March 6, 2026

श्रेष्ठता का उपनिवेश सबसे ख़तरनाक

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कभी-कभी मुझे लगता है : महानता एक छोटा-सा महाद्वीप है—अभी-अभी खोजा गया, पर जिस पर झंडे बहुत पहले से गड़े हुए हैं।

जो लोग वहाँ पहले पहुँचते हैं, वे भूगोल की तरह नहीं, बल्कि इतिहास की तरह बोलने लगते हैं—जैसे सब कुछ उसी क्षण उनके कारण हुआ हो।

पर उस महाद्वीप की चट्टानों पर बैठे असली महान लोग अक्सर यह दावा ही नहीं करते। वे तो कभी-कभार मुस्कराहट में अपनी जगह खो भी देते हैं।

मगर समुद्र के उस पार – उनकी महानता के आसपास कई छोटे-छोटे बंदरगाह बन जाते हैं, जहाँ जहाज़ों में लदा होता है – अनुयायी, अनुशासन, नियम और प्रशंसाओं की थोक – ख़रीद।

धीरे-धीरे महानता एक सिद्धांत में बदल जाती है— मानो कोई धर्म, जिसका पहला उपदेश हो : “बाक़ी सब अधूरे हैं।”

और इसके बाद शुरू होता है श्रेष्ठता का उपनिवेश—जहाँ बाक़ी मनुष्य साधारण कहे जाने के लिए भी पहले से तय इम्तहान में बैठते हैं। एक चुप हिंसा जन्म लेती है—शब्दहीन, पर गहरी।

समाजशास्त्र कहता है—हर अनुयायी समय के साथ अपनी परीक्षा नहीं देता, वह परीक्षक बनना चाहता है। और जिस महान व्यक्ति में यह हिंसा नहीं होती, उसे उसके ही नाम पर एक ऐसी भीड़ मिल जाती है, जो उसकी सरलता से अधिक उसकी ऊँचाई में दिलचस्पी लेती है।

महानता ऐसे ही हिंसक होती है—उसके भीतर नहीं, उसके आसपास।

उसका शासन किसी राजा की तरह नहीं, किसी ‘राजदरबार’ की तरह फैलता है—जहाँ दरबारी सिंहासन को बचाने के लिए सभी असहमतियों को बेदखल करते हैं।

और यही हिंसा कला में, विज्ञान में, राजनीति में, यहाँ तक कि कविता के भीतर भी देखने लगती है।

कविता की श्रेष्ठता का उपनिवेश सबसे ख़तरनाक होता है—लोग एक विशेष लहजे को ‘अंतिम लहजा’ बना देते हैं।

एक तरह का रूपक, एक तरह की भाषा, एक तरह का मौन। बाक़ियों को ‘ग़ैर-काव्यात्मक’ बता कर सीमा के बाहर धकेल दिया जाता है।

जैसे कविता भी कोई देश हो—और उसकी सीमा पर कुछ चौकियाँ तैनात हों, जहाँ काग़ज़ दिखाना पड़ता हो : “क्या आप मान्य ढंग से कवि हैं?”

पर असली महान कवि ऐसा नहीं सोचता। वह तो किसी को भी किसी चौकी से वापस नहीं लौटाता।

अजीब है न—जिस महानता की शुरुआत विनम्रता से होती है, उसका अंत कई बार अनुयायियों की भीड़ द्वारा रचित साम्राज्य में होता है।

मनोविज्ञान कहता है—मनुष्य सिर्फ़ महानता चाहता नहीं, उसमें शामिल होना चाहता है। और शामिल होने की इस आकांक्षा में वह दूसरों को बाहर कर देना एक वैध काम समझने लगता है।

ऐसे में श्रेष्ठता—जो कभी एक विनम्र पौधा थी—धीरे-धीरे राजघराने का बबूल बन जाती है, जिसकी छाया में सिर्फ़ वही सुरक्षित रहते हैं जो पहले से उसके सेवा-सम्बंध में हों।

पर एक दिन—कभी किसी दोपहर, किसी पीछे छूटे गाँव में, एक बिल्कुल साधारण आदमी अपनी बिल्कुल साधारण आवाज़ में एक साधारण-सी बात कह देता है। और वही बात कई सिद्धांतों की नींव हिला देती है।

तब पता चलता है—श्रेष्ठता का सबसे बड़ा भ्रम यह था कि वह श्रेष्ठ थी।

हर महानता यदि लोकतांत्रिक न हो – एक दिन अपने ही लोगों को अपने ही नाम पर चोट पहुँचाने लगती है।

और दुनिया में सबसे शांत हिंसा यही है—जहाँ कोई हत्या नहीं होती, पर कई आवाज़ें धीरे-धीरे मर जाती हैं।
●जयप्रकाश मानस

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