मातृभाषा एक अनसुना रेडियो-स्टेशन है
मातृभाषा वह धूप है, जो घर की देहरी पर कभी नहीं पड़ती – क्योंकि वह स्वयं ही घर के भीतर से फैलती है।
हम अक्सर भाषा को बाहर से आती हवा समझ लेते हैं, जबकि वह भीतर जलती वह धीमी आग है, जिससे हर शब्द गर्म होता है। जितना बाहर जाएँ, धूप बदल सकती है, पर भीतर की आग नहीं।
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मातृभाषा वह पहला दरवाज़ा है, जिसे हम बंद करना कभी सीखते ही नहीं। दुनिया के कितने ही ताले बदल लें, कितने ही नए पासवर्ड बना लें— मातृभाषा के लिए मन हमेशा खुला रहता है, बिना कुंडी, बिना किवाड़ के।
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यह वह नदी है, जिसे हम अक्सर उल्टी दिशा में तैरकर खोजते हैं। स्कूल, दफ़्तर, शहर, महानगर— सब हमें आगे बहाते हैं; पर मातृभाषा पीछे मुड़कर चली जाने वाली वह धारा है, जहाँ पहुँचते ही समझ आता है कि हमारा सोचना अभी भी यहीं से पानी उठाता है।
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यह स्मृति की वह मिट्टी है, जिसके कण कभी सूखते नहीं। आप चाहें तो किसी और भाषा में भावनाएँ सजाकर रख लें, पर रोना और हँसना हमेशा मातृभाषा की मिट्टी पर ही साफ़-साफ़ दिखता है।
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मातृभाषा वह छतरी है, जिसे हम बारिश में नहीं खोलते—क्योंकि वह हमारे भीतर तनी रहती है।
यह भी एक तरह की सुरक्षा है, लेकिन बाहरी नहीं, आंतरिक ! इसे बचाने की ज़रूरत बाहर नहीं, भीतर होती है—शब्दों की नहीं, दृष्टि की।
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मातृभाषा वह अनसुना रेडियो-स्टेशन है, जो जब चाहे स्वयं चालू हो जाता है। भीड़ में चलते हुए, किसी गली से आती परिचित आवाज़,या अचानक याद आ गया कोई पुराना शब्द—जैसे भीतर किसी ने बटन दबा दिया हो।
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यह वह मार्ग है जो कभी समाप्त नहीं होता, पर जिस पर चलने के लिए हमें जूते नहीं पहनने पड़ते। अन्य भाषाएँ सड़कें हो सकती हैं—मातृभाषा हमेशा घर का फर्श है।
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मातृभाषा वह अकेला दर्पण है जो हमारी परछाई को रंग नहीं बदलने देता। विश्वभाषाएँ हमारे स्वरूप को चमका सकती हैं, पर असली आकृति केवल मातृभाषा ही पहचानती है—और वह भी बिना किसी भ्रम के।
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यह वह बीज है जिसे हम बोते नहीं, बल्कि जिससे हम स्वयं उगते हैं। बाक़ी भाषाएँ पेड़ पर उगते फल हैं-मातृभाषा ज़ड़ है, जिसे देखकर कोई पेड़ नहीं कहता, फिर भी वही पूरे वृक्ष को थामे रहती है।
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मातृभाषा वह मौन है, जिसे हम बोलते नहीं, पर जो हमें बोलता है।कभी-कभी भाषा शब्द नहीं होती, एक धुकधुकाहट होती है। जब सभी भाषाएँ थक जाती हैं, मातृभाषा तभी अपना कार्य शुरू करती है।
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यह वह ऋतु है, जो कैलेंडर में दर्ज नहीं होती—पर भीतर मौसम बदलते ही अपने संकेत भेज देती है। कहीं भी चले जाएँ, मातृभाषा अपने बादल और अपनी धूप साथ भेजती है—उतने अनदेखे रूप में कि हम पहचान कर मुस्करा देते हैं।
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मातृभाषा वह घड़ी है, जो समय नहीं बताती—वह बताती है कि हम किस समय से बने हैं। यह पहचान की भाषा है, पहचान का समय है।
* जयप्रकाश मानस