शहीदी दिवस : गुरु तेग बहादुरजी को शत-शत नमन!!
कायदे से तो आज का दिन राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। क्योंकि आज ही के दिन गुरु तेग बहादुर जी शहीद हुए थे। मुगल शासन काल की क्रूरतम घटनाओं में एक है सिखों के नवम गुरु गुरु तेग बहादुर सिंघ जी के साथ नीच शासक औरंगजेब द्वारा की गई बर्बरता। गुरुजी कश्मीरी पंडितों की रक्षा की बात करने के लिए औरंगजेब से मिलने दिल्ली पहुँचे थे। औरंगजेब ने उनसे कहा कि आप इस्लाम कबूल कर लें। लेकिन गुरु जी ने साफ इनकार कर दिया। कहा, “मैं शीश कटा सकता हूं लेकिन अपने केश नहीं”। औरंगजेब ने उन्हें खूब यातनाएँ दी। 24 नवंबर 1675 को गुरुजी का सर कलम करके उन्हें शहीद कर दिया गया। इसके पहले उनके अनुयायी मतिदासजी को 9 नवंबर के दिन आरे से चीर कर शहीद किया गया। दूसरे दिन सती दास जी को रुई से लपेट कर जला डाला। भाई दयाला जी को खौलते पानी के कढ़ाहे में डाल दिया गया। कल्पना तो करके देखिए इस दृश्य की। आँखों में आँ सू जाएंगे। खून खोलेगा। और शर्मनाक हरकत तो देखिए कि आजादी के बाद वर्षों तक दिल्ली में औरंगजेब के नाम से सड़क आबाद रही। वे कैसे नीच लोग थे जिन्होंने क्रूर मुगल शासकों के नाम से भी सड़कों का नामकरण किया। क्या कांग्रेस सरकार की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी? बहरहाल, हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान करने वाले ‘हिंद की चादर ‘कहे जाने वाले परम पूज्य गुरु तेग बहादुर जी को उनके शहीदी दिवस पर शत-शत नमन। उनके लिए मैंने कभी एक गीत लिखा था, वह गीत यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ :-
वे ‘हिंद की चादर’ उजली हैं, शत् बार नमन, शत् बार नमन।
गुरु तेगबहादुर जी से हम,सीखें नित स्वाभिमान-दर्शन।
जो थे जुल्मी उन लोगों से,भिड़ कर जीवन बलिदान किया।
जो पीडि़त हिंदू थे उनका,संरक्षण और उत्थान किया।
थे मानवता के रक्षक अपने जीवन का ही किया हवन।।
वे हिंद की उजली चादर हैं, शत् बार नमन, शत् बार नमन।।
बेटे ने कहा, ओ पिता मेरे, अब आप धर्म के रक्षक हैं।
आगे आएँ, प्रतिकार करें, ये मुगल दुष्ट औ भक्षक हैं।
बेटे ‘प्रीतम’ की बात सुनी, बढ़ गए गुरु के पुण्यचरन।।
वे हिंद की उजली चादर हैं,शत् बार नमन, शत् बार नमन।
गुरु बोले- औरंगजेब! राजा है गंदे काम न कर ।
क्यों जबरन धर्म बदलवाए,इसलाम को तू बदनाम न कर।
वह क्रूर न माना फिर उसने, गुरुजी की ले ली बढ़कर जान।
शीश काट शहीद किया पर गुरु-चेहरे पर थी मुस्कान।
शीश दिया पर सी ना की,हँसके कर गए परलोक गमन।
मती दास और सती दास, दयाला,इनका भी बलिदान हुआ।
निर्मम मुगलों के क्रूर कर्म से, दुखी हरेक इंसान हुआ।
पर जो नीच हुआ करते, उनमें कैसा हो नेक चलन।।
@ गिरीश पंकज