अभिनय में मैं धर्मेंद्र का फ़ैन नहीं रहा…
उनसे दो बार मिलना हुआ। एक बार 1980 में जयपुर के क्लार्क्स आमेर होटल में, जब वे — हेमा मालिनी के साथ — ‘रज़िया सुल्तान’ फ़िल्म की शूटिंग के लिए आए हुए थे। अस्सी के दशक की बात है। मेरे मित्र अशोक शास्त्री (अब नहीं रहे) और जगदीश शर्मा साथ थे; ‘पत्रिका’ से तीनों मेरी यज़दी पर सवार होकर गए थे। तब क्लार्क्स आमेर बहुत दूर लगा। आज तो हमारा घर उसी के निकट है।
धर्मेंद्रजी से बहुत गम्भीर बात नहीं हो सकी। पर उनकी सहजता ने मन मोह लिया। उन्होंने जो रेशमी चोग़ा पहन रखा था, उन्होंने बताया कि वह उन्हें शूटिंग के लिए मिला था। पर “पसंद आ गया, इसलिए गाउन की तरह बरत रहा हूँ”।
दूसरी मुलाक़ात में उनके साथ बीकानेर से दिल्ली ट्रेन में सफ़र हुआ। संभवतः 2005 में। दो बिस्तरों वाले कूपे में हम साथ चढ़े। मैंने बरसों पुरानी चोग़े वाली मुलाक़ात याद दिलाई। घुलमिल गए। मैंने ऊपर चढ़कर आँखें बंद कीं तो नीचे से उनकी पुकार आई — चार्जर हैगा? वे होटल में भूल आए थे।
वे बीकानेर के अनिच्छुक सांसद थे। कुछ कर भी नहीं सके। पर उस रोज़ पार्टी के कहने पर आना पड़ा था। ट्रेन रतनगढ़ पहुँची तो टीटीई आया और बोला कि स्टेशन पर आपके चाहने वाले आ पहुँचे हैं। किसी ने बीकानेर से ख़बर की होगी। धर्मेंद्र बग़ैर झिझक दरवाज़े पर जा खड़े हुए। नज़ारा देखने को मैं भी। उन्होंने सब मुरीदों को हस्ताक्षर दिए। एक ने पीछे से दो रुपए का नोट ऊँचा कर दिया। धर्मेंद्र हँसते हुए बोले, कुछ तो मेरी इज़्ज़त का ख़याल किया होता! उसे भी कृतार्थ किया।
मैंने शुरू में लिखा कि अभिनय में उनका ‘फ़ैन’ नहीं रहा, लेकिन यह भी सचाई है कि मैंने उनकी लगभग सारी फ़िल्में देखी हैं। उम्र के पड़ावों पर वे मनोरंजक भी लगीं। ‘काजल’ या ‘फूल और पत्थर’ से लेकर ‘शोले’ तक। हाँ, अभिनय में कुछ फ़िल्मों की उनकी छाप भी रही — अनपढ़, अनुपमा, बंदिनी, सत्यकाम और हक़ीक़त याद आती हैं।
ज़िंदादिल बंदे को विदा का सलाम। मुर्दादिल क्या ख़ाक जीते हैं।
[फ़ोटो: जयपुर में धर्मेंद्र से बतियाते जगदीश शर्मा, अशोक शास्त्री और ओम थानवी; छायाकार का नाम याद नहीं]