मनःस्थिति पर निर्भर करती है | माँ , बहन , बेटी , पत्नी जैसी और भी कई पारिवारिक रिश्तों में बंधी औरत क्या सचमुच हमेशा समृद्ध होती चली जाती है , यह सोचने वाली बात है | मित्र या सहयोगी तो बिरले ही मिलते हैं पथ पर | किताब की भूमिका में भैरवी रवि अमरानी जो इस उपन्यास के एक मुख्य पात्र भी हैं , कहते हैं –‘ मैं नहीं जानता कि हमारी लाइफ की बाबत आप लोग कितना जानते हैं | सच पूछिये तो रहस्य सबसे ज्यादा है , बनाये गये रहस्य | ताकि जो जैसा है निर्बाध चलता रहे और मिथ फलता-फूलता रहे | ‘ उनके इस कथन में निराशा-हताशा और उपेक्षा के दंश नजर आते हैं | और क्यों न हो जब दोगला समाज ही बनावटी मुखौटे लिए शुद्ध आचरण करने में नाकाम हैं तब | बल्कि सदियों पहले की स्थिति आज से ठीक ही रही होगी जब वे दरबार में स्त्रियों की रक्षक मानी जाती थी , उच्च स्तर के सेविका स्वीकारी जाती थी और उम्दा दर्जे की कलाकार के रूप में सम्मान पाती थी | पीड़ा भरी कितनी सदियाँ गुजर जाने के बाद तो अत्याचार से आक्रांत बन्धी मुट्ठियाँ अब आसमान की तरफ तनी हैं और तब सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी रायशुमारी दर्ज करा दी है तो कितना सकारात्मक बदलाव हो पाता है यह देखने वाली बात होगी | स्थानीय थर्ड जेंडर यह स्वीकार करते हुए नहीं थकते कि छत्तीसगढ़ की धरती पर जन्म लेने पर उन्हें गर्व हैं | देश-विदेश से आये एक्टिविस्ट भी स्वीकारते हैं अपेक्षाकृत यहाँ सौहार्द्रपूर्ण वातावरण है | लेकिन आदमी तो कुंठित मनोदशा और व्यथित भावों वाला पुतला ही हुआ | ऐसे में उसकी फिरंगी फितरत भी कितनी जुदा हो सकेगी भला | इंसाफ कहाँ मिला सत्ता से , समाज से , ईश्वर से ? पल पल बदलते चेहरों और बेहद स्वार्थी दुनिया के बीच लगता तो नहीं कि मिट्टी , पानी , हवा , उजाला , नमी-गर्मी-सर्दी-खुशबू -फूल –— ये सब मिलकर भी समाज की सोच को बदल पाएंगे | अगर बदल जाये तो सचमुच तिरस्कृत- बहिस्कृत -तिरोहित समुदाय को कुछ आजादी मिले , कुछ साँस मिले , कुछ निजत्व मिले औए मिले स्वप्न भरी कुछ कुछ हसरतें | कितनी उदास होकर एक पात्र रवीना बरिहा कहती हैं – ‘ ट्रांसजेंडर अपने अधिकार को लेकर कभी नहीं लड़ते क्योंकि किससे लड़ें ? लड़ेंगे तो परिवार से जो एक रिश्ता टूटा-फूटा बना हुआ है , वह भी टूट जायेगा |