छत्तीसगढ़ी गजल
अब हमर बीच गहुँरात खाई रथे।
रंज राखे इहाँ चार भाई रथे।
आदमीपन लुकागे हवे देश मा।
काँगरेसी रथे भाजपाई रथे।
लात राखे हवे पेट अउ पीठ मा।
काटहीँ घेँच सँग मा कसाई रथे।
स्वारथी मतलबी राजनेता मिले।
हर कदम मा सियासी लड़ाई रथे।
हम उही ला पिठँइया चघाए रथन।
जेन मा लाख घिनहा बुराई रथे।
रात अँधियार मा खेल डाकू रचे।
चोर के दान दिन मा दुहाई रथे।
कान बोजे रहव आँख मूँदे रहव।
मुँह सिले मा ही “रौना” भलाई रथे।
राजकुमार चौधरी “रौना” Raj Kumar
टेड़ेसरा राजनांदगांव।
(चित्र- AI)