उम्र के सातवें दशक में
एक ने पूछा
महाराज !
क्या खाते .कब खाते हो
कितना खाते हो।
मैंने कहा सब कुछ
पर बहुत कम- कम
पीते क्या हो?
कुछ नहीं
बस अपने हिस्से का मिला हुआ .गम !
कुछ ज्यादा कुछ कम
रहता हूँ अपनी दुनिया में
जहाँ न दुख है न सुख
न हर्ष न विषाद
न शिकायत न फ़रियाद
ईश्वर को रखता हूँ याद
फिर-‘ ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर”
.खुदा सब की रखना .खैर !
न कोई अनुशासन है .न पूजा न आसन
न भोग न समाधि न रोग न व्याधि
बीन लेता हूं मोतियों से बोल
जहां से भी मिले जानने को
सहज लेता हूँ हृदय की अंतरतम गहराइयों में
कुछ गीता. ग्रंथ .जेंदावेस्ता .
पिटक. पुराण या बाइबल से
और नाप आता हूं सैकड़ों योजन की दूरी
सुदूर जंगल .नदी पहाड़ झरनो को
निहार आता हूँ
अब भी अपनी मोटरसाइकल से
आयु के सातवें दशक में
क्या यह संभव है
पर ज़रा रुकिए और सुनिए
दुनिया में कुछ भी नहीं जो असंभव है ।
आपका दिन मंगलमय हो।++++
डॉ अजय पाठक