March 6, 2026

धर्मेन्द्र को याद करते हुए:

0
WhatsApp Image 2025-11-25 at 4.30.20 PM

वे मेरे मिडिल स्कूल के प्यारे प्यारे दिन थे. जब फिल्मों के धर्मेन्द्र से अंजान था. तब तक शम्मीकपूर और राजेन्द्र कुमार को ही पहचान पाया था. मैं पाटन स्कूल का छात्र था प्राचार्य पिता के एक शिष्य कुलेश्वर सोनी जी की बारात में राजनांदगांव जाने का आमंत्रण मिला. पिता ने मुझे भेज दिया. हम राजनांदगांव पहुँच गए. सुबह जेवनासे से निकलकर नहाने के लिए सारे बाराती रानीसागर पहुँच गए. जिसके किनारे बसे दिग्विजय महाविद्यालय में महान कवि मुक्तिबोध का निवास था.

हम सब घाट पर खड़े होकर रानीसागर के विशाल जलक्षेत्र को निहार रहे थे. यह बाउंडरी वॉल से घिरा तालाब था. तब सोनी समाज के नौजवान बारातियों ने नहाने से पहले फोटो खिंचाना शुरू किया. वे चुस्त पेंट में खोंसकर आकर्षक कमीजें पहने हुए थे. कमर में बढ़िया बकल लगी हुई बेल्टें कसी हुई थीं. नीचे पैरों में जूते-मोज़े और ऊपर आँखों में खूबसूरत गॉगल थे. कुछ के सिर पर हैट भी थे. फोटों खिंचाने से पहले सबने केवल अपनी कमीजें उतारी और बाकी साज-श्रृंगार उनका ज्यों का त्यों बना रहा. उन्होंने खुले बदन की छाती में हवा भरी और अपने मसल फुलाए. फिर गले में और छाती में हाथ फेरते हुए किसम किसम के अंदाज में फोटो खिंचाए.

देखने वालों को आश्चर्य हुआ कि लोग फोटो खिंचाने से पहले कमीज पहनते हैं लेकिन यहां पहनी हुई कमीज उतार दी गई थी. किसी ने पूछा कि ये छोकरे ऐसा कर क्यों रहे हैं तो उसका जवाब आया कि “ये छोकरे अपने आप को धर्मेन्द्र समझ रहे हैं.” उस समय घरों में भी ऐसे नौजवानों द्वारा खुले बदन वाले फोटो टांगने का फैशन चल निकला था. यह साल १९६६ था और इसी वर्ष फिल्म ‘फूल और पत्थर’ सिनेमाहालों में लगी हुई थी. जिसमें धर्मेन्द के जिसमानी सौन्दर्य और उनके चौड़े सीने को कैमरे ने खूब फोकस किया था और दर्शक अवाक् हो एक ऐसे जाँबाज हीरो को देख रहे थे जिसने परंपरागत हीरो के कमसिन और चाकलेटी सौन्दर्य को ध्वस्त कर दिया था. यह फिल्म धर्मेंद्र के करियर का भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई. राजकपूर के बाद इस फ़िल्म की सफलता के जरिए धर्मेंद्र सोवियत संघ और वारसॉ देशों में बेहद लोकप्रिय होने वाले दूसरे भारतीय अभिनेता बन गए. धर्मेंद्र और मीना कुमारी की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ने अपार लोकप्रियता हासिल की.

यही धर्मेन्द्र का ‘ही-मैनशिप’ था. इसने नौजवानों को सीना चौड़ा करना और मसल बनाना भी सिखाया. यही वह समय था जब मसल बढ़ाने के लिए एक मशीन ‘बुलवर्कर’ भी इजाद हुई और उसकी भी बिक्री धुंआधार हुई थी.

फिल्मों में पुरुषोचित सौन्दर्य के जो दो बड़े महानायक हुए उनमें एक देवानंद और दूसरे धर्मेन्द्र हुए. पर देवानंद में एक कमसिन चाकलेटी सौन्दर्य था जबकि धर्मेन्द्र पूरी तरह मर्द हीरो थे. उनकी पोर पोर से मर्दानगी फूटती थी. बुलंद आवाज से भरे उनके संवाद गहरे प्रभाव छोड़ते थे. मोहम्मद रफ़ी की आवाज उनके गले में मुफीद बैठती थी. मर्दानेपन के कारण रोमांटिक हीरो होते हुए भी उनकी फिल्मों में अंडर-वर्ड के साथ मारधाड़ का फिल्मांकन खूब हुआ. साहसिक रोमांचक दृश्यों और जबरदस्त फाइटिंग सीन के लिए वे जाने गए. उनके साथ घूंसेबाजी में भिडंत करने वालों की भी पहचान हुई जिसमें एक ‘शेटटी’ थे. शेट्टी ने एक बार कहा भी था कि “केवल धरम पाजी के साथ ही फाइटिंग सीन करने में मजा आता है बाकी हीरों से तो मार खाने में शर्म आती है.’

यह धर्मेन्द्र का मर्दाना सौन्दर्य ही था जो उनके समय की सम्पूर्ण स्त्री, सर्वांग सुन्दरी हेमामालिनी उनकी ओर आकर्षित हुई और अपनी माँ के कड़े अनुशासन के बाद भी अपने से बारह वर्ष बड़े विवाहित पुरुष को अपनाने का लोभ संवरण न कर सकी. उस धर्मेन्द्र से जिसकी केमेस्ट्री कभी पुरानी नायिका मीनाकुमारी से मिली थी.

यह धर्मेन्द्र का ही, रूमानी छवि के साथ ‘एंग्रीमैन’ और ‘ही-मैन’ वाला रूप था जिसके उत्तराधिकारी बाद में अमिताभ बच्चन हुए और दोनों ने बॉक्स ऑफिस में सफलता के झंडे गाड़े. नायक की लम्बी पारी खेली. ‘शोले’ में तो इन दोनों ने मिलकर लोकप्रियता का एक इतिहास रच दिया.

इस मर्द हीरो की एक फिल्म ‘शराफत’ थी जिसमें धर्मेन्द्र इतने सीधे सादे इन्सान रहते हैं कि कोई भी उन पर हाथ उठा देता है और वे कुछ नहीं कर पाते हैं. इस तरह की उनकी कई फ़िल्में गुलशन नन्दा के उपन्यासों पर आधारित बनी फ़िल्में थीं. इस मनोरंजन प्रधान फिल्मों के हीरो की यदि सरोकार युक्त सिनेमा की बात करें तो धर्मेन्द्र की कम फ़िल्में थीं जैसे – बंदिनी, सत्यकाम और जीवन मृत्यु. शायद यही कारण होंगे वे दर्शकों के बीच बेइंतिहा मुहब्बत तो पा गए थे पर फिल्मों में अपने सार्थक योगदान के लिए पुरस्कारों से वे नहीं नवाजे जा सके. जबकि उनके विकल्प के रूप में देखे जाने वाले मनोज कुमार को दादासाहब फाल्के अवार्ड भी मिल गया. ये दोनों हीरो हरियाणा के जाट थे. कद काठी, घुंघराले बालों और नाक नक्श से मिलते जुलते से थे. निर्देशकों को जब धर्मेन्द्र की तारीख नहीं मिलती थी तब वे मनोजकुमार को ले लेते थे जब मनोजकुमार की तारीख नहीं मिलती थी तब वे धर्मेन्द्र को रख लेते थे. फिल्मों के अतिरिक्त दोनों की रूचि खेती बाड़ी में भी खूब रही. मनोज कुमार को देशभक्ति पूर्ण फिल्मों में ‘भारत कुमार’ बनने के कारण महत्व मिला. धर्मेन्द्र को पीने का शौक रहा और उन्होंने ‘बैग पाइपर’ जैसी मामूली शराब का विज्ञापन कर उसका महत्त्व बढ़ा दिया था.

‘कौन बनेगा करोडपति’ कार्यक्रम में एक महिला ने अमिताभ बच्चन से जब कहा कि “आप तो अपनी पत्नी के भी प्रिय हीरो हैं.” तब अमिताभ ने कंझाते हुए बताया कि “अरे नहीं? मेरी पत्नी के तो प्रिय हीरो धर्मेन्द्र हैं.”
००० विनोद साव

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *